नबियों में रसूलों में तेरी ज़ात अलग है / Nabiyon Mein Rasoolon Mein Teri Zaat Alag Hai
नबियों में रसूलों में तेरी ज़ात अलग है ऐ सरवर-ए-कौनैन ! तेरी बात अलग है इक टुकड़े पे हो जाएगा नस्लों का गुज़ारा सरकार के दरबार की ख़ैरात अलग है रातें तो मुबारक हैं बहुत और भी लेकिन मे'राज की जो रात है वो रात अलग है ये सच है कोई तूर का मेहमान बना था महबूब-ओ-मुहिब की तो मुलाक़ात अलग है मूसा को तजल्ली से नवाज़ा गया बेशक आक़ा पे 'इनायात की बरसात अलग है यूँ धूम मचाया हो कोई और तो बोलो मे'राज के उस दूल्हे की बारात अलग है नामूस-ए-रिसालत पे फ़ना कर दिया ख़ुद को अहमद रज़ा के 'इश्क़ में कुछ बात अलग है ना'रा तो लगाते हैं बहुत लोग रज़ा का गुलज़ार ! मेरे ना'रों में जज़्बात अलग है शायर: सय्यिद शाह गुलज़ार इस्माइल वास्ती क़ादरी (गुलज़ार-ए-मिल्लत) ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी nabiyo.n me.n rasoolo.n me.n teri zaat alag hai ai sarwar-e-kaunain ! teri baat alag hai ik Tuk.De pe ho jaaega naslo.n ka guzaara sarkaar ke darbaar ki KHairaat alag hai raate.n to mubaarak hai.n bahut aur bhi lekin me'raaj ki jo raat hai wo raat alag ha...