तमन्ना मुद्दतों की अब मिटा दे | इलाही मुझ को भी हाजी बना दे / Tamanna Muddaton Ki Ab Mita De | Ilahi Mujh Ko Bhi Haji Bana De
तमन्ना मुद्दतों की अब मिटा दे इलाही ! मुझ को भी हाजी बना दे दिखा दे वो दर-ए-का'बा दिखा दे इलाही ! मुझ को भी हाजी बना दे कभी का'बे की चादर को मैं चूमूँ कभी मैं मुल्तज़िम से जा के लिपटूँ 'अताओं पर तेरी रो कर मैं झूमूँ नसीबा तू मेरा भी जगमगा दे इलाही ! मुझ को भी हाजी बना दे का'बा मैं जाऊँ, जा कर न आऊँ का'बे में जा कर मैं मर जाऊँ रवाँ का'बे की जानिब क़ाफ़िले हैं करम के फिर से जारी सिलसिले हैं मेरी आँखों में जो आँसू भरे हैं उन्हें रुक्न-ए-यमानी का पता दे इलाही ! मुझ को भी हाजी बना दे मौला ! दिखा दे, मौला ! दिखा दे तयबा वो तयबा, का'बा वो का'बा क्या ख़ुश-नुमा है, क्या दिल-नशीं है तयबा वो तयबा, का'बा वो का'बा मेरी तमन्ना, मेरी तलब है तयबा वो तयबा, का'बा वो का'बा ये है शौक़-ए-फ़रीदी की तमन्ना हो शामिल हाजियों में नाम मेरा मेरा मस्कन बने शहर-ए-मदीना वहीं मदफ़न भी तू मेरा बना दे इलाही ! मुझ को भी हाजी बना दे शायर: शौक़ फ़रीदी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद मुइज़ अशरफ़ी tamanna muddato.n ki ab miTa de ilaahi ! mujh ko ...