दर्द अपना दे इस क़दर या रब / Dard Apna De Is Qadar Ya Rab
दर्द अपना दे इस-क़दर, या रब ! न पड़े चैन 'उम्र-भर, या रब ! मेरी आँखों को दे वो बीनाई तू ही आए मुझे नज़र, या रब ! विर्द मेरा हो तेरा कलमा-ए-पाक जब कि दुनिया से हो सफ़र, या रब ! तेरे महबूब का मैं वासिफ़ हूँ दे ज़बाँ में मेरी असर, या रब ! तेरी रहमत जो मेरे साथ रहे मुझ को किस का हो फिर ख़तर, या रब ! जान निकले तो इस तरह निकले तेरे दर पर हो मेरा सर, या रब ! क़ब्र में और जाँ-कनी के वक़्त जब हो हालत मेरी दिगर, या रब ! सख़्तियों से मुझे बचा लेना रखना रहमत की तू नज़र, या रब ! आस्ताने का अपने रख मँगता न फिरा मुझ को दर-ब-दर, या रब ! मैं ने फैलाया दामन-ए-मक़्सूद भर दे रहमत के तू गुहर, या रब ! मेरे जुर्म-ओ-क़ुसूर पर तू न जा अपनी रहमत पे कर नज़र, या रब ! न ठिकाना मेरा लगेगा कहीं तू ने छोड़ा मुझे अगर, या रब ! अपने महबूब का मुझे वासिफ़ रख तू रहमत से 'उम्र-भर, या रब ! उन का और उन की आल का सदक़ा ख़ातिमा तू ब-ख़ैर कर, या रब ! मेरी औलाद और मेरी बहनें और मेरे मादर-ओ-पिदर, या रब ! जुमला अहबाब और सब अहल-ए-सुनन कुल पे रहमत की रख नज़र, या रब ! क़ादिरी है जमील, ऐ ग़फ़्फ़ार ! सब गुनह इस के '...