मुझ को ये कह के सताते हैं ज़माने वाले / Mujh Ko Ye Keh Ke Satate Hain Zamane Wale
मुझ को ये कह के सताते हैं ज़माने वाले कब बुलाएँगे तुझे सब को बुलाने वाले रास्ता रोक न पाएँगे ज़माने वाले जब मदीने में बुलाएँगे बुलाने वाले जब चलूँ शहर-ए-मदीना से तो सरकार कहें लौट आ जा, ओ मेरे शहर से जाने वाले मुझ को इस बात का हर रात यक़ीं रहता है आप हैं आज मेरे ख़्वाब में आने वाले आप को देख के महशर में कहेंगे 'आसी आ गए हम को जहन्नम से बचाने वाले काश ! महशर में ये कह कह के बुलाएँ आक़ा आ इधर आ मेरे ना'लैन उठाने वाले दीन की राह में घर-बार लुटा देते हैं ऐसे होते हैं मुहम्मद के घराने वाले अब कोई ख़ौफ़ नहीं मुझ को, ज़माने वालो ! मेरे ख़्वाजा हैं मेरी लाज बचाने वाले हश्र तक फूले-फले मस्लक-ए-आ'ला-हज़रत मिट गए ख़ुद ही ज़माने से मिटाने वाले उन से कह दो कि वो आईने में चेहरा देखें अपने जैसा मेरे आक़ा को बताने वाले ना'त-ख़्वाँ: अंबर मुशाहिदी सैफ़ रज़ा कानपुरी mujh ko ye keh ke sataate hai.n zamaane waale kab bulaaenge tujhe sab ko bulaane waale raasta rok na paaenge zamaane waale jab madine me.n bulaaenge bulaane waale jab chalu.n shehr-e-madina se to sar...