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सरकार का दरबार नहीं देख रहे क्या / Sarkar Ka Darbar Nahi Dekh Rahe Kya

सरकार का दरबार नहीं देख रहे क्या ? दरबार में दो यार नहीं देख रहे क्या ? तुम दुनिया के मे'यार तो सब देख रहे हो अल्लाह का मे'यार नहीं देख रहे क्या ? कहते हो कि क़ुरआन में बू-बक्र कहाँ है ? तुम आयत-ए-फ़िल-ग़ार नहीं देख रहे क्या ? दूल्हा बने आए हैं अबू-बक्र के घर में कौनैन के सरदार नहीं देख रहे क्या ? सिद्दीक़ इमामत पे है और मुक़्तदियों में तुम हैदर-ए-कर्रार नहीं देख रहे क्या ? हर घर नहीं अल्लाह का घर होता, मेरे दोस्त ! तुम मस्जिद-ए-ज़र्रार नहीं देख रहे क्या ? तहसीन ! अभी हक़ के तरफ़-दार बहुत हैं ये मजमा'-ए-बेदार नहीं देख रहे क्या ? शायर: यूनुस तहसीन ना'त-ख़्वाँ: वक़ार उमर डंगराज sarkaar ka darbaar nahi.n dekh rahe kya ? darbaar me.n do yaar nahi.n dekh rahe kya ? tum duniya ke me'yaar to sab dekh rahe ho allah ka me'yaar nahi.n dekh rahe kya ? kehte ho ki qur.aan me.n bu-bakr kahaa.n hai ? tum aayat-e-fil-Gaar nahi.n dekh rahe kya ? dulha bane aae hai.n abu-bakr ke ghar me.n kaunain ke sardaar nahi.n dekh rahe kya ? Siddiq imaama...

बड़ा महबूब घराना अली हैदर का घराना / Bada Mehboob Gharana Ali Haider Ka Gharana

मेरा 'इश्क़ 'अली, मेरी जान 'अली मेरा 'इश्क़ 'अली, मेरी जान 'अली बड़ा महबूब घराना, 'अली हैदर का घराना ग़ुलाम इन का है ज़माना, 'अली हैदर का घराना मन-कुंतु मौला ! 'अली 'अली ! आक़ा ने बोला ! 'अली 'अली ! मैं जिस का मौला ! 'अली 'अली ! है उस का मौला ! 'अली 'अली ! ज़हरा का शौहर ! 'अली 'अली ! हसनैन का बाबा ! 'अली 'अली ! हम सब ने पुकारा ! 'अली 'अली मौला ! बड़ा महबूब घराना, 'अली हैदर का घराना किया हर काम उसी की रिज़ा में राज़ी रह कर ख़ुदा के दीन की ख़ातिर हज़ारों सदमे सेह कर करे हर-दम शुक्राना, 'अली हैदर का घराना बड़ा महबूब घराना, 'अली हैदर का घराना कदी मिम्बर ते खड़ के, कदी मैदाँ ते लड़ के कदी नेज़े ते चढ़ के, कदी ख़ुत्बे पढ़ पढ़ के सिखावे दीन बचाणा, 'अली हैदर दा घराना बड़ा महबूब घराना, 'अली हैदर दा घराना पुकारा जब मुश्किल में, इन्हों ने की लजपाली सभी मँगतों की पल में भरी है झोली ख़ाली झुका जिस दर पे ज़माना, 'अली हैदर का घराना बड़ा महबूब घराना, 'अली हैदर का घराना ओहदा हजवेरी गदागर,...

ज़हरा का दिल अली का दुलारा हुसैन है / Zahra Ka Dil Ali Ka Dulara Hussain Hai

ज़हरा का दिल 'अली का दुलारा हुसैन है प्यारे नबी की आँखों का तारा हुसैन है हर जन्नती जवाँ की क़यादत है उस के हाथ अल्लाह की नज़र में यूँ प्यारा हुसैन है काँधे पे जो रसूल के होता रहा सवार क़िस्मत का एक शोख़ सितारा हुसैन है मैदान-ए-कर्बला से है गूँजी यही सदा इस्लाम का सुतून-ओ-सहारा हुसैन है सर को कटा के, मोमिनो ! साबित ये कर दिया ईमान और यक़ीन का धारा हुसैन है इस्लाम के लिए थी शहादत हुसैन की सौग़ात-ए-नानाजान पे वारा हुसैन है 'उक़्बा का ताजवर ही नहीं है 'अली का ला'ल दुनिया के हर जवाँ में भी न्यारा हुसैन है जिस ने यज़ीदियों से सुल्ह-ए-कुल न की कभी बातिल के सर पे हक़ का शरारा हुसैन है शायर: हाफ़िज़ुल्लाह क़ासमी ना'त-ख़्वाँ: संदली अहमद zahra ka dil, 'ali ka dulaara husain hai pyaare nabi ki aankho.n ka taara husain hai har jannati jawaa.n ki qayaadat hai us ke haath allah ki nazar me.n yu.n pyaara husain hai kaandhe pe jo rasool ke hota raha sawaar qismat ka ek shoKH sitaara husain hai maidaan-e-karbala se hai goonji yahi sada islaam ka s...

मेरा मौला मौला हुसैन है / Mera Maula Maula Hussain Hai

मेरा मौला मौला हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है जो हुआ नवासा-ए-मुस्तफ़ा वो 'अली का बेटा हुसैन है जो यज़ीदियत को फ़ना करे चले कर्बला वो हुसैन है बीबी फ़ातिमा का वो लाडला मेरा बादशाह वो हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है क्या सुनाऊँ वाक़ि'आ कर्बला हाए ! तीर-नेज़ा कहाँ लगा जिसे चूमते रहे मुस्तफ़ा वो हुसैनी सर था कटा हुआ सारा घर का घर भी लुटा दिया वो जो कर गया वो हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है यही बोले हज़रत-ए-हुर्र शहा या हुसैन ! आप का शुक्रिया कि यज़ीदियों से निकाल कर जो हुसैनियों में बिठा दिया मुझे मंज़िलों का पता दिया मेरा रहनुमा वो हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है वो भी बंदा कितना 'अजीब है जो कहे यज़ीद भी ठीक है या हुसैनी बन या यज़ीदी बन ऐसे जूट में क्यूँ शरीक है क्यूँ दो कश्तियों का सवार है जो है हक़-नुमा वो हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है मेरा मौला मौला हुसैन है जो दर-ए-हुसैन पे आ गया सारी मन्नतों को वो पा गया ये घराना आल-ए-नबी का है जो सख़ावतों को सिखा गया जो फ़क़ीर को करे बा...

हूँ ख़ाक मगर आलम-ए-अनवार से निस्बत है / Hun Khak Magar Aalam-e-Anwaar Se Nisbat Hai

हूँ ख़ाक मगर 'आलम-ए-अनवार से निस्बत है मैं कुछ भी नहीं लेकिन सरकार से निस्बत है दुनिया की शहंशाही रखता हूँ मैं ठोकर पर कौनैन के उस मालिक-ओ-मुख़्तार से निस्बत है मैं ख़ाक का पुतला हूँ, वो 'अर्श के राही हैं इस पार का बासी हूँ, उस पार से निस्बत है हैं रोज़-ए-अज़ल से मेरी घुट्टी में वफ़ाएँ नाज़ा हूँ कि 'अब्बास 'अलम-दार से निस्बत है सर झुक नहीं सकते सर-ए-महशर भी हमारे सर इस लिए ऊँचे हैं, सरदार से निस्बत है हम मानने वाले हैं हुसैन इब्न-ए-'अली के वक़्त आए अगर दीं पे तो फिर दार से निस्बत है सरकार के दामन से, अल्ताफ़ ! हूँ वाबस्ता ग़म पास भी क्यूँ आएँ कि ग़म-ख़्वार से निस्बत है शायर: सय्यिद अल्ताफ़ शाह काज़मी ना'त-ख़्वाँ: उमेर मुनीर क़ादरी तल्हा क़ादरी hu.n KHaak magar 'aalam-e-anwaar se nisbat hai mai.n kuchh bhi nahi.n lekin sarkaar se nisbat hai duniya ki shahenshaahi rakhta hu.n mai.n Thokar par kaunain ke us maalik-o-muKHtaar se nisbat hai mai.n KHaak ka putla hu.n, wo 'arsh ke raahi hai.n is paar ka baasi hu.n, us paar se nisbat h...

मुहम्मद नाम ऐसा है कि जिस लब पर ये नाम आया / Muhammad Naam Aisa Hai Ke Jis Lab Par Ye Naam Aaya

नाम-ए-मुहम्मद सल्ले-'अला, नाम-ए-मुहम्मद सल्ले-'अला नाम-ए-मुहम्मद सल्ले-'अला, नाम-ए-मुहम्मद सल्ले-'अला सल्ले-'अला नबिय्येना, सल्ले-'अला मुहम्मदिन सल्ले-'अला नबिय्येना, सल्ले-'अला मुहम्मदिन मुहम्मद नाम ऐसा है कि जिस लब पर ये नाम आया इता'अत हो गई वाजिब, शफ़ा'अत का पयाम आया मोहब्बत का तक़ाज़ा था, यही दिल की तमन्ना थी कि हर लब पर दुरूद आया, कि हर दिल में सलाम आया जहाँ वालों ने पूछा जब कि क्या है दीन का जौहर ज़ुबाँ पर था फ़क़त क़ुरआन, दिल में उन का नाम आया श'ईर-ओ-तूर से फूटे यक़ीनन चश्मे नूरानी मगर फ़ारान का बादल तो सागर था मदाम आया ज़मीं वालो ! मुबारक हो कि ये अर्ज़-ए-मुतह्हर है मुरीद-ए-बा-सफ़ा बन कर मलाइक का इमाम आया ग़ुलामान-ए-मुहम्मद का जहाँ में मर्तबा देखो कि हर दिल में मुक़द्दस है, ज़ुबाँ पर एहतिराम आया मुक़द्दस हस्तियाँ, शाकिर ! अगरचे और भी तो हैं सर-ए-'अर्श-ए-बरीं लिक्खा, मगर उन का ही नाम आया शायर: शाकिर फ़ारूक़ी ना'त-ख़्वाँ: जवाद रज़ा क़ादरी naam-e-muhammad salle-'ala, naam-e-muhammad salle-'ala naam-e...

कौनैन के दूल्हा के सदक़े में ख़ुदाई है | सुनते हैं कि महशर में तज़मीन के साथ / Kaunain Ke Dulha Ke Sadqe Mein Khudai Hai | Sunte Hain Ke Mehshar Mein With Tazmeen

कौनैन के दूल्हा के सदक़े में ख़ुदाई है महबूब-ए-करीमा ने हाँ शान वो पाई है मौला ने फ़तर्दा की ख़ुश-ख़बरी सुनाई है सुनते हैं कि महशर में सिर्फ़ उन की रसाई है गर उन की रसाई है लो जब तो बन आई है रहमत ने सर-ए-महशर क्या रंग जमाई है सौग़ात-ए-करम देखो ला-तक़्नतू लाई है आक़ा की शफ़ा'अत ने क्या धूम मचाई है मचला है कि रहमत ने उम्मीद बँधाई है क्या बात तेरी, मुजरिम ! क्या बात बनाई है आ'माल-ए-सियह ने जब फिटकार दिया हम को हम क्या कहें अपनों ने क्या प्यार दिया हम को माँ-बाप ने भी, आक़ा ! धुतकार दिया हम को सब ने सफ़-ए-महशर में ललकार दिया हम को ऐ बेकसों के आक़ा ! अब तेरी दुहाई है सरकार की 'अज़मत का जब ज़िक्र-ए-जली छेड़ो बाज़ार-ए-मोहब्बत में फिर होश-ओ-ख़िरद भेजो गुलदस्ता-ए-तन-मन-धन हर चीज़ ही, ऐ लोगो ! यूँ तो सब उन्हीं का है पर दिल की अगर पूछो ये टूटे हुए दिल ही ख़ास उन की कमाई है यूँ बज़्म-ए-मोहब्बत से हरगिज़ न तू ख़ाली उठ महबूब की चौखट से ले कर के, सवाली ! उठ सरकार-ए-मदीना के ऐ क़ल्ब-ए-फ़िदाई ! उठ ऐ दिल ! ये सुलगना क्या, जलना है तो जल भी उठ दम घुटने लगा, ज़ालिम ! क्या धूनी रमाई है दुनिया की...

सुनते हैं कि महशर में सिर्फ़ उन की रसाई है / Sunte Hain Ke Mehshar Mein Sirf Un Ki Rasai Hai

सुनते हैं कि महशर में सिर्फ़ उन की रसाई है गर उन की रसाई है लो जब तो बन आई है मचला है कि रहमत ने उम्मीद बँधाई है क्या बात तेरी, मुजरिम ! क्या बात बनाई है सब ने सफ़-ए-महशर में ललकार दिया हम को ऐ बेकसों के आक़ा ! अब तेरी दुहाई है यूँ तो सब उन्हीं का है, पर दिल की अगर पूछो ये टूटे हुए दिल ही ख़ास उन की कमाई है ज़ाइर गए भी कब के, दिन ढलने पे है, प्यारे ! उठ मेरे अकेले चल, क्या देर लगाई है बाज़ार-ए-'अमल में तो सौदा न बना अपना सरकार करम तुझ में 'ऐबी की समाई है गिरते हुओं को मुज़्दा सज्दे में गिरे मौला रो रो के शफ़ा'अत की तम्हीद उठाई है ऐ दिल ! ये सुलगना क्या, जलना है तो जल भी उठ दम घुटने लगा, ज़ालिम ! क्या धूनी रमाई है मुजरिम को न शर्माओ, अहबाब ! कफ़न ढक दो मुँह देख के क्या होगा, पर्दे में भलाई है अब आप ही सँभालें तो काम अपने सँभल जाएँ हम ने तो कमाई सब खेलों में गँवाई है ऐ 'इश्क़ ! तेरे सदक़े जलने से छुटे सस्ते जो आग बुझा देगी, वो आग लगाई है हिर्स-ओ-हवस-ए-बद से, दिल ! तू भी सितम कर ले तू ही नहीं बेगाना, दुनिया ही पराई है हम दिल-जले हैं किस के, हट फ़ितनों के परकाले...

कौन है जो ये इल्तिजा न करे | दिल को उन से ख़ुदा जुदा न करे तज़मीन के साथ / Kaun Hai Jo Ye Iltija Na Kare | Dil Ko Un Se Khuda Juda Na Kare With Tazmeen

कौन है जो ये इल्तिजा न करे कौन उन के लिए मरा न करे कौन रो रो के ये दु'आ न करे दिल को उन से ख़ुदा जुदा न करे बेकसी लूट ले ख़ुदा न करे 'इश्क़ का सर पे डाल कर के ग़िलाफ़ बात अहल-ए-ख़िरद ये सुन लें साफ़ काम है कौन सा शरा' के ख़िलाफ़ इस में रौज़े का सज्दा हो कि तवाफ़ होश में जो न हो वो क्या न करे रात-दिन हम गुनह में डूबे हैं जुर्म जितने हैं सारे करते हैं फिर भी आक़ा करीम ऐसे हैं ये वही हैं कि बख़्श देते हैं कौन इन जुर्मों पर सज़ा न करे 'इश्क़ ने कर दिया मुझे मशहूर उन की यादों से ज़ेहन है मा'मूर मुझ को इस बात पे है फ़ख़्र ज़रूर दिल में रौशन है शम'-ए-'इश्क़-ए-हुज़ूर काश ! जोश-ए-हवस हवा न करे ज़ख़्म सीने के सारे सीने को जो यहाँ मर रहे थे जीने को ऐ वसी ! जाम-ए-'इश्क़ पीने को ले, रज़ा ! सब चले मदीने को मैं न जाऊँ अरे ख़ुदा न करे कलाम: इमाम अहमद रज़ा ख़ान तज़मीन: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी kaun hai jo ye iltija na kare kaun un ke liye mara na kare kaun ro ro ke ye du'aa na kare dil ko un se...

तू सब को हज पे बुला रहा है | मुझे भी हज पे बुला ले मौला / Tu Sab Ko Hajj Pe Bula Raha Hai | Mujhe Bhi Hajj Pe Bula Le Maula

तू सब को हज पे बुला रहा है मुझे भी हज पे बुला ले, मौला ! तुझे मुहम्मद का वासिता है मुझे भी हज पे बुला ले, मौला ! ज़बाँ पे लब्बैक की सदा हो करूँ हरम का तवाफ़ मैं भी यही तमन्ना है मेरे दिल की ये इज़्न मुझ को भी दे, ख़ुदाया ! हो सामने तेरा प्यारा का'बा पियूँ मैं ज़मज़म का जाम, मौला ! शरफ़ 'अता कर मुझे भी, मौला ! है वासिता तुझ को मुस्तफ़ा का ग़िलाफ़-ए-का'बा से मैं लिपट कर दु'आएँ माँगूँ मैं ख़ूब रोऊँ मु'आफ़ी माँगूँ मैं तुझ से, मौला ! तू बख़्श देना मुझे, ख़ुदाया ! मिना-ओ-मुज़्दलिफ़ा और 'अरफ़ात - के भी जल्वों को देखूँ, मौला ! करम ये फ़रमा दे तुझ को, मौला ! है वासिता बिन्त-ए-मुस्तफ़ा का मैं चूमूँ प्यारा वो संग-ए-अस्वद मुझे भी हासिल हो ये स'आदत ऐ ख़ालिक़-ए-कुल ऐ मालिक-ए-कुल ! ये पूरी कर दे मेरी तमन्ना हरम से हो कर मदीने जाऊँ जहाँ पे सरदार-ए-दो-जहाँ हैं पकड़ के उन की सुनहरी जाली तलब करूँ सदक़ा पंजतन का है आरज़ू उन के दर पे जाऊँ मैं हाल दिल का उन्हें बताऊँ जब उन की चौखट पे सर को रक्खूँ हो ख़ातिमा मेरी ज़िंदगी का शरफ़ दे शौक़-ए-फ़रीदी को भी दर-ए-शह-ए-दीं पे हाज़िरी...

जो न होता तेरा जमाल ही | सल्लू अलैहि व आलिही / Jo Na Hota Tera Jamal Hi | Sallu Alaihi Wa Aalihi

जो न होता तेरा जमाल ही सल्लू 'अलैहि व आलिही जो न होता तेरा जमाल ही तो जहाँ था ख़्वाब-ओ-ख़याल ही सल्लू 'अलैहि व आलिही मह-ओ-मेहर में तेरी रौशनी हुई ख़त्म तुझ पे पयंबरी नहीं तुझ सा तेरे सिवा कोई करे कौन तेरी बराबरी ये नहीं किसी की मजाल ही सल्लू 'अलैहि व आलिही न फ़सील है, न महल-सरा तेरा फ़र्श है वही बोरिया तेरे जिस्म-ए-पाक पे इक क़बा वो भी तार-तार है जा-ब-जा तेरी सादगी है कमाल ही सल्लू 'अलैहि व आलिही तू ख़लील है, तू कलीम है तू रऊफ़ है, तू रहीम है तू हबीब-ए-रब्ब-ए-करीम है तेरी शान सब से 'अज़ीम है नहीं कोई तेरी मिसाल ही सल्लू 'अलैहि व आलिही तू कलीम है, तू करीम है तू रऊफ़ है, तू रहीम है तू हबीब-ए-रब्ब-ए-करीम है तेरी शान सब से 'अज़ीम है नहीं कोई तेरी मिसाल ही सल्लू 'अलैहि व आलिही शायर: तनवीर नक़वी ना'त-ख़्वाँ: ज़ुबैदा ख़ानम यश्फ़ीन अजमल शैख़ सय्यिदा अरीबा फ़ातिमा jo na hota tera jamaal hi sallu 'alaihi wa aalihi jo na hota tera jamaal hi to jahaa.n tha KHwaab-o-KHayaal hi sallu 'alaihi wa aalihi mah-o-mehr me.n t...

तेरे इश्क़ में मैं क्या हूँ दुनिया को पता क्या है / Tere Ishq Mein Main Kya Hun Duniya Ko Pata Kya Hai

तेरे 'इश्क़ में मैं क्या हूँ, दुनिया को पता क्या है पागल हूँ दीवाना हूँ, जानूँ क्या ख़ता क्या है होश अपना, ये दिल तुम पर पहले ही गवाए था इक 'अक़्ल ही आख़िर थी, अब पास बचा क्या है लगते हैं ये बे-रौनक़ जन्नत के नज़ारे सब अल्लाह-अल्लाह मदीने की पाकीज़ा फ़ज़ा क्या है हो दफ़्न मेरी मय्यत भी घोर अँधेरे में सरकार की बेटी से पूछो कि हया क्या है ना'त-ख़्वाँ: गुलफ़ाम रज़ा हस्सानी tere 'ishq me.n mai.n kya hu.n, duniya ko pata kya hai paagal hu.n deewana hu.n, jaanu.n kya KHata kya hai hosh apna, ye dil tum par pehle hi gawaae thaa ik 'aql hi aaKHir thi, ab paas bacha kya hai lagte hai.n ye be-raunaq jannat ke nazaare sab allah-allah madine ki paakeeza faza kya hai ho dafn meri mayyat bhi ghor andhere me.n sarkaar ki beTi se poochho ki haya kya hai Naat-Khwaan: Gulfam Raza Hassani Tere Ishq Mein Main Kya Hun Lyrics | Tere Ishq Mein Main Kya Hun Duniya Ko Pata Kya Hai Lyrics in Hindi | Tere Ishq Me Main Kya Hoon Lyrics | mei mai hon hu hei hai hein ha...

वो मेरा ग़नी मेरा ग़नी मेरा ग़नी है / Wo Mera Ghani Mera Ghani Mera Ghani Hai

बा-वफ़ा बा-हया, आ'ला-ओ-'आली-सफ़ा मेरा 'उस्मान वो जिस के वसीले से हर इक बात बनी है वो मेरा ग़नी, मेरा ग़नी, मेरा ग़नी है वो मेरा ग़नी, मेरा ग़नी, मेरा ग़नी है मेरा मुर्शिद, मेरा मौला, मेरा सुल्तान है 'उस्मान मेरा दाता, मेरा आक़ा , मेरी पहचान है 'उस्मान सख़ियों का सख़ी है, 'उस्मान-ए-ग़नी है सख़ियों का सख़ी है, 'उस्मान-ए-ग़नी है जो जामे'-ए-क़ुरआन है, है 'आमिल-ए-सुन्नत ता-'उम्र दिया जिस ने हमें दर्स-ए-शरी'अत वो जिस से कली दीन के गुलशन की खिली है वो मेरा ग़नी, मेरा ग़नी, मेरा ग़नी है जो फ़ख़्र-ए-अबू-बक्र है, दामाद-ए-नबी है लौ जिस से 'उमर और 'अली की भी लगी है उस सा न ज़माने में कोई आया सख़ी है वो मेरा ग़नी, मेरा ग़नी, मेरा ग़नी है 'उस्मान का दुश्मन तो नबी का भी है दुश्मन दुश्मन है ख़ुदा का, वो 'अली का भी है दुश्मन दोज़ख़ का वो हक़दार है, हक़ बात यही है वो मेरा ग़नी, मेरा ग़नी, मेरा ग़नी है हो कैसे बयाँ हज़रत-ए-'उस्मान की 'अज़मत क़ुरआन को पढ़ते हुए पाई है शहादत वो जिस की जबीं आगे न दुश्मन के झुकी है वो मेरा ग़नी, मेरा ग़नी, मेरा ग़नी है हम अ...

अल्लाह से क्या प्यार है उस्मान-ए-ग़नी का / Allah Se Kya Pyar Hai Usman-e-Ghani Ka

अल्लाह से क्या प्यार है 'उस्मान-ए-ग़नी का महबूब-ए-ख़ुदा यार है 'उस्मान-ए-ग़नी का रंगीन वो रुख़्सार है 'उस्मान-ए-ग़नी का बुलबुल गुल-ए-गुलज़ार है 'उस्मान-ए-ग़नी का गर्मी पे ये बाज़ार है 'उस्मान-ए-ग़नी का अल्लाह ख़रीदार है 'उस्मान-ए-ग़नी का क्या ला'ल शकर-बार है 'उस्मान-ए-ग़नी का क़ंद एक नमक-ख़्वार है 'उस्मान-ए-ग़नी का सरकार 'अता-पाश है 'उस्मान-ए-ग़नी का दरबार दुरर-बार है 'उस्मान-ए-ग़नी का दिल-सोख़्त-ओ-हिम्मत-जिगर अब होते हैं ठंडे वो साया-ए-दीवार है 'उस्मान-ए-ग़नी का जो दिल को ज़िया दे, जो मुक़द्दर को जिला दे वो जल्वा-ए-दीदार है 'उस्मान-ए-ग़नी का जिस आईना में नूर-ए-इलाही नज़र आए वो आईना रुख़्सार है 'उस्मान-ए-ग़नी का सरकार से पाएँगे मुरादों पे मुरादें दरबार ये दुर-बार है 'उस्मान-ए-ग़नी का आज़ाद गिरिफ़्तार-ए-बला-ए-दो-जहाँ है आज़ाद गिरिफ़्तार है 'उस्मान-ए-ग़नी का बीमार है जिस को नहीं आज़ार-ए-मोहब्बत अच्छा है जो बीमार है 'उस्मान-ए-ग़नी का अल्लाहु-ग़नी हद नहीं इन'आम-ओ-'अता की वो फ़ैज़ पे दरबार है 'उस्मान-ए-ग़नी का रुक जाएँ ...