मुझे मुस्तफ़ा के दर से भला क्या मिला नहीं है / Mujhe Mustafa Ke Dar Se Bhala Kya Mila Nahin Hai
मुझे मुस्तफ़ा के दर से भला क्या मिला नहीं है मैं ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा हूँ, मेरे पास क्या नहीं है यूँही ना'त पढ़ते पढ़ते किसी दिन निकल पड़ूँगा मेरे वासिते मदीना कोई मसअला नहीं है आया जब भी कोई मँगता, उसे पेट-भर खिलाया कई दिन से घर में चूल्हा 'अली का जला नहीं है ये हुसैन ही का सर है, ये हुसैन का है सज्दा जो झुका है कर्बला में अभी तक उठा नहीं है यही कह रही है असग़र के लबों की मुस्कुराहट वहाँ ज़िंदगी नहीं है जहाँ कर्बला नहीं है अरे बे-ख़बर यज़ीदी ! तुझे कुछ पता नहीं है वो नहीं है मुस्तफ़ा का, जो हुसैन का नहीं है अदा हक़्क़-ए-'अब्दियत हो, मुझे ऐसी शब 'अता कर कहा रब से फ़ातिमा ने, मेरा दिल भरा नहीं है जो था अहल-ए-हक़ का मस्लक, वही है रज़ा का मस्लक ये तुम्हारा छटपटाना किसी काम का नहीं है यूँही आतिश-ए-हसद में जलो तुम हमेशा हासिद क्या मक़ाम-ए-अज़हरी है तुम्हें कुछ पता नहीं है ये है रोज़-ए-हश्र, ज़मज़म ! यहाँ है 'अजीब 'आलम कोई आदमी किसी को यहाँ पूछता नहीं है शायर: ज़मज़म फ़तेहपुरी ना'त-ख़्वाँ: ज़मज़म फ़तेहपुरी मुफ़्ती आरिफ़ रज़ा क़ुरैशी mujhe mustafa ke dar se bhala k...