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ख़ुदा का दिल में बस जाना ये इक फ़ज़्ल-ए-ख़ुदावंदी / Khuda Ka Dil Mein Bas Jana Ye Ik Fazl-e-Khudawandi

ख़ुदा का दिल में बस जाना ये इक फ़ज़्ल-ए-ख़ुदावंदी ख़ुदा का फ़ज़्ल पाना भी ख़ुदा की मेहरबानी है मुझे है 'इश्क़ अल्लाह से, मेरा महबूब अल्लाह है मुझे ये 'इश्क़ होना भी ख़ुदा की मेहरबानी है मेरे ईमान की लज़्ज़त ख़ुदा के नाम ही से है ख़ुदा का नाम लेना भी ख़ुदा की मेहरबानी है कलामुल्लाह को पढ़ता हूँ, ख़ुदा से बात करता हूँ ख़ुदा से जी लगाना भी ख़ुदा की मेहरबानी है ख़ुदा के ज़िक्र से दिल में लगे ज़ंग को मिटाता हूँ कि दिल से ज़ंग मिटाना भी ख़ुदा की मेहरबानी है ख़ुदा की याद में शाम-ओ-सहर मेरे गुज़रते हैं कि इन यादों में बसना भी ख़ुदा की मेहरबानी है मैं इक गुमनाम सा रुदरुद फ़क़त अश'आर लिखता हूँ मेरा अश'आर लिखना भी ख़ुदा की मेहरबानी है शायर: रुदरुद मुरादाबादी नशीद-ख़्वाँ: कलीम वारिस KHuda ka dil me.n bas jaana ye ik fazl-e-KHudawandi KHuda ka fazl paana bhi KHuda ki mehrbaani hai mujhe hai 'ishq allah se, mera mahboob allah hai mujhe ye 'ishq hona bhi KHuda ki mehrbaani hai mere imaan ki lazzat KHuda ke naam hi se hai KHuda ka naam lena bhi KHuda ki mehrbaani hai k...

सारे आलम में मोहब्बत की घटा छाई है / Sare Aalam Mein Mohabbat Ki Ghata Chhai Hai

सारे 'आलम में मोहब्बत की घटा छाई है आप आए तो ज़माने में बहार आई है रूह जब वादी-ए-पुरदर्द में घबराई है उम्मती-उम्मती आक़ा की सदा आई है बन के ख़ुश्बू जो मेरे दिल में उतर आई है वो तेरी याद है, अब रूह समझ पाई है आँख के तिल में है महफ़ूज़ जमाल-ए-ख़ज़रा जैसे जन्नत मेरी नज़रों में सिमट आई है ज़ात-ए-सरकार है नूरानी सहीफ़ों की दलील या'नी क़ुरआन से पहले ये किताब आई है हर जगह मेरे लिए सब ने बिछाईं आँखें हर जगह तेरी ही निस्बत मेरे काम आई है कोई मुश्किल हो, कोई ग़म हो, करो ज़िक्र-ए-हबीब ये दवा वो है जो हर दौर में काम आई है मरने वाले की खुली आँख खुली रहने दो वो नज़र जल्वा-ए-आक़ा की तमन्नाई है जब तबीयत ग़म-ए-तन्हाई से घबराई है हम तेरे साथ हैं, ये उन की सदा आई है सारी दुनिया की निगाहों से गिरा है बेदम तब कहीं जा के तेरे दिल में जगह पाई है शायर: बेदम शाह वारसी ना'त-ख़्वाँ: असद इक़बाल कलकत्तवी saare 'aalam me.n mohabbat ki ghaTa chhaai hai aap aae to zamaane me.n bahaar aai hai rooh jab waadi-e-purdard me.n ghabraai hai ummati-ummati aaqa ki sada aai hai ban ke...

ज़मीं से फ़लक तक यही इक सदा है | मेरे मुस्तफ़ा हैं / Zameen Se Falak Tak Yahi Ik Sada Hai | Mere Mustafa Hain

ज़मीं से फ़लक तक यही इक सदा है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं सर उन के शफ़ा'अत का सेहरा सजा है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं जो नबियों रसूलों के भी मुक़्तदा हैं जो मौला 'अली के भी मुश्किल-कुशा हैं उन्हीं से ज़माना ये रौशन हुआ है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं जो उँगली से कर देते हैं चाँद टुकड़े जो चाहें तो डूबा हुआ शम्स पलटे ये ए'जाज़ उन को ख़ुदा ने दिया है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं ज़मीं, 'अर्श, दरिया है सदक़ा नबी का समर, बाग़-ओ-सहरा है सदक़ा नबी का उन्हीं के ही सदक़े में सब कुछ बना है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं जिधर देखिए रौशनी रौशनी है शह-ए-अंबिया की विलादत हुई है ज़रा देखिए का'बा भी झूमता है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं जो 'आशिक़ है उन का वो डरता नहीं है और ईमान का सौदा करता नहीं है वो चढ़ कर के सूली पे भी बोलता है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं सहाबा शह-ए-दीं के रौशन सितारे और आल-ए-नबी डूबतों के सहारे वो हक़ पर है इन दोनों पर जो फ़िदा है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं बिलाल ! आप को किस-क़दर है सताया सुल...

दामन में लिए ख़ैर है आई शब-ए-मेराज / Daman Mein Liye Khair Hai Aai Shab-e-Meraj

दामन में लिए ख़ैर है आई शब-ए-मे'राज महरूम नहीं लौटेगा कोई शब-ए-मे'राज बंदों को ख़ुदा से है मिलाई शब-ए-मे'राज 'आसी के मुक़द्दर को जगाई शब-ए-मे'राज उम्मत के लिए प्यारा नमाज़ों का वो तोहफ़ा सरकार को है रब से दिलाई शब-ए-मे'राज हक़दार-ए-जहन्नम थे गुनाहों के सबब हम सरकार ने है लाज बचाई शब-ए-मे'राज हम ख़ाक के ज़र्रे हैं, ख़ुदा उन का ही जाने आक़ा की कहाँ तक है रसाई शब-ए-मे'राज आते हैं शह-ए-कौन-ओ-मकाँ सर को झुका लो हूरों ने सदा है ये लगाई शब-ए-मे'राज जब शाह चले फ़र्श से, पलकों को अपनी राहों में मलाइक ने बिछाई शब-ए-मे'राज जन्नत के फ़रिश्तों की जमा'अत है ज़मीं पर है नूर में ये दुनिया नहाई शब-ए-मे'राज पा लेता है हर चीज़ वो, ऐ शौक़-ए-फ़रीदी ! देता है ख़ुदा को जो दुहाई शब-ए-मे'राज शायर: हाफ़िज़ शौक़ फ़रीदी ना'त-ख़्वाँ: हाफ़िज़ अनस रज़ा अत्तारी daaman me.n liye KHair hai aai shab-e-me'raaj mahroom nahi.n lauTega koi shab-e-me'raaj bando.n ko KHuda se hai milaai shab-e-me'raaj 'aasi ke muqaddar ko jagaai shab-e-me...

जाते हैं बड़ी शान से मेराज के दूल्हा / Jaate Hain Badi Shaan Se Meraj Ke Dulha

मे'राज वाले दूल्हा ! मे'राज वाले दूल्हा ! मे'राज वाले दूल्हा ! मे'राज वाले दूल्हा ! असरा में गुज़रे जिस दम बेड़े पे क़ुदसियों के होने लगी सलामी, परचम झुका दिये हैं जाते हैं बड़ी शान से मे'राज के दूल्हा अल्लाह ने महबूब को है पास बुलाया जाते हैं बड़ी शान से मे'राज के दूल्हा पैग़ाम लिए आए हैं जिब्रील ज़मीं पर ऐ सरवर-ए-कौनैन ! चलें 'अर्श-ए-बरीं पर तालिब है ख़ुदा आज की शब आप का, सरवर ! दीदार-ए-ख़ुदा कर लें, शहा ! क़ुर्ब में जा कर अल्लाह ने महबूब को है पास बुलाया जाते हैं बड़ी शान से मे'राज के दूल्हा जिब्रील-ए-अमीं कहने लगे चूम के तलवे बुर्राक़ है तय्यार खड़ी आइए चलिए बेताब हैं 'अर्शी इन्हें दिखलाइए जल्वे सब हूर-ओ-मलक दीद के मुश्ताक़ हैं कब से अल्लाह ने महबूब को है पास बुलाया जाते हैं बड़ी शान से मे'राज के दूल्हा मुश्ताक़ थी अक़्सा में रसूलों की जमा'अत सरकार ने की सारे रसूलों की इमामत अक़्सा से चले क़ुर्ब-ए-ख़ुदा के लिए हज़रत सब शान-ए-नबी देखते करते रहे हैरत अल्लाह ने महबूब को है पास बुलाया जाते हैं बड़ी शान से मे'राज के दूल्हा मर्तबा मेरे ...

जश्न का मंज़र था माहौल सुहाना था | अर्श न क्यूँ सजता सरकार ने आना था / Jashn Ka Manzar Tha Mahaul Suhana Tha | Arsh Na Kyun Sajta Sarkar Ne Aana Tha

जश्न का मंज़र था, माहौल सुहाना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था फ़र्श पे नग़्मे थे आक़ा की रिसालत के 'अर्श पे चर्चे थे सरकार की 'अज़मत के हूरों के लब पर ख़ुशियों का तराना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था जश्न का मंज़र था, माहौल सुहाना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था रुत बदल जाए और रात सँवर जाए हुक्म ख़ुदा का हुआ कि वक़्त ठहर जाए रुक गया फ़ौरन जो गर्दिश में ज़माना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था जश्न का मंज़र था, माहौल सुहाना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था मस्जिद-ए-अक़्सा में क्या मंज़र थे प्यारे पीछे क़तारों में हाज़िर थे नबी सारे आगे मुसल्ले पर सुल्तान-ए-ज़माना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था जश्न का मंज़र था, माहौल सुहाना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था मंज़िल-ए-सिदरा पर जिब्रील ने 'अर्ज़ किया शाह-ए-दो-'आलम ! मैं आगे नहीं चल सकता ये ही हद मेरी, यही मेरा ठिकाना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था जश्न का मंज़र था, माहौल सुहाना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था एक वसीला है ...

बारिश-ए-रहमत-ए-किब्रिया है | मुस्तफ़ा रब से मिलने चले हैं / Barish-e-Rahmat-e-Kibriya Hai | Mustafa Rab Se Milne Chale Hain

सर-ए-ला-मकाँ से तलब हुई सू-ए-मुंतहा वो चले नबी कोई हद है उन के 'उरूज की सल्लू 'अलैहि व आलिही बारिश-ए-रहमत-ए-किब्रिया है मुस्तफ़ा ला-मकाँ जा रहे हैं आज सारा जहाँ सज गया है मुस्तफ़ा रब से मिलने चले हैं दस्त-बस्ता मलाइक खड़े हैं ना'त सरकार की पढ़ रहे हैं हूर-ओ-ग़िलमाँ के लब पर सदा है मुस्तफ़ा रब से मिलने चले हैं जश्न में ज़र्रा ज़र्रा मगन है हर तरफ़ बजते हैं शादियाने बहर-ए-ता'ज़ीम का'बा झुका है मुस्तफ़ा रब से मिलने चले हैं अंबिया-ओ-रुसुल मुक़्तदी हैं और इमामत पे मेरे नबी हैं 'अर्श पर मरहबा की सदा है मुस्तफ़ा रब से मिलने चले हैं पहुँचे सिदरा पे सरकार जिस दम बोले जिब्रील, ऐ शाह-ए-'आलम ! बस यहीं पर मेरी इंतिहा है मुस्तफ़ा रब से मिलने चले हैं है दुरूदों की दस्तार सर पर है सलामी फ़रिश्तों के लब पर पहुँचा महबूब क़ुर्ब-ए-ख़ुदा है मुस्तफ़ा रब से मिलने चले हैं ये क़सीदा, ऐ शौक़-ए-फ़रीदी ! तुम ने लिक्खा है जो फ़ज़्ल-ए-रब्बी सदक़ा वल्लाह मे'राज का है मुस्तफ़ा रब से मिलने चले हैं शायर: हाफ़िज़ शौक़ फ़रीदी ना'त-ख़्वाँ: ग़ुलाम मुस्तफ़ा क़ादरी s...

वो माह-ए-फ़रोज़ाँ वो नय्यर-ए-ताबाँ | मेरा मुस्तफ़ा है / Wo Mah-e-Farozan Wo Nayyar-e-Taaban | Mera Mustafa Hai

वो माह-ए-फ़रोज़ाँ वो नय्यर-ए-ताबाँ मेरा मुस्तफ़ा है, मेरा मुस्तफ़ा है वो बारह रबी'-उल-अव्वल को आया जो अव्वल बना है, मेरा मुस्तफ़ा है तो क्या तू ने देखा वो आना वो जाना कि हैरत में है अब तलक ये ज़माना वो रब का बुलाना, तो सब को दिखाना ये जो आ रहा है, मेरा मुस्तफ़ा है क़ुदसी खड़े हैं हैरान हो के कि सिदरा से आगे बशर जा रहा है जाता है देखो वो बे-ख़ौफ़ कैसे कि सब जानता है ये राहें वो जैसे वो यूँ जा रहा है, जैसे कि कोई घर वाला अपने ही घर जा रहा है वो क़िस्सा हलीमा के आँगन का देखो जवानी से पहले तुम बचपन का पूछो अभी मुस्तफ़ा ने उठाई है उँगली क़मर से तो पूछो किधर जा रहा है कहाँ तू, ऐ शाकिर ! कहाँ उन की ना'तें कहाँ अपनी ज़ातें, कहाँ उन की बातें ये क्यूँ कह रहे हो बशर जा रहा है हक़ीक़त में ख़ैर-उल-बशर जा रहा है ना'त-ख़्वाँ: क़ारी शाहीद महमूद क़ादरी wo maah-e-farozaa.n wo nayyar-e-taabaa.n mera mustafa hai, mera mustafa hai wo baarah rabi'-ul-awwal ko aaya jo awwal bana hai mera mustafa hai to kya tu ne dekha wo aana wo jaana ki hairat me.n hai ab talak ye...

मेराज की रतिया धूम ये थी इक राज दुलारा आवत है / Meraj Ki Ratiya Dhoom Ye Thi Ek Raj Dulara Aawat Hai

मे'राज की रतिया धूम ये थी, इक राज दुलारा आवत है लौलाक का सेहरा सर सोहत, वो अहमद प्यारा आवत है हूरों ने कहा जब बिस्मिल्लाह, ग़िलमाँ ने पुकारा इल्लल्लाह ख़ुद रब ने कहा माशा-अल्लाह महबूब हमारा आवत है जिब्रील-ए-अमीं ये कहते चले, ऐ 'अर्शियो ! तुमरे भाग जगे ता'ज़ीम को सब हो जाओ खड़े, सरदार तुम्हारा आवत है यासीं की चमक है दातन में, ताहा का करिश्मा आँखन में वल-फ़ज्र का जल्वा गालन में, वो 'अर्श का तारा आवत है मा-ज़ाग़ का कजला नैन भरे, वश्शम्स का बुटना मुख पे मले है मीम का घूँघट सेहरे तले, वो रब का सँवारा आवत है धरती से उठा आफ़ाक़ चढ़ा, मुमताज़ ! ये ग़ुल था चारों तरफ़ लो हक़ से मिलने सल्ले-'अला सरदार हमारा आवत है शायर: मुमताज़ गंगोही ना'त-ख़्वाँ: प्रोफ़ेसर अब्दुल रऊफ़ रूफ़ी हिबा मुज़म्मिल क़ादरी me'raaj ki ratiya dhoom ye thi ik raaj dulaara aawat hai laulaak ka sehra sar sohat wo ahmad pyaara aawat hai hooro.n ne kaha jab bismillah Gilmaa.n ne pukaara illallah KHud rab ne kaha maasha-allah mahboob hamaara aawat hai jibreel-e-amee.n ye kehte chale...

दे कर ख़ुदा को जान की क़ीमत ख़रीद ली / De Kar Khuda Ko Jaan Ki Qeemat Khareed Li

दे कर ख़ुदा को जान की क़ीमत ख़रीद ली हर 'आशिक़-ए-रसूल ने जन्नत ख़रीद ली आक़ा ने अपनी ज़िंदगी ग़ुर्बत में काट कर दुनिया के हर ग़रीब की ग़ुर्बत ख़रीद ली असग़र के उस तबस्सुम-ए-मा'सूम पर निसार जिस ने यज़ीदियों की हुकूमत ख़रीद ली जिस ने नबी की याद को दिल में बसा लिया समझो कि उस ने ख़ुल्द की राहत ख़रीद ली सौ बार उस दीवाना-ए-सरकार को सलाम जिस से ज़ुबैदा बीबी ने जन्नत ख़रीद ली मशहूर कर दिया मुझे आक़ा की ना'त ने मैं ने नबी की ना'त से शोहरत ख़रीद ली मे'राज-ए-मुस्तफ़ाई पे क़ुर्बान जाइए जिस ने ज़मीं के वास्ते 'अज़मत ख़रीद ली अल्लाह ने मुस्तफ़ा की रज़ा के लिए, असद ! बाज़ार-ए-मुस्तफ़ाई से उम्मत ख़रीद ली शायर: असद इक़बाल कलकत्तवी ना'त-ख़्वाँ: असद इक़बाल कलकत्तवी de kar KHuda ko jaan ki qeemat KHareed li har 'aashiq-e-rasool ne jannat KHareed li aaqa ne apni zindagi Gurbat me.n kaaT kar duniya ke har Gareeb ki Gurbat KHareed li asGar ke us tabassum-e-maa'soom par nisaar jis ne yazeediyo.n ki hukoomat KHareed li jis ne nabi ki yaad ko dil me.n basa liya sa...

रब तआला की इनायत हैं इमाम-ए-जाफ़र / Rab Tala Ki Inayat Hain Imam-e-Jafar

रब त'आला की 'इनायत हैं इमाम-ए-जा'फ़र फ़ातिमा ज़हरा की 'इत्रत हैं इमाम-ए-जा'फ़र अहल-ए-दिल बोल उठे ये देख के सीरत उन की मज़हर-ए-शान-ए-रिसालत हैं इमाम-ए-जा'फ़र उन के शागिर्दों में शामिल हैं इमाम-ए-आ'ज़म ऐसे बा-रिफ़'अत-ओ-'अज़मत हैं इमाम-ए-जा'फ़र सर-ब-ख़म वक़्त का सुल्तान भी है उन के हुज़ूर ऐसे सुल्तान-ए-विलायत हैं इमाम-ए-जा'फ़र मेरी मुश्किल को वो आसान करेंगे पल में दाफ़े'-ए-रंज-ओ-मुसीबत हैं इमाम-ए-जा'फ़र उन की चौखट पे न झुक जाएँ क्यूँ दिल 'उल्मा के 'इल्म की बाँटते दौलत हैं इमाम-ए-जा'फ़र ना'त-ख़्वाँ: ओवैस रज़ा क़ादरी rab ta'aala ki 'inaayat hai.n imaam-e-jaa'far faatima zahra ki 'itrat hai.n imaam-e-jaa'far ahl-e-dil bol uThe ye dekh ke seerat un ki maz.har-e-shaan-e-risaalat hai.n imaam-e-jaa'far un ke shaagirdo.n me.n shaamil hai.n imaam-e-aa'zam aise baa-rif'at-o-'azmat hai.n imaam-e-jaa'far sar-ba-KHam waqt ka sultaan bhi hai un ke huzoor aise sultaan-e-wilaaya...

मुसल्लम-उस-सुबूत है फ़ज़ीलत-ए-मुआविया / Musallam-us-Suboot Hai Fazeelat-e-Muawiya

मुसल्लम-उस-सुबूत है फ़ज़ीलत-ए-मु'आविया 'अयाँ है शम्स की तरह करामत-ए-मु'आविया वो जिस से रूठ जाएँ तो रसूल उस से रूठ जाएँ नबी से इस तरह की है क़राबत-ए-मु'आविया ख़ुदा के फ़ज़्ल से मिली उन्हें वो 'अज़मत-ए-गिराँ कोई न तौल पाएगा जलालत-ए-मु'आविया नसब में हैं तजल्लियाँ क़बीला-ए-रसूल की क़ुरैशियत से बढ़ गई शराफ़त-ए-मु'आविया हैं उन की ख़्वाहर-ए-'अज़ीज़ जुमला मोमिनों की माँ बड़ी शरफ़-मआब है नजाबत-ए-मु'आविया गुल-ए-हयात उन का है सहाबियत से 'इत्र-बेज़ इसी लिए है नौ-ब-नौ नज़ारत-ए-मु'आविया तमाम मोमिनों के आप प्यारे मामूँ-जान हैं हमें बहुत 'अज़ीज़ है ये निस्बत-ए-मु'आविया हसन के दस्त-ए-पाक से बने ख़लीफ़ा-ए-रसूल रिज़ा-ए-आल-ए-मुस्तफ़ा ख़िलाफ़त-ए-मु'आविया मु'आविया के प्यार से हमारा बेड़ा पार है गुनाह बख़्शवाएगी शफ़ा'अत-ए-मु'आविया उन्हें कोई बुरा कहे तो उस के मुँह में ख़ाक-ओ-आग न सुन सकेंगे हम कभी इहानत-ए-मु'आविया जो 'आशिक़-ए-रसूल हैं वो उन से प्यार करते हैं फ़क़त मुनाफ़िक़ों को है 'अदावत-ए-मु'आविया यज़ीद के फ़रेब का मु'आविया से क्या ह...

मेरा हर ग़म मिटाने को मेरा अल्लाह काफ़ी है / Mera Har Gham Mitane Ko Mera Allah Kafi Hai

मेरा हर ग़म मिटाने को मेरा अल्लाह काफ़ी है मेरी बिगड़ी बनाने को मेरा अल्लाह काफ़ी है लहू मेरे जिगर का है उसी के फ़ज़्ल से जारी उसी की मेहरबानी से है साँसों की रवादारी मेरा जीवन बचाने को मेरा अल्लाह काफ़ी है मेरा हर ग़म मिटाने को मेरा अल्लाह काफ़ी है वही सब्ज़ा उगाता है, वही गुलशन सजाता है अनाजों का शजर उस के करम से लहलहाता है मुझे खाना खिलाने को मेरा अल्लाह काफ़ी है मेरा हर ग़म मिटाने को मेरा अल्लाह काफ़ी है समुंदर के लबों में और बल खाती घटाओं में वही तो बाँटता है रोज़ ताज़ा दम हवाओं में नया मौसम बनाने को मेरा अल्लाह काफ़ी है मेरा हर ग़म मिटाने को मेरा अल्लाह काफ़ी है हवाओं को चलाता है, वही बरसात लाता है वही गेहूँ के पौधों में नई बाली उगाता है मेरी खेती लगाने को मेरा अल्लाह काफ़ी है मेरा हर ग़म मिटाने को मेरा अल्लाह काफ़ी है वही दरिया में मूसा के लिए रस्ता बनाता है वही यूनुस को मछली के शिकम में भी बचाता है हर एक मंज़र दिखाने को मेरा अल्लाह काफ़ी है मेरा हर ग़म मिटाने को मेरा अल्लाह काफ़ी है चमकता है फ़लक पर चाँद, सूरज जगमगाता है फ़लक के नीले पर्दों पर भी तारा टिमटिमाता है रुख़-ए-'आलम ...

इमामों में इक इमाम-ए-बरतर इमाम-ए-जाफ़र इमाम-ए-जाफ़र / Imamon Mein Ek Imam-e-Bartar Imam-e-Jafar Imam-e-Jafar

इमामों में इक इमाम-ए-बरतर इमाम-ए-जा'फ़र इमाम जा'फ़र 'अली के गुलशन के हैं गुल-ए-तर इमाम-ए-जा'फ़र इमाम-ए-जा'फ़र वो लख़्त-ए-जिगर-ए-बतूल भी हैं, वो बाग़-ए-ज़हरा के फूल भी हैं शुजा'अतों के 'अज़ीम पैकर इमाम-ए-जा'फ़र इमाम-ए-जा'फ़र इमाम-ए-आ'ज़म अबू-हनीफ़ा तुम्हारी सोहबत से बहरा-वर थे वो करते थे इस का ज़िक्र अक्सर, इमाम-ए-जा'फ़र ! इमाम-ए-जा'फ़र ! तुम्हारी 'इज़्ज़त, तुम्हारी शोहरत, तुम्हारी 'अज़मत, तुम्हारी रिफ़'अत नियाज़ तेरी हो क्यूँ न घर-घर, इमाम-ए-जा'फ़र ! इमाम-ए-जा'फ़र ! वसी पे नज़र-ए-करम ख़ुदा-रा, नसब की निस्बत की लाज रख ले हर एक मंज़िल के तुम हो रहबर, इमाम-ए-जा'फ़र ! इमाम-ए-जा'फ़र ! शायर: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी imaamo.n me.n ik imaam-e-bartar imaam-e-jaa'far imaam-e-jaa'far 'ali ke gulshan ke hai.n gul-e-tar imaam-e-jaa'far imaam-e-jaa'far wo laKHt-e-jigar-e-batool bhi hai.n wo baaG-e-zahra ke phool bhi hai.n shujaa'ato.n ke '...