मुस्तफ़ा ख़ैर-उल-वरा हो / Mustafa Khair-ul-wara Ho
मुस्तफ़ा ! ख़ैर-उल-वरा हो सरवर-ए-हर-दो-सरा हो अपने अच्छों का तसद्दुक़ हम बदों को भी निबाहो किस के फिर हो कर रहें हम गर तुम्हीं हम को न चाहो बद हँसें तुम उन की ख़ातिर रात भर रोओ कराहो बद करें हर दम बुराई तुम कहो उन का भला हो हम वही ना-शुस्ता-रू हैं तुम वही बहर-ए-'अता हो हम वही शायान-ए-रद हैं तुम वही शान-ए-सख़ा हो हम वही बे-शर्म-ओ-बद हैं तुम वही कान-ए-हया हो हम वही नंग-ए-जफ़ा हैं तुम वही जान-ए-वफ़ा हो हम वही क़ाबिल सज़ा के तुम वही रहम-ए-ख़ुदा हो चर्ख़ बदले, दहर बदले तुम बदलने से वरा हो अब हमीं हों सहव हाशा ऐसी भूलों से जुदा हो 'उम्र भर तो याद रक्खा वक़्त पर क्या भूलना हो वक़्त-ए-पैदायिश न भूले कैफ़-यन्सा क्यूँ क़ज़ा हो ये भी, मौला ! 'अर्ज़ कर दूँ भूल अगर जाओ तो क्या हो वो हो जो तुम पर गिराँ है वो हो जो हरगिज़ न चाहो वो हो जिस का नाम लेते दुश्मनों का दिल बुरा हो वो हो जिस के रद की ख़ातिर रात-दिन वक़्फ़-ए-दु'आ हो मर मिटें बर्बाद बंदे ख़ाना आबाद आग का हो शाद हो इब्लीस मल'ऊँ ग़म किसे इस क़हर का हो तुम को हो वल्लाह तुम को जान-ओ-दिल तुम पर फ़िदा हो तुम को ...