है कलाम-ए-इलाही में शम्सुद्दुहा तेरे चेहरा-ए-नूर-फ़ज़ा की क़सम / Hai Kalam-e-Ilahi Mein Shamsudduha Tere Chehra-e-Noor-faza Ki Qasam
है कलाम-ए-इलाही में शम्सुद्दुहा, तेरे चेहरा-ए-नूर-फ़ज़ा की क़सम क़सम-ए-शब-ए-तार में राज़ ये था, कि हबीब की ज़ुल्फ़-ए-दोता की क़सम तेरे ख़ुल्क़ को हक़ ने 'अज़ीम कहा, तेरी ख़िल्क़ को हक़ ने जमील किया कोई तुझ सा हुआ है न होगा, शहा ! तेरे ख़ालिक़-ए-हुस्न-ओ-अदा की क़सम वो ख़ुदा ने है मर्तबा तुझ को दिया, न किसी को मिले न किसी को मिला कि कलाम-ए-मजीद ने खाई, शहा ! तेरे शहर-ओ-कलाम-ओ-बक़ा की क़सम तेरा मसनद-ए-नाज़ है 'अर्श-ए-बरीं, तेरा महरम-ए-राज़ है रूह-ए-अमीं तू ही सरवर-ए-हर-दो-जहाँ है, शहा ! तेरा मिस्ल नहीं है ख़ुदा की क़सम यही 'अर्ज़ है, ख़ालिक़-ए-अर्ज़-ओ-समा ! वो रसूल हैं तेरे मैं बंदा तेरा मुझे उन के जवार में दे वो जगह, कि है ख़ुल्द को जिस की सफ़ा की क़सम तू ही बंदों पे करता है लुत़्फ़-ओ-'अता, है तुझी पे भरोसा तुझी से दु'आ मुझे जल्वा-ए-पाक-ए-रसूल दिखा, तुझे अपने ही 'इज़्ज़-ओ-'उला की क़सम मेरे गरचे गुनाह हैं हद से सिवा, मगर उन से उमीद है तुझ से रजा तू रहीम है उन का करम है गवा, वो करीम हैं तेरी 'अता की क़सम यही कहती है बुलबुल-ए-बाग़-ए-जिनाँ, कि रज़ा की तरह कोई सेहर-बयाँ नहीं हिन्द ...