मुस्तफ़ा का ख़ुदा और ख़ुद मुस्तफ़ा / Mustafa Ka Khuda Aur Khud Mustafa
मुस्तफ़ा का ख़ुदा और ख़ुद मुस्तफ़ा क्यूँ कहूँ मेरा कोई सहारा नहीं मैं मदीने से लेकिन बहुत दूर हूँ ये ख़लिश मेरे दिल को गवारा नहीं आप का 'इश्क़ है 'इश्क़-ए-रब्ब-उल-'उला आप का ज़िक्र है ख़ास ज़िक्र-ए-ख़ुदा ख़ुद ख़ुदा ने ये क़ुरआँ में ए'लाँ किया जो तुम्हारा नहीं वो हमारा नहीं इस्म-ए-अहमद की ता'ज़ीम के मुन्किरो ! इस की 'अज़मत को क़ुरआन से देख लो बे-लक़ब उन का इस्म-ए-मुबारक कहीं उन के मा'बूद ने भी पुकारा नहीं ठोकरों के सिवा और पाएगा क्या जिस की मंज़िल का कोई न हो रहनुमा अपनी मंज़िल पे हरगिज़ न पहुँचेगा वो हाथ में जिस के दामन तुम्हारा नहीं 'अक़्ल-ए-जिन्न-ओ-बशर का यहाँ ज़िक्र क्या सिदरा वाले जहाँ दंग-ओ-हैरान हैं रिफ़'अत-ए-मुस्तफ़ा की मिले हद किसे ये वो दरिया है जिस का किनारा नहीं वो ही रौज़े पे बुलवाएँगे एक दिन ऐ सिकंदर ! ज़रा सब्र से काम ले उन के दर का गदा और मायूस हो मेरे सरकार को ये गवारा नहीं ना'त-ख़्वाँ: ओवैस रज़ा क़ादरी मुहम्मद हस्सान रज़ा क़ादरी mustafa ka KHuda aur KHud mustafa kyu.n kahu.n mera koi sahaara nahi.n mai.n madine s...