सुनहरी जालियाँ गुंबद सुहाना याद आता है | मुझे रह रह के आक़ा का मदीना याद आता है / Sunehri Jaliyan Gumbad Suhana Yaad Aata Hai | Mujhe Reh Reh Ke Aaqa Ka Madina Yaad Aata Hai
सुनहरी जालियाँ, गुंबद सुहाना याद आता है मुझे रह रह के आक़ा का मदीना याद आता है छमा-छम नूर की बरसात थी और सामने ख़ज़रा रसूल-ए-पाक को ना'तें सुनाना याद आता है हुदूद-ए-मस्जिद-ए-नबवी में चलना, बैठना, उठना कबूतर को वहाँ दाना खिलाना याद आता है वो छतरी ऐसे खुलती है कि जैसे पर फ़रिश्तों के फिर उस के साए में इफ़्तार करना याद आता है वो जिस ख़ुश्बू से आक़ा को सहाबा ढूँड लेते थे वो ख़ुश्बू याद आती है, पसीना याद आता है तवाफ़-ए-क़ब्र-ए-हम्ज़ा कर के कहती है हवा अब भी तुम्हारा बद्र के मैदाँ में आना याद आता है बक़ी'-ए-पाक से जब गुंबद-ए-ख़ज़रा नज़र आता कलाम-ए-आ'ला-हज़रत गुनगुनाना याद आता है बक़ी'-ए-पाक का मंज़र, सहाबा की हसीं क़ब्रें वहाँ से गुंबद-ए-ख़ज़रा को तकना याद आता है उठे ऊँगली क़मर टुकड़े हो, सूरज भी पलट आए पहाड़ों को इशारे से बुलाना याद आता है ये अहमद था नहीं लाइक़ कि जाता ये मदीने में मगर सरकार का फिर भी बुलाना याद आता है शायर: अहमदुल फ़त्ताह ना'त-ख़्वाँ: अहमदुल फ़त्ताह sunehri jaaliya.n, gumbad suhaana yaad aata hai mujhe reh reh ke aaqa ka madina yaad aata...