रमज़ान के ये लम्हे अब दूर हो रहे हैं | अल-वदा रमज़ान अल-वदा / Ramzan Ke Ye Lamhe Ab Door Ho Rahe Hain | Al Wada Ramzan Al Wada
अल-वदा', रमज़ान ! अल-वदा' अल-वदा', रमज़ान ! अल-वदा' रमज़ान के ये लम्हे अब दूर हो रहे हैं बस अल-वदा' कहें हम, मजबूर हो रहे हैं अल-वदा', रमज़ान ! अल-वदा' हम से रहा न जाए, कुछ भी कहा न जाए तुझ से जुदाई का ग़म हम से सहा न जाए टूटा है दिल का शीशा और चूर हो रहे हैं अल-वदा', रमज़ान ! अल-वदा' रौनक़ भरा समाँ था, नूरी था सब नज़ारा 'इस्याँ के जो हैं मारे, है उन का तू सहारा जज़्बे 'इबादतों के अब दूर हो रहे हैं अल-वदा', रमज़ान ! अल-वदा' इफ़्तार और सहर में रौनक़ हुई थी हर-सू रमज़ान की बहारें फैली हुई थीं हर-सू चारों तरफ़ नज़ारे बे-नूर हो रहे हैं अल-वदा', रमज़ान ! अल-वदा' कर न सके हैं कोई रब की 'इबादतें हम ने भुला ही डाली रब की 'इनायतें नादिम हैं, ऐ ख़ुदाया ! मग़्मूम हो रहे हैं अल-वदा', रमज़ान ! अल-वदा' इस आरज़ू से सानी महरूम हो न जाएँ रौज़ा-ए-मुस्तफ़ा पर ऐ काश ! तुझ को पाएँ तेरी जुदाई से हम रंजूर हो रहे हैं बस अल-वदा' कहें हम, मजबूर हो रहे हैं अल-वदा', रमज़ान ! अल-वदा' शायर: मुहम्मद हनीफ़ सानी ना'त-ख़्वा...