मंज़र फ़िज़ा-ए-दहर में सारा अली का है | जिस सम्त देखता हूँ नज़ारा अली का है / Manzar Fiza-e-Dahar Mein Sara Ali Ka Hai | Jis Samt Dekhta Hun Nazara Ali Ka Hai
मंज़र फ़िज़ा-ए-दहर में सारा 'अली का है जिस सम्त देखता हूँ, नज़ारा 'अली का है दुनिया-ए-आश्ती की फबन, मुज्तबा हसन लख़्त-ए-जिगर नबी का तू प्यारा 'अली का है हस्ती की आब-ओ-ताब, हुसैन आसमाँ जनाब ज़हरा का लाल, राज दुलारा 'अली का है मरहब दो-नीम है सर-ए-मक़्तल पड़ा हुआ उठने का अब नहीं कि ये मारा 'अली का है कुल का जमाल जुज़्व के चेहरे से है 'अयाँ घोड़े पे हैं हुसैन, नज़ारा 'अली का है ऐ अर्ज़-ए-पाक ! तुझ को मुबारक कि तेरे पास परचम नबी का, चाँद सितारा 'अली का है तुम दख़्ल दे रहे हो 'अक़ीदत के बाब में देखो मु'आमला ये हमारा 'अली का है हम फ़क़्र-ए-मस्त, चाहने वाले 'अली के हैं दिल पर हमारे सिर्फ़ इजारा 'अली का है दुनिया में और कौन है अपना ब-जुज़ 'अली हम बेकसों को है तो सहारा 'अली का है तू क्या है और क्या है तेरे 'इल्म की बिसात तुझ पर करम, नसीर ! ये सारा 'अली का है शायर: पीर नसीरुद्दीन नसीर ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद फ़सीहुद्दीन सोहरवर्दी manzar fiza-e-dahar me.n saara 'ali ka hai jis samt dekhta hu.n, nazaara...