Posts

बटता है काइनात में सदक़ा बतूल का / Batta Hai Kainat Mein Sadqa Batool Ka

बटता है काइनात में सदक़ा बतूल का सुल्तान-ए-दो-जहान है बाबा बतूल का सच है कि मेरी अम्माँ भी उन की कनीज़ है मेरा है बाप-दादा भी मँगता बतूल का रहती हैं मेरी देख लो मौजें लगी हुई मुझ पर करम हुआ है ये कैसा बतूल का शामी बाज़ार-ए-शाम में हैरान थे खड़े क़ुरआन पढ़ रहा था बेटा बतूल का मौला 'अली ने कह दिया ज़हरा की शान में अल्लाह ही जानता है रुत्बा बतूल का नज़रों से मैं ने चूमा है चौखट को बार-बार देखा है मैं ने बारहा हुजरा बतूल का अजमल की है तौक़ीर भी, पहचान भी यही अदना सा इक ग़ुलाम है ज़हरा बतूल का शायर: यासीन अजमल चिश्ती ना'त-ख़्वाँ: ख़ावर नक़्शबंदी रैहान क़ुरैशी सय्यिद हस्सानुल्लाह हुसैनी baT.ta hai kaainaat me.n sadqa batool ka sultaan-e-do-jahaan hai baaba batool ka sach hai ki meri ammaa.n bhi un ki kaneez hai mera hai baap-daada bhi mangta batool ka rehti hai.n meri dekh lo mauje.n lagi hui mujh par karam huwa hai ye kaisa batool ka shaami baazaar-e-shaam me.n hairaan the kha.De qur.aan pa.Dh raha tha beTa batool ka maula 'ali ne keh diya zah...

माह-ए-रमज़ाँ हो मुबारक आलम-ए-इस्लाम को / Mah-e-Ramzan Ho Mubarak Aalam-e-Islam Ko

अहलन-व-सहलन या रमदान ! अहलन-व-सहलन या रमदान ! माह-ए-रमज़ाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को फ़ज़्ल-ए-रहमाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को माह-ए-रमज़ाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को आ गया, आ गया ये माह-ए-रमज़ाँ मौला तेरा शुक्र है और तेरा एहसाँ आ गया, आ गया ये माह-ए-रमज़ाँ आ गया, आ गया ये माह-ए-रमज़ाँ मरहबा फिर हो गई है आमद-ए-माह-ए-'अज़ीम हर तरफ़ छाई हुई है रहमत-ए-रब्ब-ए-करीम ये चराग़ाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को मोमिनो ! रोज़ा रख कर रब को राज़ी कर लो माह-ए-रमज़ाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को रमज़ान-उल-करीम ! रमज़ान-उल-करीम ! नन्हे बच्चों में भी जज़्बा है सलात-ओ-सौम का किस-क़दर भाती है दिल को इन की ये प्यारी अदा 'इश्क़-ओ-विज्दाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को माह-ए-रमज़ाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को अहलन-व-सहलन या रमदान ! रमज़ान-उल-करीम ! रमज़ान-उल-करीम ! इस महीने में हुआ नाज़िल कलाम-ए-किब्रिया जो है महबूब-ए-ख़ुदा का एक रौशन मो'जिज़ा या'नी क़ुरआँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को माह-ए-रमज़ाँ हो मुबारक 'आलम-ए-इस्लाम को आ गया, आ गया ये माह-ए-रमज़ाँ मौला तेरा शुक्र...

क़िस्मत को जगमगाने माह-ए-सियाम आया | रमज़ान आ गया है / Qismat Ko Jagmagane Mah-e-Siyam Aaya | Ramzan Aa Gaya Hai

या शहर रमदान मरहबा ! या शहर रमदान मरहबा ! रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है रमदान करीम ! रमदान करीम ! रमदान करीम ! रमदान करीम ! क़िस्मत को जगमगाने माह-ए-सियाम आया बंदों को बख़्शवाने माह-ए-सियाम आया रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है या शहर रमदान मरहबा ! या शहर रमदान मरहबा ! ऐ मोमिनो ! मुबारक दुनिया की आख़िरत की फिर ने'मतें दिलाने माह-ए-सियाम आया रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है रमदान करीम ! रमदान करीम ! रमदान करीम ! रमदान करीम ! क़ुरआन की तिलावत का ज़ौक़ 'इबादतों का इक बार फिर बढ़ाने माह-ए-सियाम आया रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है या शहर रमदान मरहबा ! या शहर रमदान मरहबा ! सद-शुक्र पा रहे हैं इफ़्तार और सहर के लम्हात ये सुहाने, माह-ए-सियाम आया रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है रमदान करीम ! रमदान करीम ! रमदान करीम ! रमदान करीम ! आओ, 'उबैद ! भर लें हम अपनी झोलियों को बख़्शिश के दुर्र लुटाने माह-ए-सियाम आया रमज़ान आ गया है, रमज़ान आ गया है या शहर रमदान मरहबा ! या शहर रमदान मरहबा ! शायर: ओवैस रज़ा क़ादरी ना'त-ख़्वाँ: ओवैस रज़ा क़ादरी ...

मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख / Milta Hai Kya Namaz Mein Sajde Mein Ja Ke Dekh

मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख अल्लाह के हुज़ूर तू सर को झुका के देख मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख बेशक बुराइयों से बचाती नमाज़ है बंदों को किब्रिया से मिलाती नमाज़ है मुश्किल को, रंज-ओ-ग़म को मिटाती नमाज़ है आए न गर यक़ीन तो फिर आज़मा के देख मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख ख़ल्लाक़-ए-काएनात का फ़रमान है नमाज़ मोमिन की आन-बान है, पहचान है नमाज़ इक दीन का सुतून है और शान है नमाज़ पढ़ कर नमाज़ अपने ख़ुदा को मना के देख मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख करती नमाज़ सुर्ख़रू रब के हुज़ूर है ज़ाहिर का हुस्न और ये बातिन का नूर है शैतानी वार को भी ये कर देती चूर है दुनिया से हट, नमाज़ में दिल को लगा के देख मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख रिश्वत से तेरे दिल में कराहत ये लाएगी ग़ाफ़िल ! नमाज़ सूद से तुझ को बचाएगी आदाब ज़िंदगी के तुझे ये सिखाएगी इक बार ख़ुद को राह-ए-ख़ुदा में तू ला के देख मिलता है क्या नमाज़ में सज्दे में जा के देख शौक़-ए-फ़रीदी ! रब की रिज़ा है नमाज़ में आती नज़र नबी की अदा है नमाज़ में इब्न-ए-'अली का सर भी कटा है नमाज़ में कित...

कहाँ हो या रसूलल्लाह कहाँ हो / Kahan Ho Ya Rasoolallah Kahan Ho

कहाँ हो, या रसूलल्लाह ! कहाँ हो मेरी आँखों से क्यूँ ऐसे निहाँ हो गदा बन कर मैं ढूँडूँ तुम को दर दर मेरे आक़ा ! मुझे छोड़ा है किस पर अगर मैं ख़्वाब में दीदार पाऊँ लिपट क़दमों से बस क़ुर्बान जाऊँ तमन्ना है तुम्हारे देखने की नहीं है इस से बढ़ कर कोई नेकी बसो दिल में, समा जाओ नज़र में ज़रा आ जाओ इस वीराना-घर में बना दो मेरे सीने को मदीना निकालो बहर-ए-ग़म से ये सफ़ीना मेरी बिगड़ी हुई हालत बना दो मेरी सोई हुई क़िस्मत जगा दो तुम्हारे सैकड़ों हम से गदा हैं हमारे आप ही इक आसरा हैं खिलाईं ने'मतें मुझ बे-हुनर को दिया आराम मुझ गंदे बशर को नहीं है साथ मेरे कोई तोशा कठिन मंज़िल, तुम्हारा है भरोसा खुलें जब रोज़-ए-महशर मेरे दफ़्तर रहे पर्दा मेरा, महबूब-ए-दावर ! मैं बे-ज़र, बे-हुनर, बे-पर हूँ, सालिक ! मगर उन का हूँ वो हैं मेरे मालिक शायर: मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी ना'त-ख़्वाँ: असद रज़ा अत्तारी अल्लामा हाफ़िज़ बिलाल क़ादरी kahaa.n ho, ya rasoolallah ! kahaa.n ho meri aankho.n se kyu.n aise nihaa.n ho gada ban kar mai.n DhoonDoo.n tum ko dar dar mere aaqa ! mujhe chho.D...

ये अर्ज़ गुनहगार की है शाह-ए-ज़माना / Ye Arz Gunahgar Ki Hai Shah-e-Zamana

ये 'अर्ज़ गुनहगार की है शाह-ए-ज़माना जब आख़िरी वक़्त आए मुझे भूल न जाना सकरात की जब सख़्तियाँ सरकार हों तारी लिल्लाह ! मुझे अपने नज़ारों में गुमाना डर लगता है ईमाँ कहीं हो जाए न बर्बाद सरकार ! बुरे ख़ातमे से मुझ को बचाना जब रूह मेरी तन से निकलने की घड़ी हो शैतान-ए-लईं से मेरा ईमान बचाना जब दम हो लबों पर, ऐ शहंशाह-ए-मदीना ! तुम जल्वा दिखाना मुझे कलमा भी पढ़ाना आक़ा ! मेरा जिस वक़्त कि दम टूट रहा हो उस वक़्त मुझे चेहरा-ए-पुर-नूर दिखाना सरकार ! मुझे नज़'अ में मत छोड़ना तनहा तुम आ के मुझे सूरा-ए-यासीन सुनाना जब गोर-ए-ग़रीबाँ को चले मेरा जनाज़ा रहमत की रिदा इस पे ख़ुदा-रा तुम उढ़ाना जब क़ब्र में अहबाब चलें मुझ को लिटा कर ऐ प्यारे नबी ! गोर की वहशत से बचाना तय ख़ैर से तदफ़ीन के हों सारे मराहिल हो क़ब्र का भी लुत्फ़ से आसान दबाना जिस वक़्त नकीरैन करें आ के सुवालात आक़ा ! मुझे तुम आ के जवाबात सिखाना सुन रक्खा है होता है बड़ा सख़्त अँधेरा तुर्बत में मेरी नूर का फ़ानूस जलाना जब क़ब्र की तन्हाई में घबराए मेरा दिल देने को दिलासा शह-ए-अबरार तो आना जब रोज़-ए-क़यामत रहे इक मील पे सूरज कौसर का छल...

अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं / Ammi Sach Kehti Hai Ramzan Sa Mahina Koi Nahin

मेरी अम्मी, प्यारी अम्मी सच कहती है मेरी अम्मी, प्यारी अम्मी सच कहती है अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं बारह माह में इस जैसा रहमत का महीना कोई नहीं अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं सहरी की रौनक़ क्या कहना, इफ़्तार का मंज़र क्या कहना मौला से दु'आएँ माँगी है, अल्लाहु अकबर क्या कहना अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं छोटा सा इक बच्चा हूँ, फिर भी रोज़े रखता हूँ रहम-ओ-करम का तालिब हूँ, पाँचों नमाज़ें पढ़ता हूँ अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं है ढाल जहन्नम से रोज़ा, जन्नत का रस्ता है रोज़ा मालिक भी राज़ी होता है, ईमान का रिश्ता है रोज़ा अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं शुक्र, उजागर ! है रब का, छोटे-बड़े सब आए हैं रोज़ा-कुशाई है मेरी, तोहफ़े भी सब लाए हैं अम्मी सच कहती है रमज़ाँ सा महीना कोई नहीं मेरी अम्मी, प्यारी अम्मी सच कहती है मेरी अम्मी, प्यारी अम्मी सच कहती है शायर: अल्लामा निसार अली उजागर नशीद-ख़्वाँ: साहिल रज़ा क़ादरी meri ammi, pyaari ammi sach kehti hai meri ammi, pyaari ammi sach kehti hai ammi sach kehti hai ...

रब की इनायत है रमज़ान / Rab Ki Inayat Hai Ramzan

माह-ए-रमज़ाँ आया है, रब की रहमत लाया है अब्र-ए-करम का साया है, माह-ए-रमज़ाँ आया है रब की 'इनायत है रमज़ान बंदों की ज़ीनत है रमज़ान ईमाँ की ताक़त है रमज़ान सीनों की राहत है रमज़ान मौला की रहमत है रमज़ान हर लम्हा बरकत है रमज़ान रब की 'इनायत है रमज़ान बंदों की ज़ीनत है रमज़ान रब की मोहब्बत है रमज़ान माह-ए-'इबादत है रमज़ान फ़ुक़रा की सरवत है रमज़ान मोमिन की दौलत है रमज़ान रब की 'इनायत है रमज़ान बंदों की ज़ीनत है रमज़ान इस्लाम की क़ुव्वत है रमज़ान और दीं की शौकत है रमज़ान कैसी ये ने'मत है रमज़ान हाँ बाब-ए-जन्नत है रमज़ान रब की 'इनायत है रमज़ान बंदों की ज़ीनत है रमज़ान शैताँ की ज़िल्लत है रमज़ान नेकों की 'इज़्ज़त है रमज़ान अल्लाह की मिन्नत है रमज़ान ज़ेहनों की फ़रहत है रमज़ान रब की 'इनायत है रमज़ान बंदों की ज़ीनत है रमज़ान हर माह पे फ़ज़ीलत है रमज़ान पाई जो सियादत है रमज़ान ये माह-ए-रियाज़त है रमज़ान अल्लाह से क़ुर्बत है रमज़ान रब की 'इनायत है रमज़ान बंदों की ज़ीनत है रमज़ान कुंजी-ए-स'आदत है रमज़ान नेकी की हिदायत है रमज़ान बेबस की हिमायत है रमज़ान फ़ानी की नुज़हत है रमज़ा...

मदीने मुझ को बुला लें बहुत उदास हूँ मैं / Madine Mujh Ko Bula Lein Bahut Udas Hun Main

मदीने मुझ को बुला लें, बहुत उदास हूँ मैं ग़म-ए-जहाँ से बचा लें, बहुत उदास हूँ मैं करम, हुज़ूर ! हो ऐसा कि सारा घर आए मेरा सवाल न टालें, बहुत उदास हूँ मैं मैं पिछले साल तो आक़ा मदीने आया था हुज़ूर ! फिर से बुला लें, बहुत उदास हूँ मैं उदासियों ने मेरे घर में डेरा डाला है उदासियों से बचा लें, बहुत उदास हूँ मैं बड़ी पनाह में आया जो आया तयबा में मेरी हयात बचा लें, बहुत उदास हूँ मैं नहीं है ग़ैर उजागर , ग़ुलाम आप का है गिरा पड़ा हूँ उठा लें, बहुत उदास हूँ मैं शायर: अल्लामा निसार अली उजागर ना'त-ख़्वाँ: अल्लामा हाफ़िज़ बिलाल क़ादरी सय्यिद हस्सानुल्लाह हुसैनी madine mujh ko bula le.n, bahut udaas hu.n mai.n Gam-e-jahaa.n se bacha le.n, bahut udaas hu.n mai.n karam, huzoor ! ho aisa ki saara ghar aae mera sawaal na Taale.n, bahut udaas hu.n mai.n mai.n pichhle saal to aaqa madine aaya tha huzoor ! phir se bula le.n, bahut udaas hu.n mai.n udaasiyo.n ne mere ghar me.n Dera Daala hai udaasiyo.n se bacha le.n, bahut udaas hu.n mai.n ba.Di panaah me.n aaya jo aaya ta...

सारे मुसलमानों को रमज़ान मुबारक / Sare Musalmano Ko Ramzan Mubarak

रजब मुबारक, शाबान मुबारक सारे मुसलमानों को रमज़ान मुबारक प्यारे मुसलमानों को रमज़ान मुबारक रहे सलामत ईमान मुबारक सारे मुसलमानों को रमज़ान मुबारक प्यारे मुसलमानों को रमज़ान मुबारक रहमतों के दरवाज़े खुल गए हैं हम पे ने'मतों की बरसातें होने लगी 'आलम पे ख़ुदा का हो ये एहसान मुबारक सारे मुसलमानों को रमज़ान मुबारक प्यारे मुसलमानों को रमज़ान मुबारक नेकियों के कितने सामान हो रहे हैं काम सारे देखो आसान हो रहे हैं इफ़्तारी करना, सब को कराना सहरी में छोटे-बड़ों को जगाना नेकी की राहों में चलना चलाना तक़वा क्या होता है सब को बताना रमज़ान में बंदगी का सलीक़ा ख़ुद सीखना और सब को सिखाना हो गया है कितना आसान मुबारक सारे मुसलमानों को रमज़ान मुबारक प्यारे मुसलमानों को रमज़ान मुबारक रहे सलामत ईमान मुबारक सारे मुसलमानों को रमज़ान मुबारक प्यारे मुसलमानों को रमज़ान मुबारक शायर: बाबू फ़राज़ नशीद-ख़्वाँ: नवल ख़ान rajab mubaarak, shaabaan mubaarak saare musalmaano.n ko ramzaan mubaarak pyaare musalmaano.n ko ramzaan mubaarak rahe salaamat imaan mubaarak saare musalmaano.n ko r...

किस बुलंदी पे सितारा है मेरा बचपन से / Kis Bulandi Pe Sitara Hai Mera Bachpan Se

नाम-ए-मुहम्मद सल्ले-'अला आँखों की ठंडक, दिल की जिला आओ उन का ज़िक्र करें जो हैं दाफ़े'-ए-रंज-ओ-बला किस बुलंदी पे सितारा है मेरा बचपन से ज़िक्र-ए-सरकार हवाला है मेरा बचपन से मैं ने देखी नहीं ग़ुर्बत कभी अपने घर में उन के टुकड़ों पे गुज़ारा है मेरा बचपन से ज़िक्र-ए-सरकार हवाला है मेरा बचपन से किस बुलंदी पे सितारा है मेरा बचपन से ज़िक्र-ए-सरकार हवाला है मेरा बचपन से उन की रहमत से ही बनते हैं मेरे काम सभी उन की निस्बत ही वसीला है मेरा बचपन से ज़िक्र-ए-सरकार हवाला है मेरा बचपन से किस बुलंदी पे सितारा है मेरा बचपन से ज़िक्र-ए-सरकार हवाला है मेरा बचपन से या नबी या नबी करते हुए दिन गुज़रे हैं यही इक विर्द-वज़ीफ़ा है मेरा बचपन से ज़िक्र-ए-सरकार हवाला है मेरा बचपन से किस बुलंदी पे सितारा है मेरा बचपन से ज़िक्र-ए-सरकार हवाला है मेरा बचपन से आल के साथ सहाबा का भी लाज़िम है अदब साफ़-सुथरा ये 'अक़ीदा है मेरा बचपन से ज़िक्र-ए-सरकार हवाला है मेरा बचपन से किस बुलंदी पे सितारा है मेरा बचपन से ज़िक्र-ए-सरकार हवाला है मेरा बचपन से ये दु'आ माँगो कि टूटे न कभी फ़ारूक़ी उन की यादों से ज...

मुस्तफ़ा का ख़ुदा और ख़ुद मुस्तफ़ा / Mustafa Ka Khuda Aur Khud Mustafa

मुस्तफ़ा का ख़ुदा और ख़ुद मुस्तफ़ा क्यूँ कहूँ मेरा कोई सहारा नहीं मैं मदीने से लेकिन बहुत दूर हूँ ये ख़लिश मेरे दिल को गवारा नहीं आप का 'इश्क़ है 'इश्क़-ए-रब्ब-उल-'उला आप का ज़िक्र है ख़ास ज़िक्र-ए-ख़ुदा ख़ुद ख़ुदा ने ये क़ुरआँ में ए'लाँ किया जो तुम्हारा नहीं वो हमारा नहीं इस्म-ए-अहमद की ता'ज़ीम के मुन्किरो ! इस की 'अज़मत को क़ुरआन से देख लो बे-लक़ब उन का इस्म-ए-मुबारक कहीं उन के मा'बूद ने भी पुकारा नहीं ठोकरों के सिवा और पाएगा क्या जिस की मंज़िल का कोई न हो रहनुमा अपनी मंज़िल पे हरगिज़ न पहुँचेगा वो हाथ में जिस के दामन तुम्हारा नहीं 'अक़्ल-ए-जिन्न-ओ-बशर का यहाँ ज़िक्र क्या सिदरा वाले जहाँ दंग-ओ-हैरान हैं रिफ़'अत-ए-मुस्तफ़ा की मिले हद किसे ये वो दरिया है जिस का किनारा नहीं वो ही रौज़े पे बुलवाएँगे एक दिन ऐ सिकंदर ! ज़रा सब्र से काम ले उन के दर का गदा और मायूस हो मेरे सरकार को ये गवारा नहीं ना'त-ख़्वाँ: ओवैस रज़ा क़ादरी मुहम्मद हस्सान रज़ा क़ादरी mustafa ka KHuda aur KHud mustafa kyu.n kahu.n mera koi sahaara nahi.n mai.n madine s...

ख़ुदा का नूर है ग़ालिब / Khuda Ka Noor Hai Ghalib (Part 1 | Part 2)

ज़मीनों आसमानों में ख़ुदा का नूर है ग़ालिब चमकते चाँद तारों में ख़ुदा का नूर है ग़ालिब जो खिलते हैं, महकते हैं, चमन में फूलों को देखो यहाँ के लाला-ज़ारों में ख़ुदा का नूर है ग़ालिब कहीं पे फूल खिलते हैं, कहीं मुरझाने लगते हैं ख़ज़ानों में, बहारों में ख़ुदा का नूर है ग़ालिब वो जिस ने सारे 'आलम को समाया है, सजाया है पहाड़ों, आबशारों में ख़ुदा का नूर है ग़ालिब तसव्वुर में, तख़य्युल में उसे महसूस करता हूँ समंदर, रेग-ज़ारों में ख़ुदा का नूर है ग़ालिब मुबारक हो तुम्हें, ग़ालिब ! सना-ख़्वानी, मदह-ख़्वानी किताबुल्लाह के पारों में ख़ुदा का नूर है ग़ालिब शायर: अज़ीज़ुल्लाह ग़ालिब ना'त-ख़्वाँ: आइशा अब्दुल जब्बार मुहम्मद हस्सान रज़ा क़ादरी चिड़ियों की चहकार में तू साँसों की तकरार में तू फूलों की महकार में तू गुलशन में गुलज़ार में तू चमन में, लाला-ज़ार में तू दरियाओं की धार में तू सहरा में कोहसार में तू चोटी पर और ग़ार में तू आक़ा के रुख़्सार में तू और उन के अनवार में तू यूँ ज़ुल्फ़-ए-ख़मदार में तू तू ही तू सरकार में तू सिद्दीक़ी दरबार में तू फ़ारूक़ी अदवार में तू 'उस्माँ के किरदा...