अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं / Ammi Sach Kehti Hai Ramzan Sa Mahina Koi Nahin
मेरी अम्मी, प्यारी अम्मी सच कहती है मेरी अम्मी, प्यारी अम्मी सच कहती है अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं बारह माह में इस जैसा रहमत का महीना कोई नहीं अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं सहरी की रौनक़ क्या कहना, इफ़्तार का मंज़र क्या कहना मौला से दु'आएँ माँगी है, अल्लाहु अकबर क्या कहना अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं छोटा सा इक बच्चा हूँ, फिर भी रोज़े रखता हूँ रहम-ओ-करम का तालिब हूँ, पाँचों नमाज़ें पढ़ता हूँ अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं है ढाल जहन्नम से रोज़ा, जन्नत का रस्ता है रोज़ा मालिक भी राज़ी होता है, ईमान का रिश्ता है रोज़ा अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं शुक्र, उजागर ! है रब का, छोटे-बड़े सब आए हैं रोज़ा-कुशाई है मेरी, तोहफ़े भी सब लाए हैं अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं मेरी अम्मी, प्यारी अम्मी सच कहती है मेरी अम्मी, प्यारी अम्मी सच कहती है शायर: अल्लामा निसार अली उजागर नशीद-ख़्वाँ: साहिल रज़ा क़ादरी meri ammi, pyaari ammi sach kehti hai meri ammi, pyaari ammi sach kehti hai ammi sach kehti hai ...