कोई सौ बार पूछे मैं कहूँ हर बार काफ़ी है / Koi Sau Baar Poochhe Main Kahun Har Baar Kafi Hai
कोई सौ बार पूछे, मैं कहूँ हर बार काफ़ी है मैं दीवाना हूँ, मुझ को बस तेरा दीदार काफ़ी है मसीहा-ए-ज़माना ने किया वापस मुझे कह कर मरीज़-ए-यार ! जा तुझ को निगाह-ए-यार काफ़ी है पहुँच कर तेरी चौखट पर तेरा दीवाना कहता है मुझे जन्नत से क्या लेना, तेरा दरबार काफ़ी है ज़माने के हर इक मरहब को मिट्टी में मिलाना हो सर-ए-मैदाँ ख़याल-ए-हैदर-ए-कर्रार काफ़ी है लिखी ना'त-ए-नबी फाँसी का फंदा चूम कर जिस ने वो हिन्दुस्तान का शा'इर क़तील-ए-दार काफ़ी है सिखाया जो वज़ीफ़ा वालिदा ने ग़ौस-ए-आ'ज़म को ग़ुलामो ! काफ़ी काफ़ी की यही तकरार काफ़ी है जो ग़द्दार-ए-नबी को ज़ेर करना हो, वसी ! फिर तो इमाम अहमद रज़ा के नाम का इक वार काफ़ी है शायर: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी koi sau baar poochhe, mai.n kahu.n har baar kaafi hai mai.n deewana hu.n, mujh ko bas tera deedaar kaafi hai maseeha-e-zamaana ne kiya waapas mujhe keh kar mareez-e-yaar ! jaa tujh ko nigaah-e-yaar kaafi hai pahunch kar teri chaukhaT par tera deewana kehta hai mujhe jannat se kya ...