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क्या मर्तबा है हज़रत-ए-उस्मान-ए-ग़नी का / Kya Martaba Hai Hazrat-e-Usman-e-Ghani Ka

क्या मर्तबा है हज़रत-ए-'उस्मान-ए-ग़नी का जन्नत है सिला उल्फ़त-ए-'उस्मान-ए-ग़नी का ज़ुन्नूर सहाबा में फ़क़त ज़ात थी उन की है राज़ यही हुरमत-ए-'उस्मान-ए-ग़नी का थे जूद-ओ-सख़ा में भी वो मशहूर-ए-ज़माना चर्चा था अगर दौलत-ए-'उस्मान-ए-ग़नी का इक लहजा-ए-क़िरअत पे हैं क़ुरआन के जामे' ए'ज़ाज़ है ये हज़रत-ए-'उस्मान-ए-ग़नी का लाज़िम है मवद्दत भी उसे आल-ए-नबी की दा'वा हो जिसे निस्बत-ए-'उस्मान-ए-ग़नी का शादाँ है रशीद आल-ए-पयम्बर की रज़ा में रखता है शरफ़ मिदहत-ए-'उस्मान-ए-ग़नी का ना'त-ख़्वाँ: ज़ुल्फ़िक़ार अली हुसैनी kya martaba hai hazrat-e-'usman-e-Gani ka jannat hai sila ulfat-e-'usman-e-Gani ka zunnoor sahaaba me.n faqat zaat thi un ki hai raaz yahi hurmat-e-'usman-e-Gani ka the jood-o-saKHa me.n bhi wo mash.hoor-e-zamaana charcha tha agar daulat-e-'usman-e-Gani ka ik lehja-e-qir.at pe hai.n qur.aan ke jaame' e'zaaz hai ye hazrat-e-'usman-e-Gani ka laazim hai mawaddat bhi use aal-e-nabi ki daa'wa ho jise

ख़ल्क़ पे लुत्फ़-ए-ख़ुदा हज़रत-ए-उस्मान हैं / Khalq Pe Lutf-e-Khuda Hazrat-e-Usman Hain

ख़ल्क़ पे लुत्फ़-ए-ख़ुदा हज़रत-ए-'उस्मान हैं जुमला मरज़ की दवा, दर्द के दरमान हैं ख़ल्क़ पे लुत्फ़-ए-ख़ुदा हज़रत-ए-'उस्मान हैं नूर-ए-दिल-ओ-'ऐन हैं, साहिब-ए-नूरैन हैं सब के दिल के चैन हैं, मोमिनों की जान हैं ख़ल्क़ पे लुत्फ़-ए-ख़ुदा हज़रत-ए-'उस्मान हैं दस्त-ए-शह-ए-दो-सरा जो कि यदुल्लाह था हाथ बना आप का, आप वो ज़ीशान हैं ख़ल्क़ पे लुत्फ़-ए-ख़ुदा हज़रत-ए-'उस्मान हैं आप ममदूह-ए-जहाँ ख़ल्क़-ए-ख़ुदा मदह-ख़्वाँ क्या है अगर बदगुमाँ चंद बे-ईमान हैं ख़ल्क़ पे लुत्फ़-ए-ख़ुदा हज़रत-ए-'उस्मान हैं गुलशन-ए-दीं की बहार, मोमिनो के ताजदार 'इज़्ज़त-ए-हर-ज़ी-वक़ार, ज़ीनत-ए-ईमान हैं ख़ल्क़ पे लुत्फ़-ए-ख़ुदा हज़रत-ए-'उस्मान हैं हक़ ने वो रुत्बा दिया, तुम ग़नी हम सब गदा क्या कहूँ मैं तुम हो क्या, 'अक़्ल-ओ-दिल हैरान हैं ख़ल्क़ पे लुत्फ़-ए-ख़ुदा हज़रत-ए-'उस्मान हैं जो हैं इमाम-ए-अनाम, जिस के हैं हम सब ग़ुलाम मरजा'-ए-हर-ख़ास-ओ-'आम हज़रत-ए-'उस्मान हैं ख़ल्क़ पे लुत्फ़-ए-ख़ुदा हज़रत-ए-'उस्मान हैं तुम ग़नी, सालिक गदा, इक नज़र बहर-ए-ख़ुदा आप जहाँ के लिए रहमत-ए-रहमान हैं ख़ल्क़ पे लुत्फ़-ए-ख़ुदा हज़र

सारे जग नालों लग दियाँ चंगियाँ मदीने दियाँ पाक गलियाँ / Sare Jag Nalon Lagdiyan Changiyan Madine Diyan Pak Galiyan

सारे जग नालों लग दियाँ चंगियाँ मदीने दियाँ पाक गलियाँ रहियाँ महक जीवें जन्नत दियाँ कलियाँ मदीने दियाँ पाक गलियाँ इहनाँ गलियाँ तों तन मन वारिये, करिये सज्दे ते शुक्र गुज़ारिये एथे नूर दियाँ सुचियाँ ने थलियाँ, मदीने दियाँ पाक गलियाँ इहनाँ गलियाँ च रह्या सोहणा फिर दा, सानूँ वेखणे दा चा बड़े चिर दा एथे लगियाँ मेरे नबी दियाँ तलियाँ, मदीने दियाँ पाक गलियाँ अब्र रहमताँ दे सदा उथे वस दे, जाँदे रोंदे ते औंदे ने हस दे रल वेखणे नूँ सय्याँ ने चलियाँ, मदीने दियाँ पाक गलियाँ इहनाँ गलियाँ नूँ जेहड़े वेख औंदे, ओ ते जन्नताँ नूँ हेण भुल जाँदे तर गए जिन्हाँ ने तक लय्याँ, मदीने दियाँ पाक गलियाँ पावे इहनाँ गलियाँ दा दीदार जो, हो जावे रहमताँ दा हक़दार ओ तर गए जिन्हाँ ने तक लय्याँ, मदीने दियाँ पाक गलियाँ ना'त-ख़्वाँ: ओवैस रज़ा क़ादरी मुहम्मद हस्सान रज़ा क़ादरी अश्फ़ाक़ अत्तारी saare jag naalo.n lag diya.n changiya.n madine diya paak galiya.n rahiya mehk jeewe.n jannat diya.n kaliya.n madine diya paak galiya.n ihna.n galiya.n to.n tan man waariye kariye sajde te shukr guzaariye

नवासा याद आता है तो आँखें भीग जाती हैं / Nawasa Yaad Aata Hai To Aankhen Bheeg Jati Hai

नवासा याद आता है तो आँखें भीग जाती हैं वो नाना याद आता है तो आँखें भीग जाती हैं वो गलियाँ और वो मस्जिद जहाँ शब्बीर रहते थे मदीना याद आता है तो आँखें भीग जाती हैं मज़ार-ए-सरवर-ए-'आलम से वो किस दिल से बिछड़े थे बिछड़ना याद आता है तो आँखें भीग जाती हैं हज़ारों ख़त जहाँ से आल-ए-सरवर के लिए आए वो कूफ़ा याद आता है तो आँखें भीग जाती हैं जिसे सुनते ही हुर्र शब्बीर के क़दमों में आए थे वो ख़ुत्बा याद आता है तो आँखें भीग जाती हैं गले पर तीर जिस के हुरमला ज़ालिम ने मारा था वो बच्चा याद आता है तो आँखें भीग जाती हैं उठाते ही जिसे शब्बीर के सब बाल पक जाएँ वो लाशा याद आता है तो आँखें भीग जाती हैं उधर 'अब्बास के बाज़ू, इधर नन्ही सकीना का तड़पना याद आता है तो आँखें भीग जाती हैं बहत्तर ज़ख़्म, तीर-ओ-ख़ंजर-ओ-तलवार हर जानिब वो सज्दा याद आता है तो आँखें भीग जाती हैं बदन पर जिस जगह शब्बीर के घोड़े थे दौड़ाए वो सहरा याद आता है तो आँखें भीग जाती हैं बहत्तर ज़ख़्म, लाखों ग़म, बहत्तर घंटो का रोज़ा वो रोज़ा याद आता है तो आँखें भीग जाती हैं उठा कर जिस पे लाशे आप लाए अपने ख़ैमे तक वो काँधा याद आता है तो आ

आक़ा आक़ा बोल बंदे आक़ा आक़ा बोल / Aaqa Aaqa Bol Bande Aaqa Aaqa Bol

आक़ा आक़ा बोल, बंदे ! आक़ा आक़ा बोल ज़िक्र-ए-नबी तू करता जा, ये ज़िक्र बड़ा अनमोल ऐसा दिन भी आ जाए सरकार के दर पे बैठे हों लब ख़ामोश ज़बाँ बन जाएँ आँसू 'अर्ज़ा करते हों उन के दर पर रोने वाले ! दिल से कुछ तो बोल आक़ा आक़ा बोल, बंदे ! आक़ा आक़ा बोल सरकार-ए-दो-'आलम प्यार-ए-आक़ा जिधर से गुज़रा करते थे शजर गवाही देता था और पत्थर कलमा पढ़ते थे नूर-ए-ख़ुदा के मुन्किर अब तो अपनी आँखें खोल आक़ा आक़ा बोल, बंदे ! आक़ा आक़ा बोल आओ चलो, दीवानो ! सारे शहर-ए-मदीना चलते हैं मेरी क्या औक़ात है, सब ही उन के दर से पलते हैं ग़ैरों को भी देते हैं वो बिन माँगे बिन मोल आक़ा आक़ा बोल, बंदे ! आक़ा आक़ा बोल जब से होश सँभाला है, मैं उन की ना'तें पढ़ता हूँ गुस्ताख़ी न हो जाए, मैं सँभल सँभल के चलता हूँ माँ की दु'आओं का सदक़ा है ऐसा मिला माहौल आक़ा आक़ा बोल, बंदे ! आक़ा आक़ा बोल राशिद ! नातें लिखना पढ़ना ये है बढ़ा ए'ज़ाज़ उन के करम के सदक़े ही से ऊँची है परवाज़ ना'त-ए-नबी तू सुनाए जा और कानों में रस गोल आक़ा आक़ा बोल, बंदे ! आक़ा आक़ा बोल शायर: मुहम्मद राशिद आज़म ना'त-ख़्वाँ: मुहम्मद राशिद आज़म फ़रहान अली

दुनिया के ऐ मुसाफ़िर मंज़िल तेरी क़बर है / Duniya Ke Aye Musafir Manzil Teri Qabar Hai

दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है जब से बनी है दुनिया लाखों-करोड़ों आए बाक़ी रहा न कोई, मिट्टी में सब समाए इस बात को न भूलो, सब का यही हशर है दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है आँखों से तू ने अपनी देखे कई जनाज़े हाथों से तू ने अपने दफ़नाए कितने मुर्दे अंजाम से तू अपने क्यूँ इतना बे-ख़बर है दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है ये 'आलिशान बंगले किसी काम के नहीं हैं महलों में सोने वाले मिट्टी में सो रहे हैं दो गज़ ज़मीं का टुकड़ा छोटा सा तेरा घर है दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है मख़मल पे सोने वाले मिट्टी में सो रहे हैं शाह-ओ-गदा यहाँ पर सब एक हो रहे हैं दोनों हुए बराबर, ये मौत का असर है दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है मिट्टी के पुतले ! तू ने मिट्टी में है समाना इक दिन यहाँ तू आया, इक दिन यहाँ से जाना रुकना नहीं यहाँ पर, जारी तेरा सफ़र है दुनिया के

रौज़ा-ए-मुहम्मद पर एक दिन मैं जाऊँगा / Roza-e-Muhammad Par Ek Din Main Jaunga

मौला ! तयबा बुला ले, मौला ! तयबा बुला ले अपने रब से रोज़-ओ-शब आस ये लगाऊँगा रौज़ा-ए-मुहम्मद पर एक दिन मैं जाऊँगा अपने रब से रोज़-ओ-शब आस ये लगाऊँगा तिश्नगी मेरे लब की हद से बढ़ रही है अब पी के आब-ए-ज़मज़म मैं तिश्नगी बुझाऊँगा रौज़ा-ए-मुहम्मद पर एक दिन मैं जाऊँगा इक बार मदीने में हो जाए मेरा जाना फिर और न कुछ माँगे सरकार से दीवाना दीद को मदीना की दिल मेरा तड़पता है मुज़्तरिब निगाहों को का'बा भी दिखाऊँगा रौज़ा-ए-मुहम्मद पर एक दिन मैं जाऊँगा अपने रब से रोज़-ओ-शब आस ये लगाऊँगा ग़म ने मुझ को घेरा है, दिल उदास रहता है थाम कर मैं जाली को हाल-ए-दिल सुनाऊँगा रौज़ा-ए-मुहम्मद पर एक दिन मैं जाऊँगा अपने रब से रोज़-ओ-शब आस ये लगाऊँगा 'इश्क़-ए-मुस्तफ़ा का हो हर घड़ी जुनूँ तारी इन के ही वसीले से रब को मैं मनाऊँगा रौज़ा-ए-मुहम्मद पर एक दिन मैं जाऊँगा अपने रब से रोज़-ओ-शब आस ये लगाऊँगा है दु'आ मेरी रब से आए मौत तयबा में जाऊँगा मदीने में, लौट कर न आऊँगा रौज़ा-ए-मुहम्मद पर एक दिन मैं जाऊँगा इक बार मदीने में हो जाए मेरा जाना फिर और न कुछ माँगे सरकार से दीवाना आरज़ू फ़िज़ा की है, सहन-ए-शहर-

मुझे हज पे बुला मौला मुझे काबा दिखा मौला / Mujhe Hajj Pe Bula Maula Mujhe Kaba Dikha Maula

का'बे पे पड़ी जब पहली नज़र क्या चीज़ है दुनिया भूल गया यूँ होश-ओ-ख़िरद मफ़लूज हुए दिल ज़ौक़-ए-तमाशा भूल गया पहुँचा जो हरम की चौखट तक इक अब्र-ए-करम ने घेर लिया बाक़ी न रहा फिर होश मुझे क्या माँगा और क्या भूल गया जिस वक़्त दु'आ को हाथ उठे याद आ न सका जो सोचा था इज़्हार-ए-'अक़ीदत की धुन में इज़्हार-ए-तमन्ना भूल गया मुझे हज पे बुला, मौला ! मुझे का'बा दिखा, मौला ! तू मालिक है मेरा, मौला ! मैं बंदा हूँ तेरा, मौला ! मुझे हज पे बुला, मौला ! मुझे का'बा दिखा, मौला ! था जिस दम हाथ में मेरे ग़िलाफ़-ए-ख़ाना-ए-का'बा थे आँसू आँख से जारी, थी लब पे ये सदा, मौला ! मुझे हज पे बुला, मौला ! मुझे का'बा दिखा, मौला ! तवाफ़-ए-का'बातुल्लाह कर के फिर दो नफ़्ल अदा कर के मक़ाम-ए-मुल्तज़म पर जा के माँगूँगा दु'आ, मौला ! मुझे हज पे बुला, मौला ! मुझे का'बा दिखा, मौला ! मक़ाम-ए-इब्राहिम आएगा तो सर को झुका कर मैं नवाफ़िल पढ़ के उस जा पर करूँगा शुक्र अदा, मौला ! मुझे हज पे बुला, मौला ! मुझे का'बा दिखा, मौला ! सफ़ा-मरवा पे जब मेरे लबों पर होंगी तकबीरें मेरे सर पर तेरी रहमत की

या रब बंदा तेरा | बख़्श दे ऐ मेरे अल्लाह ख़ताएँ मेरी / Ya Rab Banda Tera | Bakhsh De Aye Mere Allah Khataen Meri

तेरे दर पर पड़ा हूँ और तू है मैं साज़-ए-बे-सदा हूँ और तू है तेरी चौखट अज़ल से है ठिकाना दवारे से जुड़ा हूँ और तू है या रब ! बंदा तेरा, या रब ! बंदा तेरा या रब ! बंदा तेरा, या रब ! बंदा तेरा बख़्श दे, ऐ मेरे अल्लाह ! ख़ताएँ मेरी सदक़ा-ए-आल-ए-नबी सुन ले दु'आएँ मेरी बस यही एक सदा क़ल्ब से आती रही या रब ! बंदा तेरा, या रब ! बंदा तेरा या रब ! बंदा तेरा, या रब ! बंदा तेरा मैं गुनहगार हूँ, दामन में 'अमल कुछ भी नहीं तालिब-ए-रहम हैं अश्कों की रिदाएँ मेरी बस यही एक सदा क़ल्ब से आती रही या रब ! बंदा तेरा, या रब ! बंदा तेरा या रब ! बंदा तेरा, या रब ! बंदा तेरा लब पे इक़रार है, ऐ मेरे ख़ुदा ! जुर्मों का आँख में आँसू के मोती हैं सदाएँ मेरी बस यही एक सदा क़ल्ब से आती रही या रब ! बंदा तेरा, या रब ! बंदा तेरा या रब ! बंदा तेरा, या रब ! बंदा तेरा बारिश-ए-अफ़्व का अंदाज़ जुदा देखा है रहमतें खींचती हैं, मौला ! ख़ताएँ मेरी बस यही एक सदा क़ल्ब से आती रही या रब ! बंदा तेरा, या रब ! बंदा तेरा या रब ! बंदा तेरा, या रब ! बंदा तेरा तेरी रहमत का तलबगार हूँ, अल्लाह करम बे-नवा हूँ यही कहती हैं न

ज़हे-मुक़द्दर हुज़ूर-ए-हक़ से सलाम आया पयाम आया / Zahe Muqaddar Huzoor-e-Haq Se Salam Aaya Payam Aaya

ज़हे-मुक़द्दर हुज़ूर-ए-हक़ से सलाम आया, पयाम आया झुकाओ नज़रें, बिछाओ पलकें, अदब का आ'ला मक़ाम आया ये कौन सर से कफ़न लपेटे चला है उल्फ़त के रास्ते पर फ़रिश्ते हैरत से तक रहे हैं, ये कौन ज़ी-एहतिराम आया फ़ज़ा में लब्बैक की सदाएँ, ज़-फ़र्श ता-'अर्श गूँजती हैं हर एक क़ुर्बान हो रहा है, ज़ुबाँ पे ये किस का नाम आया ये राह-ए-हक़ है, सँभल के चलना, यहाँ है मंज़िल क़दम क़दम पर पहुँचना दर पर तो कहना, आक़ा ! सलाम लीजे ग़ुलाम आया ये कहना, आक़ा ! बहुत से 'आशिक़ तड़पते से छोड़ आया हूँ मैं बुलावे के मुंतज़िर हैं लेकिन न सुब्ह आया, न शाम आया दु'आ जो निकली थी दिल से आख़िर पलट के मक़बूल हो के आई वो जज़्बा जिस में तड़प थी सच्ची, वो जज़्बा आख़िर को काम आया ख़ुदा तेरा हाफ़िज़-ओ-निगहबाँ, ओ राह-ए-बतहा के जाने वाले ! नवीद-ए-सद-इंबिसात बन कर पयाम-ए-दारु-स्सलाम आया ना'त-ख़्वाँ: क़ारी वहीद ज़फ़र क़ासमी ओवैस रज़ा क़ादरी सय्यिदा अरीबा फ़ातिमा ज़ोहैब अशरफ़ी zahe-muqaddar huzoor-e-haq se salaam aaya, payaam aaya jhukaao nazre.n, bichhaao palke.n adab ka aa'la maqaam aaya ye kaun sar se kafan lapeT

या नबी अब मदीने बुला लीजिए / Ya Nabi Ab Madine Bula Lijiye

या नबी ! अब मदीने बुला लीजिए दूर रह कर नहीं अब गुज़ारा मेरी बे-नूर आँखों को, या सय्यिदी ! सब्ज़ गुंबद का बख़्शें नज़ारा या नबी ! अब मदीने बुला लीजिए दूर रह कर नहीं अब गुज़ारा या नबी ! अब मदीने बुला लीजिए गर्दिश-ए-ज़िंदगी ने सताया मुझे मेरे हालात ने है रुलाया मुझे मुझ बेचारे का लिल्लाह करें, या नबी ! सदक़े हसनैन के कोई चारा या नबी ! अब मदीने बुला लीजिए दूर रह कर नहीं अब गुज़ारा या नबी ! अब मदीने बुला लीजिए हालत-ए-बेबसी में कहाँ जाऊँ मैं दाग़ सीने के किस को ये दिखलाऊँ मैं नोच लेंगे ग़मों के थपेड़े मुझे आप का जो मिला न सहारा या नबी ! अब मदीने बुला लीजिए दूर रह कर नहीं अब गुज़ारा या नबी ! अब मदीने बुला लीजिए वासिता सय्यिदा का 'अता कीजिए टूटने से ख़ुदा-रा बचा लीजिए हो के 'इमरान 'आजिज़ गदा आप का कैसे फिरता रहे मारा मारा या नबी ! अब मदीने बुला लीजिए दूर रह कर नहीं अब गुज़ारा मेरी बे-नूर आँखों को, या सय्यिदी ! सब्ज़ गुंबद का बख़्शें नज़ारा या नबी ! अब मदीने बुला लीजिए दूर रह कर नहीं अब गुज़ारा या नबी ! अब मदीने बुला लीजिए शायर: हकीम इमरान आजिज़ ना'त-ख़्वाँ: अली

ऐ मेरे मौला | अपना हरम दिखा दे दोनों जहाँ के मालिक / Aye Mere Maula | Apna Haram Dikha De Donon Jahan Ke Malik

ऐ मेरे मौला ! मौला ! मौला ! मौला ! ऐ मेरे मौला ! मौला ! मौला ! मौला ! अपना हरम दिखा दे, दोनों जहाँ के मालिक ! क़िस्मत मेरी जगा दे, दोनों जहाँ के मालिक ! ऐ मेरे मौला ! मौला ! मौला ! मौला ! ऐ मेरे मौला ! मौला ! मौला ! मौला ! बरसों से आरज़ू है, तयबा की जुस्तुजू है इक बार ही दिखा दे, दोनों जहाँ के मालिक ! ऐ मेरे मौला ! मौला ! मौला ! मौला ! ऐ मेरे मौला ! मौला ! मौला ! मौला ! दुनिया-ओ-आख़िरत के हर ग़म से तू बरी कर मुज़्दा मुझे सुना दे, दोनों जहाँ के मालिक ! ऐ मेरे मौला ! मौला ! मौला ! मौला ! ऐ मेरे मौला ! मौला ! मौला ! मौला ! दुनिया के हर सितम से, 'उक़्बा के हर अलम से दामन मेरा छुड़ा दे, दोनों जहाँ के मालिक ! ऐ मेरे मौला ! मौला ! मौला ! मौला ! ऐ मेरे मौला ! मौला ! मौला ! मौला ! 'इश्क़-ए-नबी की ख़ुश्बू क़र्या-ए-जाँ में रख दे उल्फ़त में दिल बसा दे, दोनों जहाँ के मालिक ! ऐ मेरे मौला ! मौला ! मौला ! मौला ! ऐ मेरे मौला ! मौला ! मौला ! मौला ! बैठा नबी के दर पर जिस दम हो ये उजागर उस दम इसे फ़ना दे, दोनों जहाँ के मालिक ! ऐ मेरे मौला ! मौला ! मौला ! मौला ! ऐ मेरे मौला ! मौला ! म

बे-तलब भीक यहाँ मिलती है आते जाते | ये वो दर है कि जहाँ दिल नहीं तोड़े जाते / Betalab Bheek Yahan Milti Hai Aate Jate | Ye Wo Dar Hai Jahan Dil Nahin Tode Jate

बे-तलब भीक यहाँ मिलती है आते जाते ये वो दर है कि जहाँ दिल नहीं तोड़े जाते ये है आक़ा की 'इनायत, वो करम करते हैं वर्ना हम जैसे कहाँ दर पे बुलाए जाते वो मेरे दिल के धड़कने की सदा सुनते हैं इस लिए लफ़्ज़ ज़ुबाँ पर नहीं लाए जाते उन की दहलीज़ के मँगते हैं, बड़ी मौज में हैं हम से अग़्यार के टुकड़े नहीं खाए जाते ये तो सरकार की रहमत ने हमें थाम लिया वर्ना दर दर पे यूँही ठोकरे खाए जाते वो निक़ाब-ए-रुख़-ए-रौशन जो उठाते जाते मेरी बिगड़ी हुई तक़दीर बनाते जाते काश ! अपना भी मदीने में कोई घर होता देखते रौज़ा-ए-सरकार को आते जाते शहर-ए-सरकार की हम ख़ाक के ज़र्रे होते आप की राह में बिखरे हुए पाए जाते अपना मदफ़न भी मुक़द्दर से जो बन जाता बक़ी' हश्र में आप के क़दमों से उठाए जाते क़ाफ़िले वालो ! ज़रा ठहरो, मैं आता हूँ अभी एक और ना'त सुना लूँ उन्हें जाते जाते शम्मा'-ए-दीन न इस शान से रौशन होती ख़ून-ए-असग़र से न गर दीप जलाए जाते हम कहाँ होते, कहाँ होती ये महफ़िल, अल्ताफ़ ! ख़ाक-ए-कर्बल पे अगर सर न कटाए जाते शायर: सय्यिद अल्ताफ़ शाह काज़मी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद अल्ताफ़ शाह काज़मी ख़ालिद हसनैन