Posts

शाह-ए-दीं मेहरबाँ मुस्तफ़ा है / Shaah-e-Deen Mehrban Mustafa Hai

मुस्तफ़ा ! मुस्तफ़ा ! मुस्तफ़ा ! मुस्तफ़ा ! शाह-ए-दीं मेहरबाँ मुस्तफ़ा है फ़ख़्र-ए-कौन-ओ-मकाँ मुस्तफ़ा है मम्बा'-ए-फ़ज़्ल-ए-रब्ब-ए-'उला है मख़ज़न-ए-हर-ज़माँ मुस्तफ़ा है ज़ुल्मतें कुफ़्र की कट गई हैं रौशनी हर तरफ़ छा गई है नूर-ए-हक़ का हसीं आईना है रहमत-ए-बे-कराँ मुस्तफ़ा है शाह-ए-दीं मेहरबाँ मुस्तफ़ा है फ़ख़्र-ए-कौन-ओ-मकाँ मुस्तफ़ा है जिस का नक़्श-ए-क़दम सादगी है वो नबी ज़ीस्त की ताज़गी है दो जहाँ का वही आसरा है ज़ीनत-ए-गुल्सिताँ मुस्तफ़ा है शाह-ए-दीं मेहरबाँ मुस्तफ़ा है फ़ख़्र-ए-कौन-ओ-मकाँ मुस्तफ़ा है हक़ का पैग़ाम जिस की ज़ुबाँ है नूर का इक हसीं कहकशाँ है रहबर-ओ-पेशवा, रहनुमा है रश्क-ए-अर्ज़-ओ-समाँ मुस्तफ़ा है शाह-ए-दीं मेहरबाँ मुस्तफ़ा है फ़ख़्र-ए-कौन-ओ-मकाँ मुस्तफ़ा है जिस की सूरत कमाल-ए-नुबुव्वत जिस की सीरत जमाल-ए-हक़ीक़त हक़ की पहचान का रास्ता है सरवर-ए-दो-जहाँ मुस्तफ़ा है शाह-ए-दीं मेहरबाँ मुस्तफ़ा है फ़ख़्र-ए-कौन-ओ-मकाँ मुस्तफ़ा है लब पे ना'त-ए-नबी की सदा है दिल में याद-ए-नबी की ज़िया है सोज़-ए- ग़ालिब की अब ये दवा है राहत-ए-क़ल्ब-ओ-जाँ मुस्तफ़ा है शाह-ए-दीं मेहरबाँ मुस्तफ़ा है फ़ख़्र-ए-...

सैर-ए-गुलशन कौन देखे दश्त-ए-तयबा छोड़ कर / Sair-e-Gulshan Kaun Dekhe Dasht-e-Tayba Chhod Kar

सैर-ए-गुलशन कौन देखे दश्त-ए-तयबा छोड़ कर सू-ए-जन्नत कौन जाए दर तुम्हारा छोड़ कर सरगुज़श्त-ए-ग़म कहूँ किस से तेरे होते हुए किस के दर पर जाऊँ तेरा आस्ताना छोड़ कर बे-लिक़ा-ए-यार उन को चैन आ जाता अगर बार बार आते न यूँ जिब्रील सिदरा छोड़ कर कौन कहता है दिल-ए-बे-मुद्द'आ है ख़ूब चीज़ मैं तो कोड़ी को न लूँ उन की तमन्ना छोड़ कर मर ही जाऊँ मैं अगर इस दर से जाऊँ दो क़दम क्या बचे बीमार-ए-ग़म क़ुर्ब-ए-मसीहा छोड़ कर किस तमन्ना पर जिएँ, या रब ! असीरान-ए-क़फ़स आ चुकी बाद-ए-सबा बाग़-ए-मदीना छोड़ कर बख़्शवाना मुझ से 'आसी का रवा होगा किसे किस के दामन में छुपूँ दामन तुम्हारा छोड़ कर ख़ुल्द कैसा ? नफ़्स-ए-सरकश ! जाऊँगा तयबा को मैं बद-चलन हट कर खड़ा हो मुझ से रस्ता छोड़ कर ऐसे जल्वे पर करूँ मैं लाख हूरों को निसार क्या ग़रज़ क्यूँ जाऊँ जन्नत को मदीना छोड़ कर हश्र में एक एक का मूँह तकते फिरते हैं 'अदू आफ़तों में फँस गए उन का सहारा छोड़ कर मर के जीते हैं जो उन के दर पे जाते हैं, हसन ! जी के मरते हैं जो आते हैं मदीना छोड़ कर शायर: मौलाना हसन रज़ा ख़ान बरेलवी ना'त-ख़्वाँ: ओवैस रज़ा क़ादरी साबिर रज़ा अज़ह...

वो नबियों में सब से बड़ी शान वाले | हमारा नबी सब से प्यारा नबी / Wo Nabiyon Mein Sab Se Badi Shan Wale | Hamara Nabi Sab Se Pyara Nabi

हमारा नबी सब से प्यारा नबी हमारा नबी सब से प्यारा नबी वो नबियों में सब से बड़ी शान वाले जहाँ भर में उन से हैं हर-सू उजाले मुज़म्मिल, मुदस्सिर, वो यासीन-ओ-ताहा हैं बा'द-अज़-ख़ुदा के वो रुत्बे में आ'ला मिलेंगे तुम्हें हर वरक़ पर हवाले जहाँ भर में उन से हैं हर-सू उजाले या नबी ! या नबी ! या नबी ! या नबी ! मुहम्मद हमारे हसीं ख़ूब-तर हैं वो नबियों में अफ़ज़ल, वो आ'ला बशर हैं वो इक शब में 'अर्श-ए-बरीं जाने वाले जहाँ भर में उन से हैं हर-सू उजाले वो नबियों में सब से बड़ी शान वाले जहाँ भर में उन से हैं हर-सू उजाले वो महशर में उम्मत का बन कर सहारा उसी के बिना तो नहीं है गुज़ारा पिलाएँगे कौसर के सब को पियाले जहाँ भर में उन से हैं हर-सू उजाले या नबी ! या नबी ! या नबी ! या नबी ! नबी की इहानत नहीं है गवारा मुहम्मद से उल्फ़त है ईमाँ हमारा मुहम्मद पे दिल से फ़िदा हम जियाले जहाँ भर में उन से हैं हर-सू उजाले वो नबियों में सब से बड़ी शान वाले जहाँ भर में उन से हैं हर-सू उजाले वो आए तो वहदत का फ़रमान समझे वो आए तो इंसाँ को इंसान समझे दिलों से जहालत के सब टूटे ताले जहाँ भर म...

दर्द अपना दे इस क़दर या रब / Dard Apna De Is Qadar Ya Rab

दर्द अपना दे इस-क़दर, या रब ! न पड़े चैन 'उम्र-भर, या रब ! मेरी आँखों को दे वो बीनाई तू ही आए मुझे नज़र, या रब ! विर्द मेरा हो तेरा कलमा-ए-पाक जब कि दुनिया से हो सफ़र, या रब ! तेरे महबूब का मैं वासिफ़ हूँ दे ज़बाँ में मेरी असर, या रब ! तेरी रहमत जो मेरे साथ रहे मुझ को किस का हो फिर ख़तर, या रब ! जान निकले तो इस तरह निकले तेरे दर पर हो मेरा सर, या रब ! क़ब्र में और जाँ-कनी के वक़्त जब हो हालत मेरी दिगर, या रब ! सख़्तियों से मुझे बचा लेना रखना रहमत की तू नज़र, या रब ! आस्ताने का अपने रख मँगता न फिरा मुझ को दर-ब-दर, या रब ! मैं ने फैलाया दामन-ए-मक़्सूद भर दे रहमत के तू गुहर, या रब ! मेरे जुर्म-ओ-क़ुसूर पर तू न जा अपनी रहमत पे कर नज़र, या रब ! न ठिकाना मेरा लगेगा कहीं तू ने छोड़ा मुझे अगर, या रब ! अपने महबूब का मुझे वासिफ़ रख तू रहमत से 'उम्र-भर, या रब ! उन का और उन की आल का सदक़ा ख़ातिमा तू ब-ख़ैर कर, या रब ! मेरी औलाद और मेरी बहनें और मेरे मादर-ओ-पिदर, या रब ! जुमला अहबाब और सब अहल-ए-सुनन कुल पे रहमत की रख नज़र, या रब ! क़ादिरी है जमील, ऐ ग़फ़्फ़ार ! सब गुनह इस के '...

हम-शबीह-ए-मुस्तफ़ा सल्ले-अला मौला हसन | या मौला हसन सरकार / Ham-Shabih-e-Mustafa Salle-ala Maula Hasan | Ya Maula Hasan Sarkar

सय्यिद-उल-अस्ख़िया या हसन मुज्तबा ! सय्यिद-उल-अस्ख़िया या हसन मुज्तबा ! सरदार हो तुम, मौला हसन मौला हसन ! दिलदार हो तुम, मौला हसन मौला हसन ! सरदार हो तुम, दिलदार हो तुम मेरा प्यार हो तुम, मौला हसन ! हम-शबीह-ए-मुस्तफ़ा सल्ले-'अला मौला हसन ! जा-नशीन-ए-मुर्तज़ा शेर-ए-ख़ुदा मौला हसन ! या मौला हसन सरकार ! या मौला हसन सरकार ! अपने काँधों पर बिठा कर सरवर-ए-कौनैन ने आप का हम को बताया मर्तबा मौला हसन ! हम-शबीह-ए-मुस्तफ़ा सल्ले-'अला मौला हसन ! जा-नशीन-ए-मुर्तज़ा शेर-ए-ख़ुदा मौला हसन ! या मौला हसन सरकार ! या मौला हसन सरकार ! ता-क़यामत मैं करूँ इन पाँच की मद्ह-ओ-सना मुस्तफ़ा, शब्बीर, ज़हरा, मुर्तज़ा, मौला हसन हम-शबीह-ए-मुस्तफ़ा सल्ले-'अला मौला हसन ! जा-नशीन-ए-मुर्तज़ा शेर-ए-ख़ुदा मौला हसन ! या मौला हसन सरकार ! या मौला हसन सरकार ! हर वली तस्बीह पढ़ता है तुम्हारे नाम की हर वली सौ जान से तुम पर फ़िदा, मौला हसन ! हम-शबीह-ए-मुस्तफ़ा सल्ले-'अला मौला हसन ! जा-नशीन-ए-मुर्तज़ा शेर-ए-ख़ुदा मौला हसन ! या मौला हसन सरकार ! या मौला हसन सरकार ! सारे 'आलम में तेरे जैसा सख़ी कोई नहीं ...

ऐ ज़हरा के बाबा सुनें इल्तिजा मदीना बुला लीजिए / Aye Zahra Ke Baba Sunen Iltija Madina Bula Lijiye

ऐ ज़हरा के बाबा ! सुनें इल्तिजा मदीना बुला लीजिए कहीं मर न जाए ग़ुलाम आप का मदीना बुला लीजिए सताती है मुझ को, रुलाती है मुझ को ये दुनिया बहुत आज़माती है मुझ को हूँ दुनिया की बातों से टूटा हुआ मदीना बुला लीजिए बड़ी बेकसी है, बड़ी बे-क़रारी न कट जाए, आक़ा ! यूँही 'उम्र सारी कहाँ ज़िंदगानी का है कुछ पता मदीना बुला लीजिए ये एहसास है मुझ को, मैं हूँ कमीना हुज़ूर ! आप चाहें तो आऊँ मदीना गुनाहों के दलदल में मैं हूँ फँसा मदीना बुला लीजिए मैं देखूँ वो रौज़ा, मैं देखूँ वो जाली बुला लीजे मुझ को भी, सरकार-ए-'आली ! कहाँ जाए, आक़ा ! ये मँगता भला मदीना बुला लीजिए वो रमज़ान तेरा, वो दालान तेरा वो 'अज्वा, वो ज़मज़म, ये मेहमान तेरा तेरे दर पे इफ़्तार का वो मज़ा मदीना बुला लीजिए जहाँ के सभी ज़र्रे शम्स-ओ-क़मर हैं जहाँ पे अबू-बक्र-ओ-'उस्माँ, 'उमर हैं जहाँ जल्वा-फ़रमा हैं हम्ज़ा चचा मदीना बुला लीजिए न इतना मैं माँ और बाबा को चाहूँ तुम्हें जितना चाहूँ, किसी को न चाहूँ मेरे बाल-बच्चे हों तुम पर फ़िदा मदीना बुला लीजिए हुआ है जहाँ से जहाँ ये मुनव्वर जहाँ आए जिब्रील क़ुरआन ले कर ...

दिल में हो याद तेरी गोशा-ए-तन्हाई हो / Dil Mein Ho Yaad Teri Gosha-e-Tanhai Ho

दिल में हो याद तेरी गोशा-ए-तन्हाई हो फिर तो ख़ल्वत में 'अजब अंजुमन-आराई हो आस्ताने पे तेरे सर हो अजल आई हो और, ऐ जान-ए-जहाँ ! तू भी तमाशाई हो ख़ाक-ए-पामाल ग़रीबाँ को न क्यूँ ज़िंदा करे जिस के दामन की हवा बाद-ए-मसीहाई हो उस की क़िस्मत पे फ़िदा तख़्त-ए-शही की राहत ख़ाक-ए-तयबा पे जिसे चैन की नींद आई हो ताज वालों की ये ख़्वाहिश है कि उन के दर पर हम को हासिल शरफ़-ए-नासिया-फ़रसाई हो इक झलक देखने की ताब नहीं 'आलम को वो अगर जल्वा करें कौन तमाशाई हो आज जो 'ऐब किसी पर नहीं खुलने देते कब वो चाहेंगे मेरी हश्र में रुस्वाई हो क्यूँ करें बज़्म-ए-शबिस्तान-ए-जिनाँ की ख़्वाहिश जल्वा-ए-यार जो शम'-ए-शब-ए-तन्हाई हो ख़िल'अत-ए-मग़्फ़िरत उस के लिए रहमत लाए जिस ने ख़ाक-ए-दर-ए-शह जा-ए-कफ़न पाई हो यही मंज़ूर था क़ुदरत को कि साया न बने ऐसे यकता के लिए ऐसी ही यकताई हो ज़िक्र-ए-ख़ुद्दाम नहीं मुझ को बता दें दुश्मन कोई ने'मत भी किसी और से गर पाई हो जब उठे दस्त-ए-अजल से मेरी हस्ती का हिजाब काश उस पर्दा के अंदर तेरी ज़ेबाई हो देखें जाँ-बख़्शी-ए-लब को तो कहें ख़िज़्र-ओ-मसीह क्यूँ मरे कोई अगर ऐसी ...

आक़ा का नाम लेना बड़े एहतिराम से / Aaqa Ka Naam Lena Bade Ehtiram Se

नाम-ए-अहमद का वज़ीफ़ा है हर इक ग़म का 'इलाज लाख खतरें हों इसी नाम से टल जाते हैं आक़ा का नाम लेना बड़े एहतिराम से उन पर दुरूद पढ़ना बड़े एहतिराम से ख़ाक-ए-मदीना चूमना, रहना अदब के साथ तयबा में जब भी जाना बड़े एहतिराम से महफूज़ सय्यिदा हैं, ख़ता इन से कैसे हो ज़हरा का ज़िक्र करना बड़े एहतिराम से लाज़िम है ज़िक्र-ए-हैदर-ए-कर्रार का अदब बज़्म-ए-'अली सजाना बड़े एहतिराम से तुम दश्त-ए-दर्द पार करोगे सुकून से बारह इमाम कहना बड़े एहतिराम से जन्नत के शाहज़ादे, उजागर ! हसन-हुसैन चूमे ये नाम वल्लाह बड़े एहतिराम से ये नाम कोई काम बिगड़ने नहीं देता बिगड़े भी बना देता है ये नाम-ए-मुहम्मद शायर: अल्लामा निसार अली उजागर ना'त-ख़्वाँ: हाफ़िज़ ग़ुलाम मुस्तफ़ा क़ादरी naam-e-ahmad ka wazeefa hai har ik Gam ka 'ilaaj laakh khatre.n ho.n isi naam se Tal jaate hai.n aaqa ka naam lena ba.De ehtiraam se un par durood pa.Dhna ba.De ehtiraam se KHaak-e-madina choomna, rehna adab ke saath tayba me.n jab bhi jaana ba.De ehtiraam se mehfooz sayyida hai.n, KHata in se kaise ho ...

या रब मेरी सोई हुई तक़दीर जगा दे | आँखें मुझे दी हैं तो मदीना भी दिखा दे / Ya Rab Meri Soi Hui Taqdeer Jaga De | Aankhen Mujhe Di Hain To Madina Bhi Dikha De

या रब ! मेरी सोई हुई तक़दीर जगा दे आँखें मुझे दी हैं तो मदीना भी दिखा दे सुनने की जो क़ुव्वत मुझे बख़्शी है, ख़ुदावंद ! फिर मस्जिद-ए-नबवी की अज़ानें भी सुना दे हूरों की न ग़िल्माँ की न जन्नत की तलब है मदफ़न मेरा सरकार की बस्ती में बना दे मुद्दत से मैं इन हाथों से करता हूँ दु'आएँ इन हाथों में अब जाली सुनहरी वो थमा दे मुँह हश्र में मुझ को न छुपाना पड़े, या रब ! मुझ को तेरे महबूब की चादर में छुपा दे 'इशरत को भी अब ख़ुश्बू-ए-हस्सान 'अता कर जो लफ़्ज़ कहे हैं उन्हें तू ना'त बना दे शायर: इशरत गोधरवी ना'त-ख़्वाँ: फ़रहान अली क़ादरी फ़ोज़िआ ख़ादिम राहत फ़तेह अली ख़ान  ya rab ! meri soi hui taqdeer jaga de aankhe.n mujhe di hai.n to madina bhi dikha de sun.ne ki jo quwwat mujhe baKHshi hai, KHudawand ! phir masjid-e-nabvi ki azaane.n bhi suna de hooro.n ki na Gilma.n ki na jannat ki talab hai madfan mera sarkaar ki basti me.n bana de muddat se mai.n in haatho.n se karta hu.n du'aae.n in haatho.n me.n ab jaali sunehri wo thama de munh hashr me.n mujh ...

अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू | ये ज़मीं जब न थी ये जहाँ जब न था / Allah Hoo Allah Hoo Allah Hoo | Ye Zameen Jab Na Thi Ye Jahan Jab Na Tha

तेरे ही नाम से हर इब्तिदा है तेरे ही नाम तक हर इंतिहा है तेरी हम्द-ओ-सना अल-हम्दु-लिल्लाह कि तू मेरे मुहम्मद का ख़ुदा है अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू ये ज़मीं जब न थी, ये जहाँ जब न था चाँद सूरज न थे, आसमाँ जब न था राज़-ए-हक़ भी किसी पर 'अयाँ जब न था जब न था कुछ यहाँ, था मगर तू ही तू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू पहुँचे मे'राज में 'अर्श तक मुस्तफ़ा जब न मा'बूद बंदे में पर्दा रहा तब मलाइक ने हज़रत से झुक कर कहा सारी मख़्लूक़ में हक़-नुमा तू ही तू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू डाली डाली तेरी तख़्लीक़ के गुन गाती है पत्ता पत्ता यही कहता है कि मा'बूद है तू ख़ालिक़-ए-कुल है तू इस में क्या गुफ़्तुगू सारे 'आलम को है तेरी ही जुस्तुजू तेरी जल्वा-गरी है 'अयाँ चार-सू ला-शरीका-लहू मालिक-उल-मुल्क तू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू ला-इलाहा तेरी शान, या वहदहू ! तू ख़्याल-ओ-तजस्सुस तू ही आरज़ू आँख की रौशनी दिल की आवाज़ तू था भी तू, है भी तू, ह...

अल्लाह मुआफ़ कर दे / Allah Muaf Kar De

अल्लाह ! मु'आफ़ कर दे मौला ! तू मु'आफ़ कर दे जब मुश्किलों ने घेरा, तू ने बचा लिया है दुनिया ने जब गिराया, तू ने उठा लिया है मेरे करीम ! मुझ को यूँ ही सँभाल रखना बिगड़ा जो काम मेरा, तू ने बना दिया है अल्लाह ! मु'आफ़ कर दे मौला ! तू मु'आफ़ कर दे 'इस्याँ का शोर हर पल, दिन-रात है मुसलसल मुझ को बचा ले, मौला ! मेरे सामने है दलदल रस्ता न कोई रहबर, हामी न कोई यावर प्यासा हूँ भेज दे अब तू रहमतों के बादल अल्लाह ! मु'आफ़ कर दे मौला ! तू मु'आफ़ कर दे रमज़ान का वसीला, झोली को मेरी भर दे जो हों मुरादें मेरी, तू सब को पूरी कर दे शब्बीर तेरे दर पे बन के सवाली आया कर दरगुज़र ख़ताएँ, तौबा क़ुबूल कर दे अल्लाह ! मु'आफ़ कर दे मौला ! तू मु'आफ़ कर दे शायर: शब्बीर अबू तालिब नशीद-ख़्वाँ: शब्बीर अबू तालिब allah ! mu'aaf kar de maula ! tu mu'aaf kar de jab mushkilo.n ne ghera, tu ne bacha liya hai duniya ne jab giraaya, tu ne uTha liya hai mere kareem ! mujh ko yu.n hi sambhaal rakhna big.Da jo kaam mera, tu ne bana diya hai allah ! ...

क़रीब-ए-दयार-ए-हबीब-ए-ख़ुदा में मेरा घर बनाने को जी चाहता है / Qareeb-e-Dayar-e-Habib-e-Khuda Mein Mera Ghar Banane Ko Ji Chahta Hai

क़रीब-ए-दयार-ए-हबीब-ए-ख़ुदा में मेरा घर बनाने को जी चाहता है बची ज़िंदगी अपनी सारी की सारी वहीं पर बिताने को जी चाहता है चले थे 'उमर क़त्ल करने नबी को रुख़-ए-मुस्तफ़ा पर नज़र जब पड़ी तो कहा, मुझ को कलमा पढ़ा दीजे, आक़ा ! कि अब क़ुर्ब पाने को जी चाहता है बसा जब से नज़रों में है आप का दर नहीं भाता आँखों को अब कोई मंज़र 'अता कीजिए फिर से इज़्न-ए-मदीना कि फिर दर पे आने को जी चाहता है गवर्नर हैं तयबा मुबारक शहर के वो प्यारे चचा हैं ख़ैर-उल-बशर के मिले जिन के सदक़े से इज़्न-ए-मदीना उसी दर पे जाने को जी चाहता है मदीने की गलियों के दिलकश नज़ारे जहाँ खेलते थे वो सिब्तैन प्यारे ख़ुदाया ! उन्ही पाक राहों में अपनी ये आँखें बिछाने को जी चाहता है वो जब्ल-ए-उहुद जो है प्यारा नबी का है ग़ार-ए-हिरा में उजाला नबी का तजल्ली से उस की दियों को जला कर वहीं बैठ जाने को जी चाहता है वो सिद्दीक़-ओ-फ़ारूक़-ओ-'उस्मान-ओ-हैदर जो हैं सारे असहाब-ए-आक़ा के सरवर ख़ुदा फ़ज़्ल फ़रमाए तो उन की क़ुर्बत क़यामत में पाने को जी चाहता है बक़ी'-ए-मुबारक है इक पाक गुलशन है अज़्वाज-ओ-आल-ओ-सहाबा का मदफ़न तसर्रुफ़ नहीं ...

नबियों में रसूलों में तेरी ज़ात अलग है / Nabiyon Mein Rasoolon Mein Teri Zaat Alag Hai

नबियों में रसूलों में तेरी ज़ात अलग है ऐ सरवर-ए-कौनैन ! तेरी बात अलग है इक टुकड़े पे हो जाएगा नस्लों का गुज़ारा सरकार के दरबार की ख़ैरात अलग है रातें तो मुबारक हैं बहुत और भी लेकिन मे'राज की जो रात है वो रात अलग है ये सच है कोई तूर का मेहमान बना था महबूब-ओ-मुहिब की तो मुलाक़ात अलग है मूसा को तजल्ली से नवाज़ा गया बेशक आक़ा पे 'इनायात की बरसात अलग है यूँ धूम मचाया हो कोई और तो बोलो मे'राज के उस दूल्हे की बारात अलग है नामूस-ए-रिसालत पे फ़ना कर दिया ख़ुद को अहमद रज़ा के 'इश्क़ में कुछ बात अलग है ना'रा तो लगाते हैं बहुत लोग रज़ा का गुलज़ार ! मेरे ना'रों में जज़्बात अलग है शायर: सय्यिद शाह गुलज़ार इस्माइल वास्ती क़ादरी (गुलज़ार-ए-मिल्लत) ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी nabiyo.n me.n rasoolo.n me.n teri zaat alag hai ai sarwar-e-kaunain ! teri baat alag hai ik Tuk.De pe ho jaaega naslo.n ka guzaara sarkaar ke darbaar ki KHairaat alag hai raate.n to mubaarak hai.n bahut aur bhi lekin me'raaj ki jo raat hai wo raat alag ha...