आख़री रोज़े हैं दिल ग़मनाक मुज़्तर जान है / Aakhri Roze Hain Dil Ghamnak Muztar Jaan Hai
आख़िरी रोज़े हैं दिल ग़मनाक मुज़्तर जान है हसरता वा-हसरता अब चल दिया रमज़ान है 'आशिक़ान-ए-माह-ए-रमज़ाँ रो रहे हैं फूट कर दिल बड़ा बेचैन है, अफ़्सुर्दा रूह-ओ-जान है दर्द-ओ-रिक़्क़त से पछाड़ें खा के रोता है कोई तो कोई तस्वीर-ए-ग़म बन कर खड़ा हैरान है अल-फ़िराक़ आह अल-फ़िराक़, ऐ रब के मेहमाँ ! अल-फ़िराक़ अल-वदा' अब चल दिया तू, ऐ मह-ए-रमज़ान ! है दास्तान-ए-ग़म सुनाएँ किस को जा कर आह ! हम या रसूलल्लाह ! देखो चल दिया रमज़ान है ख़ूब रोता है, तड़पता है ग़म-ए-रमज़ान में जो मुसलमाँ क़द्र-दान-ओ-'आशिक़-ए-रमज़ान है रोते रोते हिचकियाँ बँध जाती हैं 'उश्शाक़ की तुझ में कैसा सोज़, ऐ अल्लाह के मेहमान ! है तेरी फ़ुर्क़त में तेरे 'आशिक़ का दिल टुकड़े हुआ और सीना चाक तेरे हिज्र में, रमज़ान ! है वक़्त-ए-इफ़्तार-ओ-सहर की रौनक़ें होंगी कहाँ ! चंद दिन के बा'द ये सारा समाँ सुनसान है तेरी आमद से दिल-ए-पज़मुर्दा खिल उट्ठे मगर जल्द तड़पा कर हमें तू चल दिया, रमज़ान ! है हाए सद अफ़्सोस ! रमज़ाँ की न हम ने क़द्र की बे-सबब ही बख़्श दे, या रब ! की तू रहमान है माह-ए-रमज़ाँ ! तुझ में जो रोज़े नहीं रखता कोई वो बड़ा महरूम है...