सर-ए-ला-मकाँ से तलब हुई | बलग़ल उला बि-कमालिहि / Sare La Makan Se Talab Hui | Balaghal Ula Bi Kamalihi
सर-ए-ला-मकाँ से तलब हुई सू-ए-मुंतहा वो चले नबी कोई हद है उन के 'उरूज की बलग़ल-'उला बि-कमालिहि बलग़ल-'उला बि-कमालिहि कशफ़-द्दुजा बि-जमालिहि हसुनत जमी'उ ख़िसालिहि सल्लू 'अलैहि व आलिहि वही ला-मकाँ के मकीं हुए सर-ए-'अर्श तख़्त-नशीं हुए वो नबी हैं जिस के हैं ये मकाँ वो ख़ुदा है जिस का मकाँ नहीं सर-ए-'अर्श पर है तेरी गुज़र दिल-ए-फ़र्श पर है तेरी नज़र मलकूत-मुल्क में कोई शय नहीं वो जो तुझ पे अयाँ नहीं वो ख़ुदा के नूर को देख कर भी जहान वालों में आ गए सर-ए-'अर्श जाना कमाल था कि वहाँ से आना कमाल है रुख़-ए-मुस्तफ़ा की ये रौशनी ये तजल्लियों की हमाहमी कि हर एक चीज़ चमक उठी कशफ़-द्दुजा बि-जमालिहि वो सरापा रहमत-ए-किब्रिया कि हर इक पे उन का करम हुआ ये कलाम-ए-पाक है बरमला हसुनत जमी'उ ख़िसालिहि ये कमाल-ए-ख़ुल्क़-ए-मुहम्मदी कि हर इक पे चश्म-ए-करम रही सर-ए-हश्र ना'रा-ए-उम्मती हसुनत जमी'उ ख़िसालिहि वही हक़-निगर, वही हक़-नुमा रुख़-ए-मुस्तफ़ा है वो आईना कि ख़ुदा-ए-पाक ने ख़ुद कहा सल्लू 'अलैहि व आलिहि मेरा दीन, 'अंबर-ए-वारसी ! ब-ख़ुदा है 'इ...
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