मुझ को दर-पेश है फिर मुबारक सफ़र, क़ाफ़िला फिर मदीने का तय्यार है / Mujh Ko Dar-Pesh Hai Phir Mubarak Safar, Qafila Phir Madine Ka Tayyar Hai
मुझ को दर-पेश है फिर मुबारक सफ़र
क़ाफ़िला फिर मदीने का तय्यार है
नेकियों का नहीं कोई तोशा, फ़क़त
हाए ! सर पर गुनाहों का अम्बार है
कोई सज्दों की सौग़ात है न कोई
ज़ोह्द-ओ-तक़्वा मेरे पास, सरकार ! है
चल पड़ा हूँ मदीने की जानिब मगर
हाए ! सर पर गुनाहों का अम्बार है
जुर्म-ओ-इस्याँ पे अपने लजाता हुआ
और अश्क-ए-नदामत बहाता हुआ
तेरी रहमत पे नज़रें जमाता हुआ
दर पे हाज़िर ये तेरा गुनहगार है
तेरा सानी कहाँ ! शाह-ए-कौन-ओ-मकाँ
मुझ सा आसी भी उम्मत में होगा कहाँ !
तेरे अफ़्व-ओ-करम का शह-ए-दो-जहाँ !
क्या कोई मुझ से बढ़ कर भी हक़दार है ?
मुजरिमों को, शहा ! बख़्शवाता है तू
अपनी उम्मत की बिगड़ी बनाता है तू
ग़म के मारों को सीने लगाता है तू
ग़म-ज़दों, बे-कसों का तू ग़म-ख़्वार है
ठोकरें दर-ब-दर कब तलक खाऊँ मैं
फिर मदीने मुक़द्दर से जब आऊँ मैं
काश ! क़दमों में, सरकार ! मर जाऊँ मैं
या नबी ! ये तमन्ना-ए-अत्तार है
शायर:
मुहम्मद इल्यास अत्तार क़ादरी
नात-ख़्वाँ:
ओवैस रज़ा क़ादरी - असद रज़ा अत्तारी
---------------------------------------------------------------
मुझ को दर-पेश है फिर मुबारक सफ़र
क़ाफ़िला अब मदीने का तय्यार है
नेकियों का नहीं कोई तोशा, फ़क़त
मेरी झोली में अश्क़ों का इक हार है
कुछ न सज्दों की सौग़ात है और न कुछ
ज़ोह्द-ओ-तक़्वा मेरे पास, सरकार ! है
चल पड़ा हूँ मदीने की जानिब मगर
हाए ! सर पर गुनाहों का अम्बार है
जुर्म-ओ-इस्याँ पे अपने लजाता हुआ
और अश्क-ए-नदामत बहाता हुआ
तेरी रहमत पे नज़रें जमाता हुआ
दर पे हाज़िर ये तेरा गुनहगार है
तेरा सानी कहाँ ! शाह-ए-कौन-ओ-मकाँ
मुझ सा आसी भी उम्मत में होगा कहाँ !
तेरे अफ़्व-ओ-करम का शह-ए-दो-जहाँ !
क्या कोई मुझ से बढ़ कर भी हक़दार है ?
मुजरिमों को, शहा ! बख़्शवाता है तू
अपनी उम्मत की बिगड़ी बनाता है तू
ग़म के मारों को सीने लगाता है तू
ग़म-ज़दों, बे-कसों का तू ग़म-ख़्वार है
ठोकरें दर-ब-दर कब तक अब खाऊँ मैं
फिर मदीने मुक़द्दर से जब आऊँ मैं
काश ! क़दमों में, सरकार ! मर जाऊँ मैं
या नबी ! ये तमन्ना-ए-बद-कार है
सुन्नतें मुस्तफ़ा की तू अपनाए जा
दीन को ख़ूब मेहनत से फैलाए जा
ये वसिय्यत तू, अत्तार ! पहुँचाए जा
उस को जो उनके ग़म का तलब-गार है
शायर:
मुहम्मद इल्यास अत्तार क़ादरी
क़ाफ़िला फिर मदीने का तय्यार है
नेकियों का नहीं कोई तोशा, फ़क़त
हाए ! सर पर गुनाहों का अम्बार है
कोई सज्दों की सौग़ात है न कोई
ज़ोह्द-ओ-तक़्वा मेरे पास, सरकार ! है
चल पड़ा हूँ मदीने की जानिब मगर
हाए ! सर पर गुनाहों का अम्बार है
जुर्म-ओ-इस्याँ पे अपने लजाता हुआ
और अश्क-ए-नदामत बहाता हुआ
तेरी रहमत पे नज़रें जमाता हुआ
दर पे हाज़िर ये तेरा गुनहगार है
तेरा सानी कहाँ ! शाह-ए-कौन-ओ-मकाँ
मुझ सा आसी भी उम्मत में होगा कहाँ !
तेरे अफ़्व-ओ-करम का शह-ए-दो-जहाँ !
क्या कोई मुझ से बढ़ कर भी हक़दार है ?
मुजरिमों को, शहा ! बख़्शवाता है तू
अपनी उम्मत की बिगड़ी बनाता है तू
ग़म के मारों को सीने लगाता है तू
ग़म-ज़दों, बे-कसों का तू ग़म-ख़्वार है
ठोकरें दर-ब-दर कब तलक खाऊँ मैं
फिर मदीने मुक़द्दर से जब आऊँ मैं
काश ! क़दमों में, सरकार ! मर जाऊँ मैं
या नबी ! ये तमन्ना-ए-अत्तार है
शायर:
मुहम्मद इल्यास अत्तार क़ादरी
नात-ख़्वाँ:
ओवैस रज़ा क़ादरी - असद रज़ा अत्तारी
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मुझ को दर-पेश है फिर मुबारक सफ़र
क़ाफ़िला अब मदीने का तय्यार है
नेकियों का नहीं कोई तोशा, फ़क़त
मेरी झोली में अश्क़ों का इक हार है
कुछ न सज्दों की सौग़ात है और न कुछ
ज़ोह्द-ओ-तक़्वा मेरे पास, सरकार ! है
चल पड़ा हूँ मदीने की जानिब मगर
हाए ! सर पर गुनाहों का अम्बार है
जुर्म-ओ-इस्याँ पे अपने लजाता हुआ
और अश्क-ए-नदामत बहाता हुआ
तेरी रहमत पे नज़रें जमाता हुआ
दर पे हाज़िर ये तेरा गुनहगार है
तेरा सानी कहाँ ! शाह-ए-कौन-ओ-मकाँ
मुझ सा आसी भी उम्मत में होगा कहाँ !
तेरे अफ़्व-ओ-करम का शह-ए-दो-जहाँ !
क्या कोई मुझ से बढ़ कर भी हक़दार है ?
मुजरिमों को, शहा ! बख़्शवाता है तू
अपनी उम्मत की बिगड़ी बनाता है तू
ग़म के मारों को सीने लगाता है तू
ग़म-ज़दों, बे-कसों का तू ग़म-ख़्वार है
ठोकरें दर-ब-दर कब तक अब खाऊँ मैं
फिर मदीने मुक़द्दर से जब आऊँ मैं
काश ! क़दमों में, सरकार ! मर जाऊँ मैं
या नबी ! ये तमन्ना-ए-बद-कार है
सुन्नतें मुस्तफ़ा की तू अपनाए जा
दीन को ख़ूब मेहनत से फैलाए जा
ये वसिय्यत तू, अत्तार ! पहुँचाए जा
उस को जो उनके ग़म का तलब-गार है
शायर:
मुहम्मद इल्यास अत्तार क़ादरी
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