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आक़ा का नाम लेना बड़े एहतिराम से / Aaqa Ka Naam Lena Bade Ehtiram Se

नाम-ए-अहमद का वज़ीफ़ा है हर इक ग़म का 'इलाज लाख खतरें हों इसी नाम से टल जाते हैं आक़ा का नाम लेना बड़े एहतिराम से उन पर दुरूद पढ़ना बड़े एहतिराम से ख़ाक-ए-मदीना चूमना, रहना अदब के साथ तयबा में जब भी जाना बड़े एहतिराम से महफूज़ सय्यिदा हैं, ख़ता इन से कैसे हो ज़हरा का ज़िक्र करना बड़े एहतिराम से लाज़िम है ज़िक्र-ए-हैदर-ए-कर्रार का अदब बज़्म-ए-'अली सजाना बड़े एहतिराम से तुम दश्त-ए-दर्द पार करोगे सुकून से बारह इमाम कहना बड़े एहतिराम से जन्नत के शहज़ादे, उजागर ! हसन-हुसैन चूमें ये नाम वल्लाह बड़े एहतिराम से ये नाम कोई काम बिगड़ने नहीं देता बिगड़े भी बना देता है ये नाम-ए-मुहम्मद शायर: अल्लामा निसार अली उजागर ना'त-ख़्वाँ: हाफ़िज़ ग़ुलाम मुस्तफ़ा क़ादरी naam-e-ahmad ka wazeefa hai har ik Gam ka 'ilaaj laakh khatre.n ho.n isi naam se Tal jaate hai.n aaqa ka naam lena ba.De ehtiraam se un par durood pa.Dhna ba.De ehtiraam se KHaak-e-madina choomna, rehna adab ke saath tayba me.n jab bhi jaana ba.De ehtiraam se mehfooz sayyida hai.n, KHata in se kaise ho ...

या रब मेरी सोई हुई तक़दीर जगा दे | आँखें मुझे दी हैं तो मदीना भी दिखा दे / Ya Rab Meri Soi Hui Taqdeer Jaga De | Aankhen Mujhe Di Hain To Madina Bhi Dikha De

या रब ! मेरी सोई हुई तक़दीर जगा दे आँखें मुझे दी हैं तो मदीना भी दिखा दे सुनने की जो क़ुव्वत मुझे बख़्शी है, ख़ुदावंद ! फिर मस्जिद-ए-नबवी की अज़ानें भी सुना दे हूरों की न ग़िल्माँ की न जन्नत की तलब है मदफ़न मेरा सरकार की बस्ती में बना दे मुद्दत से मैं इन हाथों से करता हूँ दु'आएँ इन हाथों में अब जाली सुनहरी वो थमा दे मुँह हश्र में मुझ को न छुपाना पड़े, या रब ! मुझ को तेरे महबूब की चादर में छुपा दे 'इशरत को भी अब ख़ुश्बू-ए-हस्सान 'अता कर जो लफ़्ज़ कहे हैं उन्हें तू ना'त बना दे शायर: इशरत गोधरवी ना'त-ख़्वाँ: फ़रहान अली क़ादरी फ़ोज़िआ ख़ादिम राहत फ़तेह अली ख़ान  ya rab ! meri soi hui taqdeer jaga de aankhe.n mujhe di hai.n to madina bhi dikha de sun.ne ki jo quwwat mujhe baKHshi hai, KHudawand ! phir masjid-e-nabvi ki azaane.n bhi suna de hooro.n ki na Gilma.n ki na jannat ki talab hai madfan mera sarkaar ki basti me.n bana de muddat se mai.n in haatho.n se karta hu.n du'aae.n in haatho.n me.n ab jaali sunehri wo thama de munh hashr me.n mujh ...

अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू | ये ज़मीं जब न थी ये जहाँ जब न था / Allah Hoo Allah Hoo Allah Hoo | Ye Zameen Jab Na Thi Ye Jahan Jab Na Tha

तेरे ही नाम से हर इब्तिदा है तेरे ही नाम तक हर इंतिहा है तेरी हम्द-ओ-सना अल-हम्दु-लिल्लाह कि तू मेरे मुहम्मद का ख़ुदा है अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू ये ज़मीं जब न थी, ये जहाँ जब न था चाँद सूरज न थे, आसमाँ जब न था राज़-ए-हक़ भी किसी पर 'अयाँ जब न था जब न था कुछ यहाँ, था मगर तू ही तू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू पहुँचे मे'राज में 'अर्श तक मुस्तफ़ा जब न मा'बूद बंदे में पर्दा रहा तब मलाइक ने हज़रत से झुक कर कहा सारी मख़्लूक़ में हक़-नुमा तू ही तू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू डाली डाली तेरी तख़्लीक़ के गुन गाती है पत्ता पत्ता यही कहता है कि मा'बूद है तू ख़ालिक़-ए-कुल है तू इस में क्या गुफ़्तुगू सारे 'आलम को है तेरी ही जुस्तुजू तेरी जल्वा-गरी है 'अयाँ चार-सू ला-शरीका-लहू मालिक-उल-मुल्क तू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू ला-इलाहा तेरी शान, या वहदहू ! तू ख़्याल-ओ-तजस्सुस तू ही आरज़ू आँख की रौशनी दिल की आवाज़ तू था भी तू, है भी तू, ह...

अल्लाह मुआफ़ कर दे / Allah Muaf Kar De

अल्लाह ! मु'आफ़ कर दे मौला ! तू मु'आफ़ कर दे जब मुश्किलों ने घेरा, तू ने बचा लिया है दुनिया ने जब गिराया, तू ने उठा लिया है मेरे करीम ! मुझ को यूँ ही सँभाल रखना बिगड़ा जो काम मेरा, तू ने बना दिया है अल्लाह ! मु'आफ़ कर दे मौला ! तू मु'आफ़ कर दे 'इस्याँ का शोर हर पल, दिन-रात है मुसलसल मुझ को बचा ले, मौला ! मेरे सामने है दलदल रस्ता न कोई रहबर, हामी न कोई यावर प्यासा हूँ भेज दे अब तू रहमतों के बादल अल्लाह ! मु'आफ़ कर दे मौला ! तू मु'आफ़ कर दे रमज़ान का वसीला, झोली को मेरी भर दे जो हों मुरादें मेरी, तू सब को पूरी कर दे शब्बीर तेरे दर पे बन के सवाली आया कर दरगुज़र ख़ताएँ, तौबा क़ुबूल कर दे अल्लाह ! मु'आफ़ कर दे मौला ! तू मु'आफ़ कर दे शायर: शब्बीर अबू तालिब नशीद-ख़्वाँ: शब्बीर अबू तालिब allah ! mu'aaf kar de maula ! tu mu'aaf kar de jab mushkilo.n ne ghera, tu ne bacha liya hai duniya ne jab giraaya, tu ne uTha liya hai mere kareem ! mujh ko yu.n hi sambhaal rakhna big.Da jo kaam mera, tu ne bana diya hai allah ! ...

क़रीब-ए-दयार-ए-हबीब-ए-ख़ुदा में मेरा घर बनाने को जी चाहता है / Qareeb-e-Dayar-e-Habib-e-Khuda Mein Mera Ghar Banane Ko Ji Chahta Hai

क़रीब-ए-दयार-ए-हबीब-ए-ख़ुदा में मेरा घर बनाने को जी चाहता है बची ज़िंदगी अपनी सारी की सारी वहीं पर बिताने को जी चाहता है चले थे 'उमर क़त्ल करने नबी को रुख़-ए-मुस्तफ़ा पर नज़र जब पड़ी तो कहा, मुझ को कलमा पढ़ा दीजे, आक़ा ! कि अब क़ुर्ब पाने को जी चाहता है बसा जब से नज़रों में है आप का दर नहीं भाता आँखों को अब कोई मंज़र 'अता कीजिए फिर से इज़्न-ए-मदीना कि फिर दर पे आने को जी चाहता है गवर्नर हैं तयबा मुबारक शहर के वो प्यारे चचा हैं ख़ैर-उल-बशर के मिले जिन के सदक़े से इज़्न-ए-मदीना उसी दर पे जाने को जी चाहता है मदीने की गलियों के दिलकश नज़ारे जहाँ खेलते थे वो सिब्तैन प्यारे ख़ुदाया ! उन्ही पाक राहों में अपनी ये आँखें बिछाने को जी चाहता है वो जब्ल-ए-उहुद जो है प्यारा नबी का है ग़ार-ए-हिरा में उजाला नबी का तजल्ली से उस की दियों को जला कर वहीं बैठ जाने को जी चाहता है वो सिद्दीक़-ओ-फ़ारूक़-ओ-'उस्मान-ओ-हैदर जो हैं सारे असहाब-ए-आक़ा के सरवर ख़ुदा फ़ज़्ल फ़रमाए तो उन की क़ुर्बत क़यामत में पाने को जी चाहता है बक़ी'-ए-मुबारक है इक पाक गुलशन है अज़्वाज-ओ-आल-ओ-सहाबा का मदफ़न तसर्रुफ़ नहीं ...

नबियों में रसूलों में तेरी ज़ात अलग है / Nabiyon Mein Rasoolon Mein Teri Zaat Alag Hai

नबियों में रसूलों में तेरी ज़ात अलग है ऐ सरवर-ए-कौनैन ! तेरी बात अलग है इक टुकड़े पे हो जाएगा नस्लों का गुज़ारा सरकार के दरबार की ख़ैरात अलग है रातें तो मुबारक हैं बहुत और भी लेकिन मे'राज की जो रात है वो रात अलग है ये सच है कोई तूर का मेहमान बना था महबूब-ओ-मुहिब की तो मुलाक़ात अलग है मूसा को तजल्ली से नवाज़ा गया बेशक आक़ा पे 'इनायात की बरसात अलग है यूँ धूम मचाया हो कोई और तो बोलो मे'राज के उस दूल्हे की बारात अलग है नामूस-ए-रिसालत पे फ़ना कर दिया ख़ुद को अहमद रज़ा के 'इश्क़ में कुछ बात अलग है ना'रा तो लगाते हैं बहुत लोग रज़ा का गुलज़ार ! मेरे ना'रों में जज़्बात अलग है शायर: सय्यिद शाह गुलज़ार इस्माइल वास्ती क़ादरी (गुलज़ार-ए-मिल्लत) ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी nabiyo.n me.n rasoolo.n me.n teri zaat alag hai ai sarwar-e-kaunain ! teri baat alag hai ik Tuk.De pe ho jaaega naslo.n ka guzaara sarkaar ke darbaar ki KHairaat alag hai raate.n to mubaarak hai.n bahut aur bhi lekin me'raaj ki jo raat hai wo raat alag ha...

उतरी है रब की रहमत रमज़ान के दिनों में / Utri Hai Rab Ki Rehmat Ramzan Ke Dinon Mein

उतरी है रब की रहमत रमज़ान के दिनों में देखो खुली है जन्नत रमज़ान के दिनों में रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान-उल-करीम ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! फिर चाँद आसमाँ पर रमज़ान का है चमका आओ करें 'इबादत रमज़ान के दिनों में रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान-उल-करीम ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! रहमत का 'अश्रा आया, महरूम क्यूँ रहें हम तेरी हो हम पे रहमत रमज़ान के दिनों में रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान-उल-करीम ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान-उल-करीम ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! 'अश्रा-ए-मग़्फ़िरत में बख़्शिश का मुज़्दा दे दे ऐसी तू कर 'इनायत रमज़ान के दिनों में रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान-उल-करीम ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान-उल-करीम ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! अम्न-ओ-अमान दे दे, सब को सुकून दे दे तू ख़त्म कर दे नफ़रत रमज़ान के दिनों में रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान-उल-करीम ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान-उल-करीम ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! क़ुरआँ से कर उजागर सीनों को तू हमारे कर दे 'अता हिदायत रमज़ान के दिनों में रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान-उल-करीम ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़ान ! रमज़...

जान-ए-आदम जान-ए-ईसा आप हैं / Jaan-e-Aadam Jaan-e-Isa Aap Hain

जान-ए-आदम जान-ए-'ईसा आप हैं रब ही जाने और क्या-क्या आप हैं सारा 'आलम आप की ख़ातिर दुल्हन और आक़ा इस के दूल्हा आप हैं माल-ओ-दौलत की मुझे ख़्वाहिश नहीं मेरी चाँदी, मेरा सोना आप हैं आ'ला हज़रत ने हमें बतला दिया सब से औला, सब से आ'ला आप हैं का'बा-ए-अतहर है क़िब्ला दहर का का'बा-ए-अतहर का क़िब्ला आप हैं नाज़ कीजे, ऐ असद इक़बाल जी ! बुलबुल-ए-बाग़-ए-मदीना आप हैं शायर: असद इक़बाल कलकत्तवी ना'त-ख़्वाँ: असद इक़बाल कलकत्तवी jaan-e-aadam jaan-e-'isa aap hai.n rab hi jaane aur kya-kya aap hai.n saara 'aalam aap ki KHaatir dulhan aur aaqa is ke dulha aap hai.n maal-o-daulat ki mujhe KHwaahish nahi.n meri chaandi, mera sona aap hai.n aa'la hazrat ne hame.n batla diya sab se aula, sab se aa'la aap hai.n kaa'ba-e-at.har hai qibla dahr ka kaa'ba-e-at.har ka qibla aap hai.n naaz keeje, ai Asad Iqbal Ji ! bulbul-e-baaG-e-madina aap hai.n Poet: Asad Iqbal Kalkattavi Naat-Khwaan: Asad Iqbal Kalkattavi Jane Adam J...

बटता है काइनात में सदक़ा बतूल का / Batta Hai Kainat Mein Sadqa Batool Ka

बटता है काइनात में सदक़ा बतूल का सुल्तान-ए-दो-जहान है बाबा बतूल का सच है कि मेरी अम्माँ भी उन की कनीज़ है मेरा है बाप-दादा भी मँगता बतूल का रहती हैं मेरी देख लो मौजें लगी हुई मुझ पर करम हुआ है ये कैसा बतूल का शामी बाज़ार-ए-शाम में हैरान थे खड़े क़ुरआन पढ़ रहा था बेटा बतूल का मौला 'अली ने कह दिया ज़हरा की शान में अल्लाह ही जानता है रुत्बा बतूल का नज़रों से मैं ने चूमा है चौखट को बार-बार देखा है मैं ने बारहा हुजरा बतूल का अजमल की है तौक़ीर भी, पहचान भी यही अदना सा इक ग़ुलाम है ज़हरा बतूल का शायर: यासीन अजमल चिश्ती ना'त-ख़्वाँ: ख़ावर नक़्शबंदी रैहान क़ुरैशी सय्यिद हस्सानुल्लाह हुसैनी baT.ta hai kaainaat me.n sadqa batool ka sultaan-e-do-jahaan hai baaba batool ka sach hai ki meri ammaa.n bhi un ki kaneez hai mera hai baap-daada bhi mangta batool ka rehti hai.n meri dekh lo mauje.n lagi hui mujh par karam huwa hai ye kaisa batool ka shaami baazaar-e-shaam me.n hairaan the kha.De qur.aan pa.Dh raha tha beTa batool ka maula 'ali ne keh diya zah...

माह-ए-रमज़ाँ हो मुबारक आलम-ए-इस्लाम को / Mah-e-Ramzan Ho Mubarak Aalam-e-Islam Ko

अहलन-व-सहलन या रमदान ! अहलन-व-सहलन या रमदान ! माह-ए-रमज़ाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को फ़ज़्ल-ए-रहमाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को माह-ए-रमज़ाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को आ गया, आ गया ये माह-ए-रमज़ाँ मौला तेरा शुक्र है और तेरा एहसाँ आ गया, आ गया ये माह-ए-रमज़ाँ आ गया, आ गया ये माह-ए-रमज़ाँ मरहबा फिर हो गई है आमद-ए-माह-ए-'अज़ीम हर तरफ़ छाई हुई है रहमत-ए-रब्ब-ए-करीम ये चराग़ाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को मोमिनो ! रोज़ा रख कर रब को राज़ी कर लो माह-ए-रमज़ाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को रमज़ान-उल-करीम ! रमज़ान-उल-करीम ! नन्हे बच्चों में भी जज़्बा है सलात-ओ-सौम का किस-क़दर भाती है दिल को इन की ये प्यारी अदा 'इश्क़-ओ-विज्दाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को माह-ए-रमज़ाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को अहलन-व-सहलन या रमदान ! रमज़ान-उल-करीम ! रमज़ान-उल-करीम ! इस महीने में हुआ नाज़िल कलाम-ए-किब्रिया जो है महबूब-ए-ख़ुदा का एक रौशन मो'जिज़ा या'नी क़ुरआँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को माह-ए-रमज़ाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को आ गया, आ गया ये माह-ए-रमज़ाँ मौला तेरा शुक्र...

क़िस्मत को जगमगाने माह-ए-सियाम आया | रमज़ान आ गया है / Qismat Ko Jagmagane Mah-e-Siyam Aaya | Ramzan Aa Gaya Hai

या शहर रमदान मरहबा ! या शहर रमदान मरहबा ! रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है रमदान करीम ! रमदान करीम ! रमदान करीम ! रमदान करीम ! क़िस्मत को जगमगाने माह-ए-सियाम आया बंदों को बख़्शवाने माह-ए-सियाम आया रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है या शहर रमदान मरहबा ! या शहर रमदान मरहबा ! ऐ मोमिनो ! मुबारक दुनिया की आख़िरत की फिर ने'मतें दिलाने माह-ए-सियाम आया रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है रमदान करीम ! रमदान करीम ! रमदान करीम ! रमदान करीम ! क़ुरआन की तिलावत का ज़ौक़ 'इबादतों का इक बार फिर बढ़ाने माह-ए-सियाम आया रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है या शहर रमदान मरहबा ! या शहर रमदान मरहबा ! सद-शुक्र पा रहे हैं इफ़्तार और सहर के लम्हात ये सुहाने, माह-ए-सियाम आया रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है रमदान करीम ! रमदान करीम ! रमदान करीम ! रमदान करीम ! आओ, 'उबैद ! भर लें हम अपनी झोलियों को बख़्शिश के दुर्र लुटाने माह-ए-सियाम आया रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है या शहर रमदान मरहबा ! या शहर रमदान मरहबा ! शायर: ओवैस रज़ा क़ादरी ना'त-ख़्वाँ: ओवैस रज़ा क़ादरी ...

मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख / Milta Hai Kya Namaz Mein Sajde Mein Ja Ke Dekh

मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख अल्लाह के हुज़ूर तू सर को झुका के देख मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख बेशक बुराइयों से बचाती नमाज़ है बंदों को किब्रिया से मिलाती नमाज़ है मुश्किल को, रंज-ओ-ग़म को मिटाती नमाज़ है आए न गर यक़ीन तो फिर आज़मा के देख मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख ख़ल्लाक़-ए-काएनात का फ़रमान है नमाज़ मोमिन की आन-बान है, पहचान है नमाज़ इक दीन का सुतून है और शान है नमाज़ पढ़ कर नमाज़ अपने ख़ुदा को मना के देख मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख करती नमाज़ सुर्ख़रू रब के हुज़ूर है ज़ाहिर का हुस्न और ये बातिन का नूर है शैतानी वार को भी ये कर देती चूर है दुनिया से हट, नमाज़ में दिल को लगा के देख मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख रिश्वत से तेरे दिल में कराहत ये लाएगी ग़ाफ़िल ! नमाज़ सूद से तुझ को बचाएगी आदाब ज़िंदगी के तुझे ये सिखाएगी इक बार ख़ुद को राह-ए-ख़ुदा में तू ला के देख मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख शौक़-ए-फ़रीदी ! रब की रिज़ा है नमाज़ में आती नज़र नबी की अदा है नमाज़ में इब्न-ए-'अली का सर भी कटा है नमाज़ में कित...

कहाँ हो या रसूलल्लाह कहाँ हो / Kahan Ho Ya Rasoolallah Kahan Ho

कहाँ हो, या रसूलल्लाह ! कहाँ हो मेरी आँखों से क्यूँ ऐसे निहाँ हो गदा बन कर मैं ढूँडूँ तुम को दर दर मेरे आक़ा ! मुझे छोड़ा है किस पर अगर मैं ख़्वाब में दीदार पाऊँ लिपट क़दमों से बस क़ुर्बान जाऊँ तमन्ना है तुम्हारे देखने की नहीं है इस से बढ़ कर कोई नेकी बसो दिल में, समा जाओ नज़र में ज़रा आ जाओ इस वीराना-घर में बना दो मेरे सीने को मदीना निकालो बहर-ए-ग़म से ये सफ़ीना मेरी बिगड़ी हुई हालत बना दो मेरी सोई हुई क़िस्मत जगा दो तुम्हारे सैकड़ों हम से गदा हैं हमारे आप ही इक आसरा हैं खिलाईं ने'मतें मुझ बे-हुनर को दिया आराम मुझ गंदे बशर को नहीं है साथ मेरे कोई तोशा कठिन मंज़िल, तुम्हारा है भरोसा खुलें जब रोज़-ए-महशर मेरे दफ़्तर रहे पर्दा मेरा, महबूब-ए-दावर ! मैं बे-ज़र, बे-हुनर, बे-पर हूँ, सालिक ! मगर उन का हूँ वो हैं मेरे मालिक शायर: मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी ना'त-ख़्वाँ: असद रज़ा अत्तारी अल्लामा हाफ़िज़ बिलाल क़ादरी kahaa.n ho, ya rasoolallah ! kahaa.n ho meri aankho.n se kyu.n aise nihaa.n ho gada ban kar mai.n DhoonDoo.n tum ko dar dar mere aaqa ! mujhe chho.D...

ये अर्ज़ गुनहगार की है शाह-ए-ज़माना / Ye Arz Gunahgar Ki Hai Shah-e-Zamana

ये 'अर्ज़ गुनहगार की है शाह-ए-ज़माना जब आख़िरी वक़्त आए मुझे भूल न जाना सकरात की जब सख़्तियाँ सरकार हों तारी लिल्लाह ! मुझे अपने नज़ारों में गुमाना डर लगता है ईमाँ कहीं हो जाए न बर्बाद सरकार ! बुरे ख़ातमे से मुझ को बचाना जब रूह मेरी तन से निकलने की घड़ी हो शैतान-ए-लईं से मेरा ईमान बचाना जब दम हो लबों पर, ऐ शहंशाह-ए-मदीना ! तुम जल्वा दिखाना मुझे कलमा भी पढ़ाना आक़ा ! मेरा जिस वक़्त कि दम टूट रहा हो उस वक़्त मुझे चेहरा-ए-पुर-नूर दिखाना सरकार ! मुझे नज़'अ में मत छोड़ना तनहा तुम आ के मुझे सूरा-ए-यासीन सुनाना जब गोर-ए-ग़रीबाँ को चले मेरा जनाज़ा रहमत की रिदा इस पे ख़ुदा-रा तुम उढ़ाना जब क़ब्र में अहबाब चलें मुझ को लिटा कर ऐ प्यारे नबी ! गोर की वहशत से बचाना तय ख़ैर से तदफ़ीन के हों सारे मराहिल हो क़ब्र का भी लुत्फ़ से आसान दबाना जिस वक़्त नकीरैन करें आ के सुवालात आक़ा ! मुझे तुम आ के जवाबात सिखाना सुन रक्खा है होता है बड़ा सख़्त अँधेरा तुर्बत में मेरी नूर का फ़ानूस जलाना जब क़ब्र की तन्हाई में घबराए मेरा दिल देने को दिलासा शह-ए-अबरार तो आना जब रोज़-ए-क़यामत रहे इक मील पे सूरज कौसर का छल...