मदीने की अँगूठी है नगीना ग़ौस-ए-आज़म का / Madine Ki Angoothi Hai Nageena Ghaus-e-Azam Ka
मदीने की अँगूठी है, नगीना ग़ौस-ए-आ'ज़म का जहाँ में बटता है हर-सू ख़ज़ीना ग़ौस-ए-आ'ज़म का मुरीदी ला-तख़फ़ की दी तसल्ली हम ग़ुलामों को डुबो सकता नहीं तूफ़ाँ सफ़ीना ग़ौस-ए-आ'ज़म का वसीला क़ुर्ब-ए-रब का हैं मुहम्मद मुस्तफ़ा बेशक मुहम्मद तक पहुँचने का है ज़ीना ग़ौस-ए-आ'ज़म का न जाने किस बिना पर मुश्क-ओ-अम्बर फ़ख़्र करते हैं ज़रा सुँघवाओ उन सब को पसीना ग़ौस-ए-आ'ज़म का हर एक सुन्नी के घर में ग्यारहवीं का जश्न होता है वहाबी सोज़ है प्यारा महीना ग़ौस-ए-आ'ज़म का क़दम मेरा सभी वलियों की गर्दन पर, ये फ़रमाया क़दम ये है तो कैसा होगा सीना ग़ौस-ए-आ'ज़म का हमारी ज़िंदगी भी ख़िदमत-ए-मख़्लूक़ में गुज़रे इलाही ! कर 'अता हम को क़रीना ग़ौस-ए-आ'ज़म का सर-ए-महशर पुकारा जाएगा यूँ नाम नज़्मी का ये नज़्मी कौन है ? हाँ हाँ वही ना ग़ौस-ए-आ'ज़म का शायर: नज़्मी मियाँ मारेहरवी ना'त-ख़्वाँ: मुहम्मद शरीफ़ रज़ा पाली madine ki angooThi hai, nageena Gaus-e-aa'zam ka jahaa.n me.n baT.ta hai har-soo KHazeena Gaus-e-aa'zam ka mureedi laa-taKHaf ki di tasalli ham Gulaamo.n ko Dubo...