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ये दिल भी हुसैनी है ये जाँ भी हुसैनी है / Ye Dil Bhi Hussaini Hai Ye Jaan Bhi Hussaini Hai

ये दिल भी हुसैनी है, ये जाँ भी हुसैनी है सद-शुक्र कि अपना तो ईमाँ भी हुसैनी है तू माने या न माने, अपना तो 'अक़ीदा है हर क़ारी के होंटों पर क़ुरआँ भी हुसैनी है रौनक़ है मसाजिद में शब्बीर के सदक़े से मिम्बर भी हुसैनी है, आज़ाँ भी हुसैनी है जिब्रील झुलाता है हसनैन के झूले को लगता है कि आक़ा का दरबाँ भी हुसैनी है गिरने नहीं देता है काँधों से नवासों को क्या ख़ूब कि नबियों का सुल्ताँ भी हुसैनी है धड़कन की नगरिया में देखा तो नज़र आया हसरत भी हुसैनी है, अरमाँ भी हुसैनी है तुम समझो या न समझो, ऐ अहल-ए-जहाँ ! लेकिन है लब पे जो हाकिम के ये बयाँ भी हुसैनी है शायर: अहमद अली हाकिम ना'त-ख़्वाँ: मीलाद रज़ा क़ादरी अहमद अली हाकिम हसन बिन ख़ुर्शीद ye dil bhi husaini hai, ye jaa.n bhi husaini hai sad-shukr ki apna to imaa.n bhi husaini hai tu maane ya na maane, apna to 'aqeeda hai har qaari ke honto.n par qur.aa.n bhi husaini hai raunaq hai masaajid me.n shabbir ke sadqe se mimbar bhi husaini hai, aazaa.n bhi husaini hai jibreel jhulaata hai hasnain ke jhoole ko ...

कर्बला से मेरी लौ लगी है / Karbala Se Meri Lau Lagi Hai

मुझ को, शब्बीर ! अपना बना लो कर्बला से मेरी लौ लगी है अब तो नज़र-ए-करम मुझ पे डालो कर्बला से मेरी लौ लगी है ख़ूब-तर ज़ख़्म खाया हुआ हूँ दहर का मैं सताया हुआ हूँ डाल दो मुझ पे नज़र-ए-'इनायत दिल का दीपक जलाया हुआ हूँ बहर-ए-ग़म से मुझे अब निकालो कर्बला से मेरी लौ लगी है आ गया फिर से माह-ए-मुहर्रम या'नी ज़िक्र-ए-शहादत का मौसम ऐ क़सीम-ए-विलायत ! तवज्जोह कह रही है यही चश्म-ए-पुरनम मेरी झोली में ख़ैरात डालो कर्बला से मेरी लौ लगी है दिल की दुनिया में फिर खलबली है क्या कहूँ कैसी भगदड़ मची है ग़र्क़ होने को है अब सफ़ीना फिर से बाद-ए-मुख़ालिफ़ चली है डूबने से मुझे तुम बचा लो कर्बला से मेरी लौ लगी है हर-सू नहर-ए-फ़ितन फूटते हैं कंज़-ए-ईमान को लूटते हैं किस-क़दर पुर-ख़तर दौर आया हर तरफ़ भेड़िये घूमते हैं अपने दामन में मुझ को छुपा लो कर्बला से मेरी लौ लगी है कर दो मेरा जिगर नूरी नूरी दे दो मुझ को भी इज़्न-ए-हुज़ूरी वासिता सय्यिदा फ़ातिमा का मेरे दिल की ये हसरत हो पूरी अपने दर का मुझे सग बना लो कर्बला से मेरी लौ लगी है जुर्म कोई मेरा धो रहा है दुनिया-ए-दिल में कुछ हो रहा है ताजदा...

हुसैन सब से अज़ीम-तर है / Hussain Sab Se Azeemtar Hai

है मेरा मौला या हुसैन है तेरा मौला या हुसैन आक़ा का प्यारा या हुसैन है सब का मौला या हुसैन हुसैन का ज़िक्र 'अर्श पर है हुसैन सब से 'अज़ीम-तर है ये हुक्म-ए-सुल्तान-ए-बहर-ओ-बर है हुसैन सब से 'अज़ीम-तर है जनाब-ए-मौला हसन बिरादर जनाब-ए-ज़हरा है जिस की मादर जनाब-ए-मौला 'अली पिदर है हुसैन सब से 'अज़ीम-तर है जलाल देखा हुसैन का जब पुकार उट्ठा यज़ीदी लश्कर जनाब-ए-हैदर का ये पिसर है हुसैन सब से 'अज़ीम-तर है ज़ुबाँ पे क़ुरआँ की है तिलावत ये देख कर है जहाँ में हैरत कि नोक-ए-नेज़ा पे रक्खा सर है हुसैन सब से 'अज़ीम-तर है जो बाग़ी दीन-ए-रसूल का है जो बाग़ी इब्न-ए-बतूल का है वो आज भी फिरता दर-ब-दर है हुसैन सब से 'अज़ीम-तर है फ़क़त ख़ुदा की रज़ा की ख़ातिर नबी के दीं की बक़ा की ख़ातिर लुटा दिया जिस ने अपना घर है हुसैन सब से 'अज़ीम-तर है चला जो मैदाँ में ले के ख़ंजर तो थरथराया यज़ीदी लश्कर वो शेर-ए-हैदर है, वो निडर है हुसैन सब से 'अज़ीम-तर है हुआ है हैराँ जहान सारा जो एक कासे में सागर आया करम ये उस का ही ख़्वाजा पर है हुसैन सब से 'अज़ीम-तर है जहाँ से, ...

प्यारे नबी की आँख के तारे हुसैन हैं / Pyare Nabi Ki Aankh Ke Tare Hussain Hain

प्यारे नबी की आँख के तारे हुसैन हैं मौला 'अली के राज-दुलारे हुसैन हैं दिल को क़रार मिलता है नाम-ए-हुसैन से वल्लाह हम को जान से प्यारे हुसैन हैं रौशन कि जिन से 'इश्क़-ओ-वफ़ा की तमाम राह चश्म-ए-तलब में ऐसे मिनारे हुसैन हैं वो 'अज़्म हौसला है कि जिस की नहीं मिसाल सब्र-ओ-रिज़ा के बाब में न्यारे हुसैन हैं ज़ालिम यज़ीद मिट गया, ज़िंदा रहे हुसैन ये सोचना ग़लत है कि हारे हुसैन हैं कोई कमी हुसैन में मुमकिन हो किस तरह जब दस्त-ए-मुस्तफ़ा के सवारे हुसैन है वो कौन है जो जान है इस्लाम की, 'उबैद ! प्यारे हुसैन हैं, मेरे प्यारे हुसैन हैं ना'त-ख़्वाँ: मौलाना बिलाल रज़ा क़ादरी pyaare nabi ki aankh ke taare husain hai.n maula 'ali ke raaj-dulaare husain hai.n dil ko qaraar milta hai naam-e-husain se wallah ham ko jaan se pyaare husain hai.n raushan ki jin se 'ishq-o-wafa ki tamaam raah chashm-e-talab me.n aise minaare husain hai.n wo 'azm hausla hai ki jis ki nahi.n misaal sabr-o-riza ke baab me.n nyaare husain hai.n zaalim yazeed miT gaya, zind...

सरकार का दरबार नहीं देख रहे क्या / Sarkar Ka Darbar Nahi Dekh Rahe Kya

सरकार का दरबार नहीं देख रहे क्या ? दरबार में दो यार नहीं देख रहे क्या ? तुम दुनिया के मे'यार तो सब देख रहे हो अल्लाह का मे'यार नहीं देख रहे क्या ? कहते हो कि क़ुरआन में बू-बक्र कहाँ है ? तुम आयत-ए-फ़िल-ग़ार नहीं देख रहे क्या ? दूल्हा बने आए हैं अबू-बक्र के घर में कौनैन के सरदार नहीं देख रहे क्या ? सिद्दीक़ इमामत पे है और मुक़्तदियों में तुम हैदर-ए-कर्रार नहीं देख रहे क्या ? हर घर नहीं अल्लाह का घर होता, मेरे दोस्त ! तुम मस्जिद-ए-ज़र्रार नहीं देख रहे क्या ? तहसीन ! अभी हक़ के तरफ़-दार बहुत हैं ये मजमा'-ए-बेदार नहीं देख रहे क्या ? शायर: यूनुस तहसीन ना'त-ख़्वाँ: वक़ार उमर डंगराज sarkaar ka darbaar nahi.n dekh rahe kya ? darbaar me.n do yaar nahi.n dekh rahe kya ? tum duniya ke me'yaar to sab dekh rahe ho allah ka me'yaar nahi.n dekh rahe kya ? kehte ho ki qur.aan me.n bu-bakr kahaa.n hai ? tum aayat-e-fil-Gaar nahi.n dekh rahe kya ? dulha bane aae hai.n abu-bakr ke ghar me.n kaunain ke sardaar nahi.n dekh rahe kya ? Siddiq imaama...

बड़ा महबूब घराना अली हैदर का घराना / Bada Mehboob Gharana Ali Haider Ka Gharana

मेरा 'इश्क़ 'अली, मेरी जान 'अली मेरा 'इश्क़ 'अली, मेरी जान 'अली बड़ा महबूब घराना, 'अली हैदर का घराना ग़ुलाम इन का है ज़माना, 'अली हैदर का घराना मन-कुंतु मौला ! 'अली 'अली ! आक़ा ने बोला ! 'अली 'अली ! मैं जिस का मौला ! 'अली 'अली ! है उस का मौला ! 'अली 'अली ! ज़हरा का शौहर ! 'अली 'अली ! हसनैन का बाबा ! 'अली 'अली ! हम सब ने पुकारा ! 'अली 'अली मौला ! बड़ा महबूब घराना, 'अली हैदर का घराना किया हर काम उसी की रिज़ा में राज़ी रह कर ख़ुदा के दीन की ख़ातिर हज़ारों सदमे सेह कर करे हर-दम शुक्राना, 'अली हैदर का घराना बड़ा महबूब घराना, 'अली हैदर का घराना कदी मिम्बर ते खड़ के, कदी मैदाँ ते लड़ के कदी नेज़े ते चढ़ के, कदी ख़ुत्बे पढ़ पढ़ के सिखावे दीन बचाणा, 'अली हैदर दा घराना बड़ा महबूब घराना, 'अली हैदर दा घराना पुकारा जब मुश्किल में, इन्हों ने की लजपाली सभी मँगतों की पल में भरी है झोली ख़ाली झुका जिस दर पे ज़माना, 'अली हैदर का घराना बड़ा महबूब घराना, 'अली हैदर का घराना ओहदा हजवेरी गदागर,...

ज़हरा का दिल अली का दुलारा हुसैन है / Zahra Ka Dil Ali Ka Dulara Hussain Hai

ज़हरा का दिल 'अली का दुलारा हुसैन है प्यारे नबी की आँखों का तारा हुसैन है हर जन्नती जवाँ की क़यादत है उस के हाथ अल्लाह की नज़र में यूँ प्यारा हुसैन है काँधे पे जो रसूल के होता रहा सवार क़िस्मत का एक शोख़ सितारा हुसैन है मैदान-ए-कर्बला से है गूँजी यही सदा इस्लाम का सुतून-ओ-सहारा हुसैन है सर को कटा के, मोमिनो ! साबित ये कर दिया ईमान और यक़ीन का धारा हुसैन है इस्लाम के लिए थी शहादत हुसैन की सौग़ात-ए-नानाजान पे वारा हुसैन है 'उक़्बा का ताजवर ही नहीं है 'अली का ला'ल दुनिया के हर जवाँ में भी न्यारा हुसैन है जिस ने यज़ीदियों से सुल्ह-ए-कुल न की कभी बातिल के सर पे हक़ का शरारा हुसैन है शायर: हाफ़िज़ुल्लाह क़ासमी ना'त-ख़्वाँ: संदली अहमद zahra ka dil, 'ali ka dulaara husain hai pyaare nabi ki aankho.n ka taara husain hai har jannati jawaa.n ki qayaadat hai us ke haath allah ki nazar me.n yu.n pyaara husain hai kaandhe pe jo rasool ke hota raha sawaar qismat ka ek shoKH sitaara husain hai maidaan-e-karbala se hai goonji yahi sada islaam ka s...

मेरा मौला मौला हुसैन है / Mera Maula Maula Hussain Hai

मेरा मौला मौला हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है जो हुआ नवासा-ए-मुस्तफ़ा वो 'अली का बेटा हुसैन है जो यज़ीदियत को फ़ना करे चले कर्बला वो हुसैन है बीबी फ़ातिमा का वो लाडला मेरा बादशाह वो हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है क्या सुनाऊँ वाक़ि'आ कर्बला हाए ! तीर-नेज़ा कहाँ लगा जिसे चूमते रहे मुस्तफ़ा वो हुसैनी सर था कटा हुआ सारा घर का घर भी लुटा दिया वो जो कर गया वो हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है यही बोले हज़रत-ए-हुर्र शहा या हुसैन ! आप का शुक्रिया कि यज़ीदियों से निकाल कर जो हुसैनियों में बिठा दिया मुझे मंज़िलों का पता दिया मेरा रहनुमा वो हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है वो भी बंदा कितना 'अजीब है जो कहे यज़ीद भी ठीक है या हुसैनी बन या यज़ीदी बन ऐसे जूट में क्यूँ शरीक है क्यूँ दो कश्तियों का सवार है जो है हक़-नुमा वो हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है जो दर-ए-हुसैन पे आ गया सारी मन्नतों को वो पा गया ये घराना आल-ए-नबी का है जो सख़ावतों को सिखा गया जो फ़क़ीर को करे बा...

हूँ ख़ाक मगर आलम-ए-अनवार से निस्बत है / Hun Khak Magar Aalam-e-Anwaar Se Nisbat Hai

हूँ ख़ाक मगर 'आलम-ए-अनवार से निस्बत है मैं कुछ भी नहीं लेकिन सरकार से निस्बत है दुनिया की शहंशाही रखता हूँ मैं ठोकर पर कौनैन के उस मालिक-ओ-मुख़्तार से निस्बत है मैं ख़ाक का पुतला हूँ, वो 'अर्श के राही हैं इस पार का बासी हूँ, उस पार से निस्बत है हैं रोज़-ए-अज़ल से मेरी घुट्टी में वफ़ाएँ नाज़ा हूँ कि 'अब्बास 'अलम-दार से निस्बत है सर झुक नहीं सकते सर-ए-महशर भी हमारे सर इस लिए ऊँचे हैं, सरदार से निस्बत है हम मानने वाले हैं हुसैन इब्न-ए-'अली के वक़्त आए अगर दीं पे तो फिर दार से निस्बत है सरकार के दामन से, अल्ताफ़ ! हूँ वाबस्ता ग़म पास भी क्यूँ आएँ कि ग़म-ख़्वार से निस्बत है शायर: सय्यिद अल्ताफ़ शाह काज़मी ना'त-ख़्वाँ: उमेर मुनीर क़ादरी तल्हा क़ादरी hu.n KHaak magar 'aalam-e-anwaar se nisbat hai mai.n kuchh bhi nahi.n lekin sarkaar se nisbat hai duniya ki shahenshaahi rakhta hu.n mai.n Thokar par kaunain ke us maalik-o-muKHtaar se nisbat hai mai.n KHaak ka putla hu.n, wo 'arsh ke raahi hai.n is paar ka baasi hu.n, us paar se nisbat h...

मुहम्मद नाम ऐसा है कि जिस लब पर ये नाम आया / Muhammad Naam Aisa Hai Ke Jis Lab Par Ye Naam Aaya

नाम-ए-मुहम्मद सल्ले-'अला, नाम-ए-मुहम्मद सल्ले-'अला नाम-ए-मुहम्मद सल्ले-'अला, नाम-ए-मुहम्मद सल्ले-'अला सल्ले-'अला नबिय्येना, सल्ले-'अला मुहम्मदिन सल्ले-'अला नबिय्येना, सल्ले-'अला मुहम्मदिन मुहम्मद नाम ऐसा है कि जिस लब पर ये नाम आया इता'अत हो गई वाजिब, शफ़ा'अत का पयाम आया मोहब्बत का तक़ाज़ा था, यही दिल की तमन्ना थी कि हर लब पर दुरूद आया, कि हर दिल में सलाम आया जहाँ वालों ने पूछा जब कि क्या है दीन का जौहर ज़ुबाँ पर था फ़क़त क़ुरआन, दिल में उन का नाम आया श'ईर-ओ-तूर से फूटे यक़ीनन चश्मे नूरानी मगर फ़ारान का बादल तो सागर था मदाम आया ज़मीं वालो ! मुबारक हो कि ये अर्ज़-ए-मुतह्हर है मुरीद-ए-बा-सफ़ा बन कर मलाइक का इमाम आया ग़ुलामान-ए-मुहम्मद का जहाँ में मर्तबा देखो कि हर दिल में मुक़द्दस है, ज़ुबाँ पर एहतिराम आया मुक़द्दस हस्तियाँ, शाकिर ! अगरचे और भी तो हैं सर-ए-'अर्श-ए-बरीं लिक्खा, मगर उन का ही नाम आया शायर: शाकिर फ़ारूक़ी ना'त-ख़्वाँ: जवाद रज़ा क़ादरी naam-e-muhammad salle-'ala, naam-e-muhammad salle-'ala naam-e...

कौनैन के दूल्हा के सदक़े में ख़ुदाई है | सुनते हैं कि महशर में तज़मीन के साथ / Kaunain Ke Dulha Ke Sadqe Mein Khudai Hai | Sunte Hain Ke Mehshar Mein With Tazmeen

कौनैन के दूल्हा के सदक़े में ख़ुदाई है महबूब-ए-करीमा ने हाँ शान वो पाई है मौला ने फ़तर्दा की ख़ुश-ख़बरी सुनाई है सुनते हैं कि महशर में सिर्फ़ उन की रसाई है गर उन की रसाई है लो जब तो बन आई है रहमत ने सर-ए-महशर क्या रंग जमाई है सौग़ात-ए-करम देखो ला-तक़्नतू लाई है आक़ा की शफ़ा'अत ने क्या धूम मचाई है मचला है कि रहमत ने उम्मीद बँधाई है क्या बात तेरी, मुजरिम ! क्या बात बनाई है आ'माल-ए-सियह ने जब फिटकार दिया हम को हम क्या कहें अपनों ने क्या प्यार दिया हम को माँ-बाप ने भी, आक़ा ! धुतकार दिया हम को सब ने सफ़-ए-महशर में ललकार दिया हम को ऐ बेकसों के आक़ा ! अब तेरी दुहाई है सरकार की 'अज़मत का जब ज़िक्र-ए-जली छेड़ो बाज़ार-ए-मोहब्बत में फिर होश-ओ-ख़िरद भेजो गुलदस्ता-ए-तन-मन-धन हर चीज़ ही, ऐ लोगो ! यूँ तो सब उन्हीं का है पर दिल की अगर पूछो ये टूटे हुए दिल ही ख़ास उन की कमाई है यूँ बज़्म-ए-मोहब्बत से हरगिज़ न तू ख़ाली उठ महबूब की चौखट से ले कर के, सवाली ! उठ सरकार-ए-मदीना के ऐ क़ल्ब-ए-फ़िदाई ! उठ ऐ दिल ! ये सुलगना क्या, जलना है तो जल भी उठ दम घुटने लगा, ज़ालिम ! क्या धूनी रमाई है दुनिया की...

सुनते हैं कि महशर में सिर्फ़ उन की रसाई है / Sunte Hain Ke Mehshar Mein Sirf Un Ki Rasai Hai

सुनते हैं कि महशर में सिर्फ़ उन की रसाई है गर उन की रसाई है लो जब तो बन आई है मचला है कि रहमत ने उम्मीद बँधाई है क्या बात तेरी, मुजरिम ! क्या बात बनाई है सब ने सफ़-ए-महशर में ललकार दिया हम को ऐ बेकसों के आक़ा ! अब तेरी दुहाई है यूँ तो सब उन्हीं का है, पर दिल की अगर पूछो ये टूटे हुए दिल ही ख़ास उन की कमाई है ज़ाइर गए भी कब के, दिन ढलने पे है, प्यारे ! उठ मेरे अकेले चल, क्या देर लगाई है बाज़ार-ए-'अमल में तो सौदा न बना अपना सरकार करम तुझ में 'ऐबी की समाई है गिरते हुओं को मुज़्दा सज्दे में गिरे मौला रो रो के शफ़ा'अत की तम्हीद उठाई है ऐ दिल ! ये सुलगना क्या, जलना है तो जल भी उठ दम घुटने लगा, ज़ालिम ! क्या धूनी रमाई है मुजरिम को न शर्माओ, अहबाब ! कफ़न ढक दो मुँह देख के क्या होगा, पर्दे में भलाई है अब आप ही सँभालें तो काम अपने सँभल जाएँ हम ने तो कमाई सब खेलों में गँवाई है ऐ 'इश्क़ ! तेरे सदक़े जलने से छुटे सस्ते जो आग बुझा देगी, वो आग लगाई है हिर्स-ओ-हवस-ए-बद से, दिल ! तू भी सितम कर ले तू ही नहीं बेगाना, दुनिया ही पराई है हम दिल-जले हैं किस के, हट फ़ितनों के परकाले...

कौन है जो ये इल्तिजा न करे | दिल को उन से ख़ुदा जुदा न करे तज़मीन के साथ / Kaun Hai Jo Ye Iltija Na Kare | Dil Ko Un Se Khuda Juda Na Kare With Tazmeen

कौन है जो ये इल्तिजा न करे कौन उन के लिए मरा न करे कौन रो रो के ये दु'आ न करे दिल को उन से ख़ुदा जुदा न करे बेकसी लूट ले ख़ुदा न करे 'इश्क़ का सर पे डाल कर के ग़िलाफ़ बात अहल-ए-ख़िरद ये सुन लें साफ़ काम है कौन सा शरा' के ख़िलाफ़ इस में रौज़े का सज्दा हो कि तवाफ़ होश में जो न हो वो क्या न करे रात-दिन हम गुनह में डूबे हैं जुर्म जितने हैं सारे करते हैं फिर भी आक़ा करीम ऐसे हैं ये वही हैं कि बख़्श देते हैं कौन इन जुर्मों पर सज़ा न करे 'इश्क़ ने कर दिया मुझे मशहूर उन की यादों से ज़ेहन है मा'मूर मुझ को इस बात पे है फ़ख़्र ज़रूर दिल में रौशन है शम'-ए-'इश्क़-ए-हुज़ूर काश ! जोश-ए-हवस हवा न करे ज़ख़्म सीने के सारे सीने को जो यहाँ मर रहे थे जीने को ऐ वसी ! जाम-ए-'इश्क़ पीने को ले, रज़ा ! सब चले मदीने को मैं न जाऊँ अरे ख़ुदा न करे कलाम: इमाम अहमद रज़ा ख़ान तज़मीन: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी kaun hai jo ye iltija na kare kaun un ke liye mara na kare kaun ro ro ke ye du'aa na kare dil ko un se...

तू सब को हज पे बुला रहा है | मुझे भी हज पे बुला ले मौला / Tu Sab Ko Hajj Pe Bula Raha Hai | Mujhe Bhi Hajj Pe Bula Le Maula

तू सब को हज पे बुला रहा है मुझे भी हज पे बुला ले, मौला ! तुझे मुहम्मद का वासिता है मुझे भी हज पे बुला ले, मौला ! ज़बाँ पे लब्बैक की सदा हो करूँ हरम का तवाफ़ मैं भी यही तमन्ना है मेरे दिल की ये इज़्न मुझ को भी दे, ख़ुदाया ! हो सामने तेरा प्यारा का'बा पियूँ मैं ज़मज़म का जाम, मौला ! शरफ़ 'अता कर मुझे भी, मौला ! है वासिता तुझ को मुस्तफ़ा का ग़िलाफ़-ए-का'बा से मैं लिपट कर दु'आएँ माँगूँ मैं ख़ूब रोऊँ मु'आफ़ी माँगूँ मैं तुझ से, मौला ! तू बख़्श देना मुझे, ख़ुदाया ! मिना-ओ-मुज़्दलिफ़ा और 'अरफ़ात - के भी जल्वों को देखूँ, मौला ! करम ये फ़रमा दे तुझ को, मौला ! है वासिता बिन्त-ए-मुस्तफ़ा का मैं चूमूँ प्यारा वो संग-ए-अस्वद मुझे भी हासिल हो ये स'आदत ऐ ख़ालिक़-ए-कुल ऐ मालिक-ए-कुल ! ये पूरी कर दे मेरी तमन्ना हरम से हो कर मदीने जाऊँ जहाँ पे सरदार-ए-दो-जहाँ हैं पकड़ के उन की सुनहरी जाली तलब करूँ सदक़ा पंजतन का है आरज़ू उन के दर पे जाऊँ मैं हाल दिल का उन्हें बताऊँ जब उन की चौखट पे सर को रक्खूँ हो ख़ातिमा मेरी ज़िंदगी का शरफ़ दे शौक़-ए-फ़रीदी को भी दर-ए-शह-ए-दीं पे हाज़िरी...