हाजियों के बन रहे हैं क़ाफ़िले फिर या नबी / Hajiyon Ke Ban Rahe Hain Qafile Phir Ya Nabi
हाजियों के बन रहे हैं क़ाफ़िले फिर, या नबी ! फिर नज़र में फिर गए हज के मनाज़िर, या नबी ! कर रहे हैं जाने वाले हज की अब तय्यारियाँ रह न जाऊँ मैं कहीं कर दो करम फिर, या नबी ! आह ! पल्ले ज़र नहीं, रख़्त-ए-सफ़र सरवर ! नहीं तुम बुला लो तुम बुलाने पर हो क़ादिर, या नबी ! किस-क़दर था ख़ुश, मुझे जब पेश आया था सफ़र मुझ को अब की बार भी बुलवाइए फिर, या नबी ! दिल मेरा ग़मगीन है और जान भी है मुज़्तरिब मुर्शिदी का वासिता बुलवाइए फिर, या नबी ! ग़म के बादल छा रहे हैं, आह ! मेरे क़ल्ब पर हाज़िरी की दो इजाज़त मुझ को तुम फिर, या नबी ! गुंबद-ए-ख़ज़रा के जल्वे देखने कब आऊँगा कब तक अब तड़पाओगे तुम मुझ को आख़िर, या नबी ! आप ही अस्बाब, आक़ा ! फिर मुहय्या कीजिए फिर दिखा दीजे मदीने के मनाज़िर, या नबी ! किस तरह तस्कीन दूँगा मैं दिल-ए-ग़मगीन को रह गया गर हाज़िरी से मैं जो क़ासिर, या नबी ! मुझ पे क्या गुज़रेगी, आक़ा ! इस बरस गर रह गया मेरा हाल-ए-दिल तो है सब तुम पे ज़ाहिर, या नबी ! आह ! तयबा से अगर मैं दूर रह कर मर गया रूह भी रंजूर होगी किस-क़दर फिर, या नबी ! मिस्ल-ए-साबिक़ इस बरस भी कीजिए नज़र-ए-करम मैं गुज़िश्ता साल ...