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हर क़दम पर बिछे हों फ़रिश्तों के पर / Har Qadam Par Bichhe Ho Farishton Ke Par

हर क़दम पर बिछे हों फ़रिश्तों के पर ऐसी राह-गुज़र चाहिए तो बता 'इश्क़ कहता है महबूब-ए-रब का यही जन्नती हम-सफ़र चाहिए तो बता अपने महबूब से ये ख़ुदा ने कहा जैसा चाहेगा तू, वैसा हो जाएगा घर से निकला है जो जान लेने तेरी सर-ब-ख़म वो 'उमर चाहिए तो बता पूछा, मिट्टी का तुम ये बनाते हो क्या ? तो ज़ुबैदा से बहलोल ने ये कहा इस को क्या देखना क्या बनाता हूँ मैं तुझ को जन्नत में घर चाहिए तो बता ज़ोर-ए-बै'अत है, कर्बल का मैदान है और हुसैन इब्न-ए-हैदर का ए'लान है हाथ तो तेरे हाथों में देंगे नहीं हाँ, अगर तुझ को सर चाहिए तो बता उन की रहमत की हद का त'अय्युन न कर उन की शान-ए-करीमी है बस मो'तबर ऐ गुनहगार ! महशर में तुझ को अगर बख़्शिशों की नज़र चाहिए तो बता ये हर इक उम्मती से, गुनहगार से और, ताहिर ! नबी के तलबगार से कह रहा है वसीला ये सरकार का कि दु'आ में असर चाहिए तो बता शायर: ताहिर रज़ा रामपुरी ना'त-ख़्वाँ: ताहिर रज़ा रामपुरी हाफ़िज़ मुनीर अहमद har qadam par bichhe ho.n farishto.n ke par aisi raah-guzar chaahiye to bata 'ishq kehta hai m

नूर-ए-मेहर-ओ-माह न अर्ज़-ओ-गगन रह जाएगा | कोई गुल बाक़ी रहेगा न चमन रह जाएगा तज़मीन के साथ / Noor-e-Mehr-o-Mah Na Arz-o-Gagan Reh Jayaga | Koi Gul Baqi Rahega Na Chaman Reh Jayega With Tazmeen

नूर-ए-मेहर-ओ-माह न अर्ज़-ओ-गगन रह जाएगा पर्बत-ओ-सहरा न बहर-ओ-अंजुमन रह जाएगा न 'अनादिल ही न हुस्न-ए-गुल-बदन रह जाएगा कोई गुल बाक़ी रहेगा न चमन रह जाएगा पर रसूलुल्लाह का दीन-ए-हसन रह जाएगा मिट गए दारा, सिकंदर और क़ैसर चल बसा न कोई बाक़ी रहेगा, न कोई बाक़ी रहा चंद लम्हे जी लो फिर हो जाओगे तुम भी फ़ना हम-सफ़ीरो बाग़ में है कोई दम का चहचहा बुलबुलें उड़ जाएँगी, सूना चमन रह जाएगा मिल्ल्त-ए-बैज़ा की जानिब गर तेरा रुजहाँ न हो ये तो मुमकिन ही नहीं कि फिर तेरा नुक़साँ न हो बुल-हवस ! दुनिया के सीम-ओ-ज़र पे यूँ शादाँ न हो अतलस-ओ-कमख़्वाब की पोशाक पर नाज़ाँ न हो इस तन-ए-बे-जान पर ख़ाकी कफ़न रह जाएगा चश्म-ए-इंसाँ पर है धोका दहर की रा'नाइयाँ बिल-यक़ीं ज़ेर-ए-ख़िज़ाँ आएगा हुस्न-ए-गुल्सिताँ नक़्श कर लो तख़्ती-ए-दिल पर, ऐ मीर-ए-कारवाँ ! नाम-ए-शाहान-ए-जहाँ मिट जाएँगे लेकिन यहाँ हश्र तक नाम-ओ-निशान-ए-पंजतन रह जाएगा क़ल्ब में आने न पाए हसरत-ए-नाम-ओ-नुमूद ता-दम-ए-आख़िर रहे पेश-ए-नज़र रब के हुदूद लौ लगा कर गुंबद-ए-ख़ज़रा से, ऐ 'अब्दुल वदूद ! जो पढ़ेगा साहिब-ए-लौलाक के ऊपर दुरूद आग से महफ़ूज़ उस का तन-

माँ है साया मेरा बाबा हैं साएबाँ / Maa Hai Saya Mera Baba Hain Sayeban

माए नी मेरी माँ बाबा हैं मेरे बाबा माँ है साया मेरा बाबा हैं साएबाँ रब की ने'मत हैं ये इन का बदल है कहाँ है इन्हीं से ये रौशन जहाँ है इन्हीं से ये रौशन जहाँ माँ है साया मेरा बाबा हैं साएबाँ रब की ने'मत हैं ये इन का बदल है कहाँ मेरे जीवन की जो है कहानी क्या बताऊँ मैं अपनी ज़ुबानी सच कहूँ वो मेरी ज़िंदगानी मेरी राहों के वो हैं निशाँ माँ है साया मेरा बाबा हैं साएबाँ रब की ने'मत हैं ये इन का बदल है कहाँ अपने हाथों से मुझ को खिलाया मुझ को दुनिया में चलना सिखाया रंग उन से ही जीवन में पाया हक़ अदा होंगे कैसे यहाँ माँ है साया मेरा बाबा हैं साएबाँ रब की ने'मत हैं ये इन का बदल है कहाँ माँ ने उँगली पकड़ कर चलाया बाबा ने धूप में तन जलाया मुझ को पलकों पे हर पल बिठाया है दु'आओं में मेरी ज़ुबाँ माँ है साया मेरा बाबा हैं साएबाँ रब की ने'मत हैं ये इन का बदल है कहाँ है इन्हीं से ये रौशन जहाँ है इन्हीं से ये रौशन जहाँ माँ है साया मेरा बाबा हैं साएबाँ रब की ने'मत हैं ये इन का बदल है कहाँ शायर: हनीफ़ सानी नशीद-ख़्वाँ: नवल ख़ान

मेरे ताजुश्शरीआ की क्या शान है / Mere Tajushsharia Ki Kya Shaan Hai

गुलशन-ए-आ'ला-हज़रत की जो जान है मेरे ताजुश्शरी'आ की क्या शान है मस्लक-ए-आ'ला-हज़रत की पहचान है मेरे ताजुश्शरी'आ की क्या शान है जिस के वालिद मुफ़स्सिर हैं क़ुरआन के जिस के दादा मुहाफ़िज़ हैं ईमान के जिस का नाना बरेली का सुलतान है मेरे ताजुश्शरी'आ की क्या शान है गुलशन-ए-आ'ला-हज़रत की जो जान है मेरे ताजुश्शरी'आ की क्या शान है जिस के बाबा वली, जिस के ताया वली जिस के दादा वली, जिस के नाना वली जिस की अज़मत पे हर एक क़ुर्बान है मेरे ताजुश्शरी'आ की क्या शान है गुलशन-ए-आ'ला-हज़रत की जो जान है मेरे ताजुश्शरी'आ की क्या शान है 'इल्म-ओ-तक़वा की जो प्यारी तस्वीर है जिस ने पाई अज़ीमत की तनवीर है इस्तिक़ामत की मज़बूत चट्टान है मेरे ताजुश्शरी'आ की क्या शान है गुलशन-ए-आ'ला-हज़रत की जो जान है मेरे ताजुश्शरी'आ की क्या शान है जो 'उलूम-ए-रज़ा का है वारिस बना जिस के सर फ़ख़्र-ए-अज़हर का सेहरा सजा वो बरेली का अख़्तर रज़ा ख़ान है मेरे ताजुश्शरी'आ की क्या शान है गुलशन-ए-आ'ला-हज़रत की जो जान है मेरे ताजुश्शरी'आ की क्या शान है तेज़ तलवार

सर-ता-ब-क़दम है तन-ए-सुल्तान-ए-ज़मन फूल / Sar-Ta-Ba-Qadam Hai Tan-e-Sultan-e-Zaman Phool

सर-ता-ब-क़दम है तन-ए-सुल्तान-ए-ज़मन फूल लब फूल दहन फूल ज़क़न फूल बदन फूल सदक़े में तेरे बाग़ तो क्या लाए हैं बन फूल इस ग़ुंचा-ए-दिल को भी तो ईमा हो कि बन फूल तिनका भी हमारे तो हिलाए नहीं हिलता तुम चाहो तो हो जाए अभी कोह-ए-मिहन फूल वल्लाह जो मिल जाए मेरे गुल का पसीना माँगे न कभी 'इत्र, न फिर चाहे दुल्हन फूल दिल-बस्ता-ओ-ख़ूँ-गश्ता, न ख़ुश्बू न लताफ़त क्यूँ ग़ुंचा कहूँ ? है मेरे आक़ा का दहन फूल शब याद थी किन दाँतों की शबनम कि दम-ए-सुब्ह शोख़ान-ए-बहारी के जड़ाऊ हैं करन-फूल दंदान-ओ-लब-ओ-ज़ुल्फ़-ओ-रुख़-ए-शह के फ़िदाई हैं दुर्र-ए-'अदन, ला'ल-ए-यमन, मुश्क-ए-ख़ुतन, फूल बू हो कि निहाँ हो गए ताब-ए-रुख़-ए-शह में लो बन गए हैं अब तो हसीनों का दहन फूल हों बार-ए-गुनह से न ख़जिल दोश-ए-'अज़ीज़ाँ लिल्लाह मेरी ना'श कर, ऐ जान-ए-चमन फूल दिल अपना भी शैदाई है उस नाख़ुन-ए-पा का इतना भी मह-ए-नौ पे न ऐ चर्ख़-ए-कुहन ! फूल दिल खोल के ख़ूँ रो ले ग़म-ए-'आरिज़-ए-शह में निकले तो कहीं हसरत-ए-ख़ूँ-नाबा शुदन फूल क्या ग़ाज़ा मला गर्द-ए-मदीना का जो है आज निखरे हुए जोबन में क़ियामत की फबन फूल गर्मी ये क़ियामत

आया है बुलावा फिर इक बार मदीने का / Aaya Hai Bulawa Phir Ik Baar Madine Ka

आया है बुलावा फिर इक बार मदीने का फिर जा के मैं देखूँगा दरबार मदीने का गुलशन से हसीं-तर है कोहसार मदीने का बे-मिस्ल जहाँ में है गुलज़ार मदीने का मैं फूल को चूमूँगा और धूल को चूमूँगा जिस वक़्त करूँगा मैं दीदार मदीने का आँखों से लगा लूँगा और दिल में बसा लूँगा सीने में उतारूँगा मैं ख़ार मदीने का सीने में मदीना हो और दिल में मदीना हो आँखों में भी हो नक़्शा, सरकार ! मदीने का लाती है सर-ए-बालीं रहमत की अदा उन को जिस वक़्त तड़पता है बीमार मदीने का रोते हैं जो दीवाने, बेताब हैं मस्ताने उन सब को दिखा दीजे दरबार मदीने का रोता है जो रातों को उम्मत की मोहब्बत में वो शाफ़े'-ए-महशर है सरदार मदीने का रातों को जो रोता है और ख़ाक पे सोता है ग़म-ख़्वार है, सादा है मुख़्तार मदीने का क़ब्ज़े में दो 'आलम हैं, पर हाथ का तकिया है सोता है चटाई पर सरदार मदीने का दुख-दर्द जहाँ भर के, सब दूर, शहा ! कर के मुझ को तो बना लीजे बीमार मदीने का इस दर के भिकारी की झोली में दो 'आलम हैं शाहों से भी बढ़ कर है नादार मदीने का मक़बूल जहाँ भर में हो दा'वत-ए-इस्लामी सदक़ा तुझे, ऐ रब्ब-ए-ग़फ़्फ़ार ! मदीने

सरकार-ए-मदीना से निस्बत हो तो ऐसी हो / Sarkar-e-Madina Se Nisbat Ho To Aisi Ho

सरकार-ए-मदीना से निस्बत हो तो ऐसी हो ख़ुद प्यारे नबी कह दें, उम्मत हो तो ऐसी हो हम भेजें मुहम्मद पर हर वक़्त दुरूद-ओ-सलाम हर बंदा-ए-मोमिन की 'आदत हो तो ऐसी हो जान अपनी बिलाल ने दी चाहत में मुहम्मद की बस शाफ़े'-ए-महशर की चाहत हो तो ऐसी हो हाफ़िज़ तेरे सीने में जो दौलत-ए-क़ुरआँ है हर एक मुसलमाँ पे दौलत हो तो ऐसी हो अहमद के नवासे ने सर हक़ पे कटा डाला हर साहिब-ए-ईमाँ की हिम्मत हो तो ऐसी हो शायर: समद राजा ना'त-ख़्वाँ: चाँद अफ़ज़ल क़ादरी sarkaar-e-madina se nisbat ho to aisi ho KHud pyaare nabi keh de.n, ummat ho to aisi ho ham bheje.n muhammad par har waqt durood-o-salaam har banda-e-momin ki 'aadat ho to aisi ho jaan apni bilaal ne di chaahat me.n muhammad ki bas shafe'-e-mehshar ki chaahat ho to aisi ho haafiz tere seene me.n jo daulat-e-qur.aa.n hai har ek musalmaa.n pe daulat ho to aisi ho ahmad ke nawaase ne sar haq pe kaTa Daala har saahib-e-imaa.n ki himmat ho to aisi ho Poet: Samad Raja Naat-Khwaan: Chand Afzal Qadri Sark

ऐ आमिना के लाल मदीना बुलाइए / Aye Amina Ke Laal Madina Bulaiye

ऐ आमिना के लाल ! मदीना बुलाइए मरने से पहले गुंबद-ए-ख़ज़रा दिखाइए ऐ आमिना के लाल ! मदीना बुलाइए आक़ा प्यारे आक़ा ! मदीना बुलाइए आक़ा सोहणे आक़ा ! मदीना बुलाइए आँखें तरस रही हैं ज़ियारत के वास्ते इक दिन, हुज़ूर ! ख़्वाब में तशरीफ़ लाइए ऐ आमिना के लाल ! मदीना बुलाइए आक़ा प्यारे आक़ा ! मदीना बुलाइए आक़ा सोहणे आक़ा ! मदीना बुलाइए हसरत है मेरे दिल की, तयबा को जाऊँगा मुझ को, हुज़ूर ! जल्द ही तयबा बुलाइए ऐ आमिना के लाल ! मदीना बुलाइए आक़ा प्यारे आक़ा ! मदीना बुलाइए आक़ा सोहणे आक़ा ! मदीना बुलाइए छेड़ेंगे मुझ को क़ब्र में मुन्कर-नकीर जब फ़ौरन सदा लगाऊँगा, आक़ा बचाइए ऐ आमिना के लाल ! मदीना बुलाइए आक़ा प्यारे आक़ा ! मदीना बुलाइए आक़ा सोहणे आक़ा ! मदीना बुलाइए होगा बुलंद उतना ही रुत्बा ख़ुदा के पास सर को नमाज़ में यहाँ जितना झुकाइए ऐ आमिना के लाल ! मदीना बुलाइए आक़ा प्यारे आक़ा ! मदीना बुलाइए आक़ा सोहणे आक़ा ! मदीना बुलाइए महशर के रोज़ पाओगे उजरत भी कई गुना नाम-ए-नबी पे, मोमिनो ! जितना लुटाइए ऐ आमिना के लाल ! मदीना बुलाइए आक़ा प्यारे आक़ा ! मदीना बुलाइए आक़ा सोहणे आक़ा ! मदीना बुलाइए ना'त-ख़्वाँ: फ़ै

मुझे भी मदीने बुला मेरे मौला / Mujhe Bhi Madine Bula Mere Maula

मुझे भी मदीने बुला, मेरे मौला ! करम की तजल्ली दिखा, मेरे मौला ! बहुत बे-क़रारी के 'आलम में हूँ मैं मेरी बे-क़रारी मिटा, मेरे मौला ! यक़ीं है मदीना करम ही करम है तू रखता जहाँ में सभी का भरम है तुझे वासिता तेरे प्यारे नबी का मेरी अब तो बिगड़ी बना, मेरे मौला ! ये दोनों जहाँ तेरे ज़ेर-ए-असर हैं जो तुझ को न मानें बड़े बे-ख़बर हैं नहीं जानते जो भी तेरे ग़ज़ब को उन्हें ग़फ़लतों से जगा, मेरे मौला ! जिसे तू ने चाहा मैं उस पे फ़िदा हूँ मैं तेरे मुहम्मद के दर का गदा हूँ तुझे वासिता कर्बला की ज़मीं का मुझे हर बला से बचा, मेरे मौला ! शफ़ाअत का वा'दा किया तू ने जिस से गुनाहगार उम्मीद रखते हैं उस से सिफ़ारिश करें तुझ से उम्मत की आक़ा तू करना सभी का भला, मेरे मौला ! मुहम्मद को तू ने जो क़ुरआँ दिया है करोड़ों दिलों में मुकम्मल छुपा है ऐ क़ुरआँ के मालिक ! गुज़ारिश है तुझ से मेरे दिल में क़ुरआँ बसा, मेरे मौला ! मेरी मुश्किलें गर तेरा इम्तिहाँ है तो हर ग़म क़सम से ख़ुशी का समाँ है गुनाहों की मेरे अगर ये सज़ा है तो फिर मुश्किलों को घटा, मेरे मौला ! यहाँ पल में बदले हुए लोग पाए यहाँ पल में अपने

क़ुरआन का एलान है ता-हश्र चलेगा | इस्लाम रहेगा / Quran Ka Elaan Hai Ta-Hashr Chalega | Islam Rahega

क़ुरआन का ए'लान है, ता-हश्र चलेगा इस्लाम रहेगा, इस्लाम रहेगा इस्लाम रहेगा, इस्लाम रहेगा आएगा मिटाने जो वो ख़ुद ही मिटेगा इस्लाम रहेगा, इस्लाम रहेगा इस्लाम रहेगा, इस्लाम रहेगा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा ऐ मालिक-ओ-मौला ! तेरे फ़रमान की ख़ातिर हर दौर में लड़ जाएँगे ईमान की ख़ातिर पीछे न हटेंगे कभी क़ुरआन की ख़ातिर हर दौर में सिक्का भी हमारा ही चलेगा इस्लाम रहेगा, इस्लाम रहेगा इस्लाम रहेगा, इस्लाम रहेगा सिद्दीक़ ने इस के लिए हर ज़ुल्म सहा है फ़ारूक़ ने इस के लिए फ़ाक़ा भी किया है 'उस्मान का इस दीं के लिए ख़ून बहा है फिर कैसे ज़माना इसे बर्बाद करेगा इस्लाम रहेगा, इस्लाम रहेगा इस्लाम रहेगा, इस्लाम रहेगा क्या भूल गए हैं ये मेरे दीन के दुश्मन ज़िंदा नहीं बच पाएँगे आईन के दुश्मन दुनिया से फ़ना होंगे फ़िलिस्तीन के दुश्मन फ़रमान-ए-मुहम्मद है, टला है न टलेगा इस्लाम रहेगा, इस्लाम रहेगा इस्लाम रहेगा, इस्लाम रहेगा हैदर का घराना है जो अनमोल हुआ है तलवार से बच्चा भी जहाँ खेल रहा है हाथों में 'अलम ले के 'अलम-दार चला है फिर कैसे यज़ीदों का यहा

रख लें वो जो दर पर मुझे दरबान वग़ैरा / Rakh Len Wo Jo Dar Par Mujhe Darban Waghaira

रख लें वो जो दर पर मुझे दरबान वग़ैरा फिर क्या है मेरे सामने सुल्तान वग़ैरा ख़ैरात मिली हो जिन्हें सरकार के दर से दुनिया के उठाते नहीं एहसान वग़ैरा आक़ा की चटाई की तो वो शान है वल्लाह बस नाम के हैं तख़्त-ए-सुलैमान वग़ैरा बनना है मुझे ख़ाक-ए-रह-ए-शहर-ए-मदीना बन कर मुझे रहना नहीं मेहमान वग़ैरा तासीर-ए-लु'आब-ए-दहन-ए-पाक है ऐसी सर क़दमों में रख देते हैं लुक़मान वग़ैरा बू-सीरी की इक ना'त ने वो रंग जमाया लोगों के धरे रह गए दीवान वग़ैरा हो हुक्म तो ले आऊँ मैं जन्नत में उन्हें भी कुछ रह गए बाक़ी जो सना-ख़्वान वग़ैरा आएँ तो सही आप के मँगते के मुक़ाबिल जितने भी ज़माने के हैं सुल्तान वग़ैरा शायर: सुल्तान महमूद हाश्मी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद ज़बीब मसूद वक़ार महमूद हाश्मी rakh le.n wo jo dar par mujhe darbaan waGaira phir kya hai mere saamne sultaan waGaira KHairaat mili ho jinhe.n sarkaar ke dar se duniya ke uThaate nahi.n ehsaan waGaira aaqa ki chaTaai ki to wo shaan hai wallah bas naam ke hai.n taKHt-e-sulaimaan waGaira ban.na hai mujhe KHaak-e-rah-e-shehr-e

मेरा इस्लाम रहेगा / Mera Islam Rahega

मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा आफ़ाक़ पे ताबिंदा यही नाम रहेगा हर दौर में ज़िंदा मेरा इस्लाम रहेगा मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा नफ़रत का मोहब्बत से कोई मेल नहीं है इस्लाम है एक दीन, कोई खेल नहीं है मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा कुछ वक़्त गुज़रने दो ये अमरीका कहेगा इस्लाम था, इस्लाम है, इस्लाम रहेगा मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा हर दुश्मन-ए-इस्लाम को इस बात का डर है तलवार लिए अब भी खड़ा कोई 'उमर है मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा दरवाज़ा शुजा'अत का नया खोल रहे थे मरहब को पटक कर ये 'अली बोल रहे थे मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा बू-बक्र-ओ-'उमर, हैदर-ओ-'उस्मान ये बोले और शहर-ए-बरेली से रज़ा ख़ान ये बोले मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा मेरा इस्लाम रहेगा, मेरा इस्लाम रहेगा असग़र के तबस्सुम का अस