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काश इक रोज़ घर मेरे ग़ौस-उल-वरा आप तशरीफ़ लाएँ तो क्या पूछना / Kash Ek Roz Ghar Mere Ghaus-ul-wara Aap Tashreef Layein To Kya Poochhna

काश ! इक रोज़ घर मेरे, ग़ौस-उल-वरा ! आप तशरीफ़ लाएँ तो क्या पूछना अपने नूरानी क़दमों से घर को मेरे आ के जन्नत बनाएँ तो क्या पूछना ग़ौस-ए-आ'ज़म ने मुझ पे करम ये किया मुझ से 'आसी को रौज़े पे बुलवा लिया अब इन्हीं जालियों में मुझे एक दिन अपना जल्वा दिखाएँ तो क्या पूछना एक दिन जब सजे महफ़िल-ए-मुस्तफ़ा ग़ौस-ए-आ'ज़म हों और हों सभी औलिया मैं पढ़ूँ झूम के ना'त सरकार की सुन के वो मुस्कुराएँ तो क्या पूछना ये जिगर हो या सर हो या हो चश्म-ए-नम आप ने तो किए हैं सभी पे करम अब ज़रा मेरे दिल पे भी रख दें क़दम दिल मेरा जगमगाए तो क्या पूछना जाम 'इरफ़ान का बहर-ए-'इरफ़ान से क़ुत्ब-ओ-अब्दाल आते हैं पीने जिसे काश गुलज़ार ! मुझ को भी इक दिन वही जाम भर कर पिलाएँ तो क्या पूछना शायर: सय्यिद शाह गुलज़ार इस्माईल वास्ती क़ादरी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी kaash ! ik roz ghar mere, Gaus-ul-wara ! aap tashreef laae.n to kya poochhna apne nooraani qadmo.n se ghar ko mere aa ke jannat banaae.n to kya poochhna Gaus-e-aa'zam ne mujh pe karam ye kiya mu...

बग़दाद वाले मीराँ रौशन-ज़मीर | मेरे पीरान-ए-पीर मेरे पीरान-ए-पीर / Baghdad Wale Meeran Raushan Zameer | Mere Peeran-e-Peer Mere Peeran-e-Peer

मेरे पीरान-ए-पीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! बग़दाद वाले मीराँ रौशन-ज़मीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! मौला 'अली के तुम हो दुलारे ज़हरा की आँखों के तारे जूद-ओ-सख़ा है तेरी बे-नज़ीर मेरे पीरान-ए-पीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! बग़दाद वाले मीराँ रौशन-ज़मीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! अल्लाह अल्लाह ! ये उन का रुत्बा दीन-ए-ख़ुदा के वो हैं मसीहा ख़ल्क़-ए-ख़ुदा के हैं दस्त-गीर मेरे पीरान-ए-पीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! बग़दाद वाले मीराँ रौशन-ज़मीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! राह-ए-यक़ीं पर तुम ने चलाया बंदों को रब से तुम ने मिलाया वल्लाह, सब हैं तुम्हारे असीर मेरे पीरान-ए-पीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! बग़दाद वाले मीराँ रौशन-ज़मीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! जब से तुम्हारे दर पे गिरा हूँ 'इज़्ज़त की मसनद पे खड़ा हूँ कहलाता हूँ तुम्हारा फ़क़ीर मेरे पीरान-ए-पीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! बग़दाद वाले मीराँ रौशन-ज़मीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! मेरे पीरान-ए-पीर ! आ जाना तुम क़ब्र में मेरी होगी वहाँ पर सख़्त अँधेरी मुझ को सताएँ न मुनकर...

मिला है माँगने वालों को सदक़ा ग़ौस-ए-आज़म का / Mila Hai Mangne Walon Ko Sadqa Ghaus-e-Azam Ka

मिला है माँगने वालों को सदक़ा ग़ौस-ए-आ'ज़म का कभी ख़ाली नहीं लौटा है मँगता ग़ौस-ए-आ'ज़म का मुबारक हो रुऊसान-ए-शहर की चौखटें तुम को हमारे वास्ते काफ़ी है टुकड़ा ग़ौस-ए-आ'ज़म का मेरे आ'माल मुझ को ले के जाएँगे जहन्नम तक मगर मुझ को बचा लेगा वसीला ग़ौस-ए-आ'ज़म का मेरे सरकार-ए-सुरकाँही की 'अज़मत पूछते क्या हो है मेरा रहनुमा बेशक दुलारा ग़ौस-ए-आ'ज़म का फ़रिश्ते देख कर उस को लहद में मुस्कुराएँगे जो दिल से हो गया, जौहर ! है शैदा ग़ौस-ए-आ'ज़म का शायर: जौहर वैशालवी ना'त-ख़्वाँ: जौहर वैशालवी mila hai maangne waalo.n ko sadqa Gaus-e-aa'zam ka kabhi KHaali nahi.n lauTa hai mangta Gaus-e-aa'zam ka mubaarak ho ru.oosaan-e-shahar ki chaukhaTe.n tum ko hamaare waaste kaafi hai Tuk.Da Gaus-e-aa'zam ka mere aa'maal mujh ko le ke jaaenge jahannam tak magar mujh ko bacha lega waseela Gaus-e-aa'zam ka mere sarkaar-e-surkaanhi ki 'azmat poochhte kya ho hai mera rahnuma beshak dulaara Gaus-e-aa'zam ka farishte dekh kar us ko...

गुल-ए-बोस्तान-ए-नबी ग़ौस-ए-आज़म / Gul-e-Bostan-e-Nabi Ghaus-e-Azam

गुल-ए-बोस्तान-ए-नबी ग़ौस-ए-आ'ज़म ! मह-ए-आसमान-ए-'अली ग़ौस-ए-आ'ज़म ! जिसे चाहे कर दे 'अता सर-बुलंदी मिली है तुझे ख़ुसरवी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! वली हो गया वो इशारे से तेरे सदा जिस ने की रह-ज़नी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! बढ़ा हाथ तेरी तरफ़ मुफ़्लिसों का नज़र तेरी जानिब उठी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तू वो गुल है बाग़-ए-हुसैन-ओ-हसन का कि बू तेरी सब में बसी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! हो सरसब्ज़ शादाब बाग़-ए-तमन्ना रहे शाख़ दिल की हरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! जमील ! अपनी झोली को फैला भरेंगे कि दाता हैं तेरे सख़ी ग़ौस-ए-आ'ज़म शायर: मौलाना जमीलुर्रहमान क़ादरी रज़वी ना'त-ख़्वाँ: सलमान अत्तारी मदनी gul-e-bostaan-e-nabi Gaus-e-aa'zam ! mah-e-aasmaan-e-'ali Gaus-e-aa'zam ! jise chaahe kar de 'ata sar-bulandi mili hai tujhe KHusrawi, Gaus-e-aa'zam ! wali ho gaya wo ishaare se tere sada jis ne ki rah-zani, Gaus-e-aa'zam ! ba.Dha haath teri taraf mufliso.n ka nazar teri jaanib uThi, Gaus-e-aa'zam ! tu wo gul hai baaG-e-husain-o-hasan ka ki boo teri sab me.n b...

तेरी ज़ात है अब्क़री ग़ौस-ए-आज़म / Teri Zaat Hai Abqari Ghaus-e-Azam

तेरी ज़ात है 'अब्क़री, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! मिली है तुझे सरवरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तेरा बंदा दोज़ख़ की आतिश से, मौला ! बरी है बरी है बरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! ख़ुदा का करम है मैं बंदा हूँ तेरा हुआ जब से मैं क़ादरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तेरा, तेरे बाबा का ज़िक्र-ए-मु'अत्तर यही है मेरी शा'इरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! कभी ख़्वाब में आ के जल्वा दिखाओ नज़र मुंतज़िर है मेरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तेरे दर पे जाऊँ तो वापस न आऊँ मुयस्सर हो वो हाज़िरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! करूँ हर घड़ी तेरे नाना की ख़िदमत मुझे दे दे वो नौकरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! सँवर जाए मेरे मुक़द्दर की बिगड़ी नज़र डालो इक सरसरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तू है 'अब्द-ए-क़ादिर, तेरा रब है क़ादिर ज़हे-बख़्त मैं क़ादरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तेरे दुश्मनों पर ख़ुदा के ग़ज़ब की क़हर बन के बिजली गिरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तू वो बंदा-परवर है फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा से फ़िदा तुझ पे है परवरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! ज़माने के हालात तुझ पर 'अयाँ हैं सभी बातिनी ज़ाहिरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! हर इक शातिम-ए-मुस्तफ़ा को सज़ा दो यही 'अर्ज़ है आख़िरी, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! शहा ! अपने अय्यूब पर इक नज़र ह...

वो ग़ौस-उल-वरा आफ़ताब-ए-विलायत की चौखट पे जाने को जी चाहता है / Wo Ghaus-ul-wara Aaftab-e-Wilayat Ki Chaukhat Pe Jane Ko Ji Chahta Hai

वो ग़ौस-उल-वरा आफ़ताब-ए-विलायत की चौखट पे जाने को जी चाहता है दर-ए-ग़ौस-ए-कौनैन पे जा के अपना मुक़द्दर जगाने को जी चाहता है इशारे पे तेरे उभर आई कश्ती, जो बारह बरस क़ब्ल ग़र्क़ हुई थी तेरी शान-ओ-शौकत के आगे सर-ए-दिल मेरा अब झुकाने को जी चाहता है मेरे ग़ौस का हर-सू ज़िक्र-ए-जली हो, हवा क़ादरियत की हर-सू चली हो मुझे ग़ौस-ए-कौनैन की ग्यारहवीं में यूँ धूमें मचाने को जी चाहता है बड़ा दर्द देते हैं ये दुनिया वाले, ख़ुदा-रा मुझे अपने दर पर बुला ले मेरे ग़ौस ! अब हाल-ए-दिल अपना रो रो के तुझ को सुनाने को जी चाहता है तेरे नाम का विर्द क्यूँ न करूँ मैं, तेरी ज़ात-ए-हक़ पर न क्यूँकर मरूँ मैं तू है आइना जल्वा-ए-मुस्तफ़ा का, तेरा फ़ैज़ पाने को जी चाहता है यही 'अर्ज़ करता है अय्यूब बिल्कुल, बना लो इसे अपने गुलशन का बुलबुल ऐ ग़ौस-उल-वरा ! तेरी मिदहत का नग़्मा यूँही गुनगुनाने को जी चाहता है शायर: मुहम्मद अय्यूब रज़ा अमजदी ना'त-ख़्वाँ: अब्दुल मुस्तफ़ा रज़वी अदोनी wo Gaus-ul-wara aaftaab-e-wilaayat ki chauKHat pe jaane ko jee chaahta hai dar-e-Gaus-e-kaunain pe ja ke apna muqaddar ja...

नज़ारा हो दरबार का ग़ौस-ए-आज़म / Nazara Ho Darbar Ka Ghaus-e-Azam

नज़ारा हो दरबार का, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! दिखा नीला गुंबद दिखा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! मुझे जाम-ए-उल्फ़त पिला, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! रहूँ मस्त-ओ-बेख़ुद सदा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! करम कीजिए फिर मैं बग़दाद आऊँ मेरे पीर का वासिता, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! मुझे अपनी चौखट का कुत्ता बना लो हमेशा रहूँ बा-वफ़ा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तेरे आस्ताँ का हूँ मँगता, गुज़ारा है टुकड़ों पे तेरे मेरा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! गुनाहों का बार अपने सर पर उठा कर फिरूँ कब तलक जा-ब-जा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! 'इलाज आख़िर ऐ मुर्शिदी कब करेंगे ! गुनाहों के बीमार का, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! गुनहगार हूँ गर 'अज़ाबों ने घेरा तो होगा मेरा हाए क्या, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! नज़र, मुर्शिदी ! तेरी जानिब लगी है 'अज़ाबों से लेना बचा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! जहाँ में जियूँ सुन्नतों के मुताबिक़ मदीने में हो ख़ातिमा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! हो 'अत्तार की बे-सबब बख़्शिश, आक़ा ! ये फ़रमाएँ हक़ से दु'आ, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! शायर: मुहम्मद इल्यास अत्तार क़ादरी ना'त-ख़्वाँ: आरिफ़ अत्तारी nazaara ho darbaar ka, Gaus-e-aa'zam ! dikha neela gumbad dikha, Ga...

तेरी मदह-ख़्वाँ हर ज़बाँ ग़ौस-ए-आज़म / Teri Madh-Khwan Har Zabaan Ghaus-e-Azam

रौनक़-ए-कुल-औलिया, या ग़ौस-ए-आ'ज़म दस्त-गीर ! पेशवा-ए-अस्फ़िया, या ग़ौस-ए-आ'ज़म दस्त-गीर ! तेरी मदह-ख़्वाँ हर ज़बाँ, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तेरा नाम मोमिन की जाँ, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! या महबूब-ए-सुब्हानी ! तुम हो क़ुत्ब-ए-रब्बानी या महबूब-ए-सुब्हानी ! तुम हो क़ुत्ब-ए-रब्बानी पनाह-ए-ग़रीबाँ तेरी ज़ात-ए-वाला तेरा घर है दारुल-अमाँ, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तेरी मदह-ख़्वाँ हर ज़बाँ, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तेरा नाम मोमिन की जाँ, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! या महबूब-ए-सुब्हानी ! तुम हो क़ुत्ब-ए-रब्बानी या महबूब-ए-सुब्हानी ! तुम हो क़ुत्ब-ए-रब्बानी ज़माना न क्यूँकर हो मेहमाँ कि तुम ने बिछाया है रहमत का ख़्वाँ, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तेरी मदह-ख़्वाँ हर ज़बाँ, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तेरा नाम मोमिन की जाँ, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! या महबूब-ए-सुब्हानी ! तुम हो क़ुत्ब-ए-रब्बानी या महबूब-ए-सुब्हानी ! तुम हो क़ुत्ब-ए-रब्बानी जिसे शक हो वो ख़िज़्र से पूछ देखे तेरी मजलिसों का समाँ, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तेरी मदह-ख़्वाँ हर ज़बाँ, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तेरा नाम मोमिन की जाँ, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! या महबूब-ए-सुब्हानी ! तुम हो क़ुत्ब-ए-रब्बानी या महबूब-ए-सुब्हानी ! तुम...

मुस्तफ़ा जान-ए-रहमत पे लाखों सलाम (मुख़्तसर) / Mustafa Jaan-e-Rehmat Pe Lakhon Salam (Short)

Mustafa Jane Rehmat Pe Lakhon Salam Lyrics in Hindi & English मुस्तफ़ा जान-ए-रहमत पे लाखों सलाम शम'-ए-बज़्म-ए-हिदायत पे लाखों सलाम मेहर-ए-चर्ख़-ए-नुबुव्वत पे रौशन दुरूद गुल-ए-बाग़-ए-रिसालत पे लाखों सलाम शहरयार-ए-इरम, ताजदार-ए-हरम नौ-बहार-ए-शफ़ा'अत पे लाखों सलाम शब-ए-असरा के दूल्हा पे दाइम दुरूद नौशा-ए-बज़्म-ए-जन्नत पे लाखों सलाम 'अर्श ता फ़र्श है जिस के ज़ेर-ए-नगीं उस की क़ाहिर रियासत पे लाखों सलाम फ़त्ह-ए-बाब-ए-नुबुव्वत पे बेहद दुरूद ख़त्म-ए-दौर-ए-रिसालत पे लाखों सलाम हम ग़रीबों के आक़ा पे बेहद दुरूद हम फ़क़ीरों की सरवत पे लाखों सलाम दूर-ओ-नज़दीक के सुनने वाले वो कान कान-ए-ला'ल-ए-करामत पे लाखों सलाम जिस के माथे शफ़ा'अत का सेहरा रहा उस जबीन-ए-स'आदत पे लाखों सलाम जिन के सज्दे को मेहराब-ए-का'बा झुकी उन भवों की लताफ़त पे लाखों सलाम जिस तरफ़ उठ गई दम में दम आ गया उस निगाह-ए-'इनायत पे लाखों सलाम नीची आँखों की शर्म-ओ-हया पर दुरूद ऊँची बीनी की रिफ़'अत पे लाखों सलाम पतली पतली गुल-ए-क़ुद्‌स की पत्तियाँ उन लबों की नज़ाकत पे लाखों सलाम वो दहन जिस की...