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क्यूँ न महकें दो जहाँ महकाने वाले आ गए / Kyun Na Mehkein Do Jahan Mehkane Wale Aa Gaye

क्यूँ न महकें दो जहाँ, महकाने वाले आ गए आने वाले आ गए वो आने वाले आ गए झुक गए भटके हुए सर अपने मौला के हुज़ूर रब से रब के बंदों को मिलवाने वाले आ गए ये वही हैं जिन के सर सेहरा शफ़ा'अत का सजा 'आसियों की बख़्शिशें करवाने वाले आ गए आमिना के घर में चल, आक़ा को ले ले गोद में ऐ हलीमा ! तेरे दिन चमकाने वाले आ गए ऐ सुराक़ा ! क़ैसर-ओ-किस्रा के कंगन हाथ में जो तुम्हें पहनाएँगे, पहनाने वाले आ गए खुल गए रहमत के दरवाज़े ज़माने के लिए रहमतुल-लिल-'आलमीं कहलाने वाले आ गए आ गए 'आशिक़ बनाने वाले अपना कर्न में दिल बिलाल-ए-हब्श का धड़काने वाले आ गए बे-ज़बाँ लोगों को भी अब बोलना आ जाएगा कंकरों से गुफ़्तुगू करवाने वाले आ गए दिल पिगल जाएँगे ज़िंदा बच्ची दफ़नाते हुए पत्थरों को पाँव से पिघलाने वाले आ गए देख कर मौला 'अली को ख़ुद ही ख़ैबर बोल उठा मुझ पे परचम दीन का लहराने वाले आ गए ना'त-ख़्वाँ: मुहम्मद अली फ़ैज़ी kyu.n na mehke.n do jahaa.n, mehkaane waale aa gaye aane waale aa gaye wo aane waale aa gaye jhuk gaye bhaTke hue sar apne maula ke huzoor rab se rab ke bando.n ...

करम कर दो मेरे आक़ा ख़ुदारा / Karam Kar Do Mere Aaqa Khudara

करम कर दो, मेरे आक़ा ! ख़ुदा-रा सहारा दो, सहारा दो, सहारा करम कर दो, मेरे आक़ा ! ख़ुदा-रा जो हर ग़म की दवा है, वो है नाम-ए-मुहम्मद मदद कुन या मुहम्मद, मदद कुन या मुहम्मद सदा देता है तन्हा ग़म का मारा सहारा दो, सहारा दो, सहारा करम कर दो, मेरे आक़ा ! ख़ुदा-रा मैं क्यूँ दुनिया में, आक़ा ! सहारे ढूँडता हूँ तेरे होते हुए भी मैं अपने ढूँडता हूँ ये ग़फ़लत है, ये है मेरा ख़सारा सहारा दो, सहारा दो, सहारा करम कर दो, मेरे आक़ा ! ख़ुदा-रा ज़माने को ख़बर क्या, जो ज़ाहिर है वो क्या है मेरे दिल का फ़साना कहाँ तुझ से छुपा है न खुल जाए कहीं पर्दा हमारा सहारा दो, सहारा दो, सहारा करम कर दो, मेरे आक़ा ! ख़ुदा-रा जनाब-ए-सय्यिदा ! गर सिफ़ारिश आप कर दें मेरी आक़ा सुनेंगे, मेरी झोली भरेंगे भरम रह जाएगा कुछ तो हमारा सहारा दो, सहारा दो, सहारा करम कर दो, मेरे आक़ा ! ख़ुदा-रा मेरा कश्कोल भर दें, झुकाए सर खड़ा हूँ तेरे दर का गदा हूँ, कहाँ का मैं ज़िया हूँ सदा बस्ता रहे तेरा दवारा सहारा दो, सहारा दो, सहारा करम कर दो, मेरे आक़ा ! ख़ुदा-रा शायर: मुहम्मद रफ़ीक़ ज़िया क़ादरी ना'त-ख़्वाँ: मुहम्मद रफ़ीक़ ज़िया क़ादरी श...

ख़ुदाया दौर-ए-रहमत देखता मैं | नबी का हुस्न-ए-तलअत देखता मैं / Khudaya Daur-e-Rehmat Dekhta Main | Nabi Ka Husn-e-Talat Dekhta Main

ख़ुदाया ! दौर-ए-रहमत देखता मैं नबी का हुस्न-ए-तल'अत देखता मैं उन्हीं के दर पे होती सुब्ह मेरी वहीं पर शाम-ए-फ़ुर्क़त देखता मैं नबी का हुस्न-ए-तल'अत देखता मैं ख़ुदाया ! दौर-ए-रहमत देखता मैं नबी का हुस्न-ए-तल'अत देखता मैं मदीने की गली में सर झुकाए रसूल-ए-हक़ की 'अज़मत देखता मैं नबी का हुस्न-ए-तल'अत देखता मैं ख़ुदाया ! दौर-ए-रहमत देखता मैं नबी का हुस्न-ए-तल'अत देखता मैं सहाबी काश मैं होता नबी का करम की हर 'इनायत देखता मैं नबी का हुस्न-ए-तल'अत देखता मैं ख़ुदाया ! दौर-ए-रहमत देखता मैं नबी का हुस्न-ए-तल'अत देखता मैं जबीन-ए-शौक़ सज्दे में झुका कर 'इबादत की हक़ीक़त देखता मैं नबी का हुस्न-ए-तल'अत देखता मैं ख़ुदाया ! दौर-ए-रहमत देखता मैं नबी का हुस्न-ए-तल'अत देखता मैं बिछाता अपनी पल्कें उन की रह में 'अजब रंग-ए-'अक़ीदत देखता मैं नबी का हुस्न-ए-तल'अत देखता मैं ख़ुदाया ! दौर-ए-रहमत देखता मैं नबी का हुस्न-ए-तल'अत देखता मैं कभी जो मस्जिद-ए-नबवी में होता जमाल-ए-बज़्म-ए-जन्नत देखता मैं नबी का हुस्न-ए-तल'अत देखता मैं ख़ुद...

कौन कहता है कि कर्बल में नहीं था पानी / Kaun Kehta Hai Ki Karbal Mein Nahi Tha Paani

कौन कहता है कि कर्बल में नहीं था पानी कर्बला वालों ने ख़ुद ही नहीं चाहा पानी अपने होंटो को हिला देते जो इब्न-ए-हैदर आसमानों से उसी वक़्त बरसता पानी वो ख़ुदा ने तुम्हें, शब्बीर ! दिया है रुत्बा तुम अगर चाहते तो ख़ुल्द से आता पानी 'आलम-ए-तिफ़ली में ये आप की ग़ैरत, असग़र ! जान तो दे दी मगर मुँह से न माँगा पानी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी kaun kehta hai ki karbal me.n nahi.n tha paani karbala waalo.n ne KHud hi nahi.n chaaha paani apne honTo.n ko hila dete jo ibn-e-haidar aasmaano.n se usi waqt barasta paani wo KHuda ne tumhe.n, shabbir ! diya hai rutba tum agar chaahte to KHuld se aata paani 'aalam-e-tifli me.n ye aap ki Gairat, asGar ! jaan to de di magar munh se na maanga paani Naat-Khwaan: Sayyed Abdul Wasi Qadri Razavi हिन्दी ENG اردو

किस को मालूम है किस को है ये पता / Kis Ko Maloom Hai Kis Ko Hai Ye Pata

किस को मा'लूम है, किस को है ये पता रब त'आला को महशर में क्या चाहिए हर किसी को ख़ुदा की रज़ा चाहिए और ख़ुदा को नबी की रज़ा चाहिए कैसे ईमाँ बचाएँ ये रहता है ग़म सब को अपनी पड़ी है, कहाँ जाएँ हम ऐसे हालात में और इस दौर में फिर बरेली का अहमद रज़ा चाहिए थे बहत्तर मगर दबदबा याद कर है हुसैनी तो फिर कर्बला याद कर ज़ुल्म का सर यहाँ काटने के लिए दिल में शब्बीर का हौसला चाहिए गिरते गिरते यक़ीनन सँभल जाएगा मेरा दा'वा है ग़म से निकल जाएगा कामयाबी क़दम चूम लेगी तेरे शर्त है बाप-माँ की दु'आ चाहिए वो मुजाहिद मेरा अरशद-उल-क़ादरी काश ! आ जाते अख़्तर रज़ा अज़हरी हर तरफ़ से ये आने लगी फिर सदा सुन्नियत को वही क़ाफ़िला चाहिए छोड़ कर मुस्तफ़ा को कहाँ जाएगा देखना रोज़-ए-महशर में पछताएगा दामन-ए-मुस्तफ़ा आज ही थाम ले ख़ुल्द में गर तुझे दाख़िला चाहिए रब ने क़ुरआन में कर दिया फ़ैसला 'इश्क़ होगा नबी से तो होगा भला जितने गुस्ताख़ हैं, जाएँगे नार में ख़ुल्द को 'आशिक़-ए-मुस्तफ़ा चाहिए मेरे सरकार का जो सना-ख़्वान है शा'इरों में अलग जिस की पहचान है झूम कर ना'त पढ़ता है हर बज़्म में इस लिए ...

कर्बला के जाँ-निसारों को सलाम / Karbala Ke Jaan Nisaron Ko Salam

कर्बला के जाँ-निसारों को सलाम फ़ातिमा ज़हरा के प्यारों को सलाम मुस्तफ़ा के माह-पारों को सलाम नौजवानों गुल-'इज़ारों को सलाम कर्बला तेरी बहारों को सलाम जाँ-निसारी के नज़ारों को सलाम या हुसैन इब्न-ए-'अली मुश्किल-कुशा ! आप के सब जाँ-निसारों को सलाम अकबर-ओ-असग़र पे जाँ क़ुर्बान हो मेरे दिल के ताजदारों को सलाम क़ासिम-ओ-'अब्बास पर हों रहमतें कर्बला के शह-सुवारों को सलाम जिस किसी ने कर्बला में जान दी उन सभी ईमानदारों को सलाम भूकी प्यासी बीबियों पर रहमतें भूके प्यासे गुल-'इज़ारों को सलाम भेद क्या जाने शहादत का कोई उन ख़ुदा के राज़दारों को सलाम बेबसी में भी हया बाक़ी रही सब हुसैनी पर्दा-दारों को सलाम रहमतें हों हर सहाबी पर मुदाम और ख़ुसूसन चार यारों को सलाम बीबियों को, 'आबिद-ए-बीमार को बेकसों को, ग़म के मारों को सलाम हो गए क़ुर्बां मुहम्मद और 'औन सय्यिदा ज़ैनब के प्यारों को सलाम कर्बला में ज़ुल्म के टूटे पहाड़ जिन पे उन सब दिल-फ़िगारों को सलाम आल-ओ-असहाब-ए-नबी के जिस क़दर चाहने वाले हैं सारों को सलाम या ख़ुदा ! ऐ काश, जा कर फिर करूँ कर्बला के सब मज़ारों को सलाम ...

कर्बला से मेरी लौ लगी है / Karbala Se Meri Lau Lagi Hai

मुझ को, शब्बीर ! अपना बना लो कर्बला से मेरी लौ लगी है अब तो नज़र-ए-करम मुझ पे डालो कर्बला से मेरी लौ लगी है ख़ूब-तर ज़ख़्म खाया हुआ हूँ दहर का मैं सताया हुआ हूँ डाल दो मुझ पे नज़र-ए-'इनायत दिल का दीपक जलाया हुआ हूँ बहर-ए-ग़म से मुझे अब निकालो कर्बला से मेरी लौ लगी है आ गया फिर से माह-ए-मुहर्रम या'नी ज़िक्र-ए-शहादत का मौसम ऐ क़सीम-ए-विलायत ! तवज्जोह कह रही है यही चश्म-ए-पुरनम मेरी झोली में ख़ैरात डालो कर्बला से मेरी लौ लगी है दिल की दुनिया में फिर खलबली है क्या कहूँ कैसी भगदड़ मची है ग़र्क़ होने को है अब सफ़ीना फिर से बाद-ए-मुख़ालिफ़ चली है डूबने से मुझे तुम बचा लो कर्बला से मेरी लौ लगी है हर-सू नहर-ए-फ़ितन फूटते हैं कंज़-ए-ईमान को लूटते हैं किस-क़दर पुर-ख़तर दौर आया हर तरफ़ भेड़िये घूमते हैं अपने दामन में मुझ को छुपा लो कर्बला से मेरी लौ लगी है कर दो मेरा जिगर नूरी नूरी दे दो मुझ को भी इज़्न-ए-हुज़ूरी वासिता सय्यिदा फ़ातिमा का मेरे दिल की ये हसरत हो पूरी अपने दर का मुझे सग बना लो कर्बला से मेरी लौ लगी है जुर्म कोई मेरा धो रहा है दुनिया-ए-दिल में कुछ हो रहा है ताजदा...

कौनैन के दूल्हा के सदक़े में ख़ुदाई है | सुनते हैं कि महशर में तज़मीन के साथ / Kaunain Ke Dulha Ke Sadqe Mein Khudai Hai | Sunte Hain Ke Mehshar Mein With Tazmeen

कौनैन के दूल्हा के सदक़े में ख़ुदाई है महबूब-ए-करीमा ने हाँ शान वो पाई है मौला ने फ़तर्दा की ख़ुश-ख़बरी सुनाई है सुनते हैं कि महशर में सिर्फ़ उन की रसाई है गर उन की रसाई है लो जब तो बन आई है रहमत ने सर-ए-महशर क्या रंग जमाई है सौग़ात-ए-करम देखो ला-तक़्नतू लाई है आक़ा की शफ़ा'अत ने क्या धूम मचाई है मचला है कि रहमत ने उम्मीद बँधाई है क्या बात तेरी, मुजरिम ! क्या बात बनाई है आ'माल-ए-सियह ने जब फिटकार दिया हम को हम क्या कहें अपनों ने क्या प्यार दिया हम को माँ-बाप ने भी, आक़ा ! धुतकार दिया हम को सब ने सफ़-ए-महशर में ललकार दिया हम को ऐ बेकसों के आक़ा ! अब तेरी दुहाई है सरकार की 'अज़मत का जब ज़िक्र-ए-जली छेड़ो बाज़ार-ए-मोहब्बत में फिर होश-ओ-ख़िरद भेजो गुलदस्ता-ए-तन-मन-धन हर चीज़ ही, ऐ लोगो ! यूँ तो सब उन्हीं का है पर दिल की अगर पूछो ये टूटे हुए दिल ही ख़ास उन की कमाई है यूँ बज़्म-ए-मोहब्बत से हरगिज़ न तू ख़ाली उठ महबूब की चौखट से ले कर के, सवाली ! उठ सरकार-ए-मदीना के ऐ क़ल्ब-ए-फ़िदाई ! उठ ऐ दिल ! ये सुलगना क्या, जलना है तो जल भी उठ दम घुटने लगा, ज़ालिम ! क्या धूनी रमाई है दुनिया की...

कौन है जो ये इल्तिजा न करे | दिल को उन से ख़ुदा जुदा न करे तज़मीन के साथ / Kaun Hai Jo Ye Iltija Na Kare | Dil Ko Un Se Khuda Juda Na Kare With Tazmeen

कौन है जो ये इल्तिजा न करे कौन उन के लिए मरा न करे कौन रो रो के ये दु'आ न करे दिल को उन से ख़ुदा जुदा न करे बेकसी लूट ले ख़ुदा न करे 'इश्क़ का सर पे डाल कर के ग़िलाफ़ बात अहल-ए-ख़िरद ये सुन लें साफ़ काम है कौन सा शरा' के ख़िलाफ़ इस में रौज़े का सज्दा हो कि तवाफ़ होश में जो न हो वो क्या न करे रात-दिन हम गुनह में डूबे हैं जुर्म जितने हैं सारे करते हैं फिर भी आक़ा करीम ऐसे हैं ये वही हैं कि बख़्श देते हैं कौन इन जुर्मों पर सज़ा न करे 'इश्क़ ने कर दिया मुझे मशहूर उन की यादों से ज़ेहन है मा'मूर मुझ को इस बात पे है फ़ख़्र ज़रूर दिल में रौशन है शम'-ए-'इश्क़-ए-हुज़ूर काश ! जोश-ए-हवस हवा न करे ज़ख़्म सीने के सारे सीने को जो यहाँ मर रहे थे जीने को ऐ वसी ! जाम-ए-'इश्क़ पीने को ले, रज़ा ! सब चले मदीने को मैं न जाऊँ अरे ख़ुदा न करे कलाम: इमाम अहमद रज़ा ख़ान तज़मीन: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी kaun hai jo ye iltija na kare kaun un ke liye mara na kare kaun ro ro ke ye du'aa na kare dil ko un se...

कुछ देर तो बैठो अहल-ए-दिल हम नूर-ए-हुदा की बात करें / Kuchh Der To Baitho Ahl-e-Dil Hum Noor-e-Huda Ki Baat Karein

कुछ देर तो बैठो, अहल-ए-दिल ! हम नूर-ए-हुदा की बात करें सरकार-ए-दो-'आलम सल्ले-'अला महबूब-ए-ख़ुदा की बात करें वो जिन से मुनव्वर दोनों जहाँ वो जिन से मिटी ज़ुल्मत शब की तोहफ़े में जिन्हें क़ुरआन मिला उन जान-ए-फ़िदा की बात करें वश्शम्स है चेहरा-ए-अनवर और वल्लैल हैं गेसू हज़रत के कौनैन की महफ़िल जिन से सजी वो सब से जुदा की बात करें अलक़ाब मिले ताहा यासीं मुज़म्मिल-ओ-मक्की-मदनी भी और उस्वा-ए-हसना जिस को कहा उस रब की सदा की बात करें ग़म-ख़्वार हैं आक़ा उम्मत के सरदार-ए-'उला हैं जन्नत के वो रहमत-ए-'आलम नूर-ए-मुबीं शफ़क़त की रिदा की बात करें हो 'अज़मत-ओ-रिफ़'अत कैसे बयाँ मे'राज तलक हैं जा पहुँचे हम साक़ी-ए-आब-ए-कौसर के अख़्लाक़-ओ-अदा की बात करें हम जैसे गुनहगारों के लिए वो रब से सिफ़ारिश कर देंगे बहबूद की जो गूँजी है, फ़िज़ा ! उस हक़ की निदा की बात करें शा'इरा: फ़िज़ा फ़ानिया ना'त-ख़्वाँ: मुफ़्ती अनस यूनुस kuchh der to baiTho, ahl-e-dil ! ham noor-e-huda ki baat kare.n sarkaar-e-do-'aalam salle-'ala mahboob-e-KHuda ki baat k...

अल्लाह की रिज़ा है गर आप को जो पानी | कर लीजिए क़ुर्बानी / Allah Ki Riza Hai Gar Aap Ko Jo Paani | Kar Lijiye Qurbani

'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! मुबारक मुबारक मुबारक ! क़ुर्बानी मुबारक ! क़ुर्बानी क़ुर्बानी क़ुर्बानी क़ुर्बानी अल्लाह की रिज़ा है गर आप को जो पानी कर लीजिए क़ुर्बानी, कर लीजिए क़ुर्बानी सुन्नत अदा करेंगे, राज़ी ख़ुदा करेंगे हुक्म-ए-ख़ुदा पे जानें अपनी फ़िदा करेंगे इख़्लास दिल में हो और हो जज़्बा-ए-ईमानी कर लीजिए क़ुर्बानी, कर लीजिए क़ुर्बानी 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! मुबारक मुबारक मुबारक ! क़ुर्बानी मुबारक ! हुक्म-ए-ख़ुदा मिला जब रब के ख़लील को क़ुर्बान कर दो अपने तुम इस्मा'ईल को हुक्म-ए-ख़ुदा के आगे ख़म कर दी है पेशानी कर लीजिए क़ुर्बानी, कर लीजिए क़ुर्बानी 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! मुबारक मुबारक मुबारक ! क़ुर्बानी मुबारक ! बेटा है ऐसा बेटा रब के ख़लील का मक़बूल है वो बंदा रब्ब-ए-जलील का क़ुर्बान मुझ को कर दे, ऐ मेरे बाबा जानी ! कर लीजिए क़ुर्बानी, कर लीजिए क़ुर्बानी 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! मुबारक मुबारक मुबारक ! क़ुर्बानी मुबारक ! रब के हबीब का भी फ़रमान है यही फ़रहान ! हमा...

काबा दिखा दे मौला / Kaba Dikha De Maula

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला ! का'बा दिखा दे, मौला ! 'उम्र बची है मेरी कहाँ मर ही न जाऊँ, मौला ! यहाँ का'बा दिखा दे, मौला ! मौला ! का'बा दिखा दे, मौला ! कभी गिर्द का'बे के मैं भी तो घूमूँ कभी मैं भी का'बे की चादर को चूमूँ मुझे भी दिखा दे, ख़ुदाया ! हरम वो बरसती है रहमत की बारिश जहाँ का'बा दिखा दे, मौला ! मौला ! का'बा दिखा दे, मौला ! कभी संग-ए-असवद का बोसा 'अता हो कि मरने से पहले ख़तम हर ख़ता हो तमन्ना, मेरे रब ! ये पूरी तू कर दे इसी जुस्तुजू में हूँ जीता यहाँ का'बा दिखा दे, मौला ! मौला ! का'बा दिखा दे, मौला ! मैं अक्सर ही यादों में का'बे को पहुँचा मैं कितना हूँ तड़पा, मैं कितना हूँ रोया है बेचैन, मौला ! ये दिल मेरा कितना करूँ कैसे मैं ये लबों से बयाँ ? का'बा दिखा दे, मौला ! मौला ! का'बा दिखा दे, मौला ! बहुत हो के आए हैं देखो वहाँ से कि मैं सिर्फ़ जा ही न पाया यहाँ से ज़ियारत हरम की है कितनों ने कर ली तेरी अब निगाह-ए-करम हो यहाँ का'बा दिखा दे, मौला ! मौला ! का'बा दिखा दे, मौला ! बहुत लोग जाते हैं ...