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अल्लाहु जल्ल जलालुहू | तेरी शान अम्म नवालुहू / Allahu Jalla Jalaluhu | Teri Shan Amma Nawaluhu

अल्लाहु जल्ल जलालुहू अल्लाहु जल्ल जलालुहू तेरी शान 'अम्म नवालुहू अल्लाहु जल्ल जलालुहू अल्लाहु जल्ल जलालुहू है मेरी ज़बान पे ज़िक्र-ए-हू अल्लाहु जल्ल जलालुहू अल्लाहु जल्ल जलालुहू तेरे नाम पर, ऐ मेरे ख़ुदा ! मेरा दिल फ़िदा, मेरी जाँ फ़िदा मेरी रूह की है यही ग़िज़ा तेरा नाम लब पे रहे सदा हो तेरी रिज़ा मेरी आरज़ू अल्लाहु जल्ल जलालुहू अल्लाहु जल्ल जलालुहू तेरी शान 'अम्म नवालुहू अल्लाहु जल्ल जलालुहू अल्लाहु जल्ल जलालुहू तुझे बे-नियाज़ी का वास्ता हो क़बूल ये मेरी इल्तिजा कि बराए अहमद-ए-मुज्तबा हो मु'आफ़ मेरी हर इक ख़ता सर-ए-हश्र रख मेरी आबरू अल्लाहु जल्ल जलालुहू अल्लाहु जल्ल जलालुहू तेरी शान 'अम्म नवालुहू अल्लाहु जल्ल जलालुहू अल्लाहु जल्ल जलालुहू न हिसाब रोज़-ए-हिसाब हो मेरे दाएँ हाथ किताब हो मेरे लब पे ना'त-ए-जनाब हो न सवाल हो न जवाब हो मैं रहूँ हुज़ूर के रू-ब-रू अल्लाहु जल्ल जलालुहू अल्लाहु जल्ल जलालुहू तेरी शान 'अम्म नवालुहू अल्लाहु जल्ल जलालुहू अल्लाहु जल्ल जलालुहू मैं गुनाहगार हूँ, ऐ ख़ुदा ! कोई नेक काम न कर सका कि न हो सका तेरा हक़ अदा ते...

नबी के इश्क़ में ढल कर नबी की नात पढ़ते हैं / Nabi Ke Ishq Mein Dhal Kar Nabi Ki Naat Padhte Hain

नबी के 'इश्क़ में ढल कर नबी की ना'त पढ़ते हैं जो 'आशिक़ हैं वही अक्सर नबी की ना'त पढ़ते हैं नज़र अपनी जमा कर गुंबद-ए-ख़ज़रा की रंगत पर मदीन-ए-पाक के मंज़र नबी की ना'त पढ़ते हैं ज़रा अंदाज़ तो देखे कोई ज़हरा के बेटे का कटा के रन में अपना सर नबी की ना'त पढ़ते हैं है आग़ोश-ए-पिदर, मुस्कान लब पर, तीर ज़ालिम का अजब माहौल में असग़र नबी की ना'त पढ़ते हैं इमाम अहमद रज़ा का 'इश्क़ भी कितना निराला है उठा कर बहर से लंगर नबी की ना'त पढ़ते हैं ठिकाने उन के दुश्मन को लगाते हैं रज़ा वाले बदल के अपना जब तेवर नबी की ना'त पढ़ते हैं कमाल इस में असद का कुछ नहीं, है ना'त की बरकत जो बरसों से सर-ए-मिम्बर नबी की ना'त पढ़ते हैं शायर: असद इक़बाल कलकत्तवी ना'त-ख़्वाँ: असद इक़बाल कलकत्तवी nabi ke 'ishq me.n Dhal kar nabi ki naa't pa.Dhte hai.n jo 'aashiq hai.n wahi aksar nabi ki naa't pa.Dhte hai.n nazar apni jama kar gumbad-e-KHazra ki rangat par madin-e-paak ke manzar nabi ki naa't pa.Dhte hai.n zara andaaz to dekhe koi zahr...

सारे नबियों के ओहदे बड़े हैं लेकिन आक़ा का मनसब जुदा है / Sare Nabiyon Ke Ohde Bade Hain Lekin Aaqa Ka Mansab Juda Hai

सारे नबियों के 'ओहदे बड़े हैं, लेकिन आक़ा का मनसब जुदा है वो इमाम-ए-सफ़-ए-अंबिया हैं, उन का रुत्बा बड़ों से बड़ा है कोई लफ़्ज़ों में कैसे बता दे, उन के रुत्बे की हद है तो क्या है हम ने अपने बड़ों से सुना है, सिर्फ़ अल्लाह उन से बड़ा है नाम जन्नत का तुम ने सुना है, मैं ने उस का नज़ारा किया है मैं यहाँ से तुम्हें क्या बता दूँ, उन की नगरी की गलियों में क्या है कितना प्यारा है मौसम वहाँ का, कितनी पुर-कैफ़ सारी फ़ज़ा है तुम मेरे साथ ख़ुद चल के देखो, गर्द-ए-तयबा भी ख़ाक-ए-शिफ़ा है वो जो इक शहर-ए-नूर-उल-हुदा है, जल्वा-गाहों का इक सिलसिला है जिस की हर सुब्ह शम्सुद्दुहा है, जिस की हर शाम बदरुददुजा है मुस्तक़िल उन की चौखट 'अता हो, मेरे मा'बूद ! ये इल्तिजा है कोई पूछे तो ये कह सकूँ मैं, बाब-ए-जिब्रील मेरा पता है शायर: प्रोफ़ेसर सय्यिद इक़बाल अज़ीम ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद हस्सानुल्लाह हुसैनी सक़लैन रशीद saare nabiyo.n ke 'ohde ba.De hai.n lekin aaqa ka mansab juda hai wo imaam-e-saf-e-ambiya hai.n un ka rutba ba.Do.n se ba.Da hai koi lafzo.n me.n kaise bata de un ke ...

अपने आँसू बहाऊँगा मैं | अपने रब को मनाऊँगा मैं / Apne Aansu Bahaunga Main | Apne Rab Ko Manaunga Main

अपने आँसू बहाऊँगा मैं अपने रब को मनाऊँगा मैं बोझ दिल पे गुनाहों का है कैसे उस को उठाऊँगा मैं दाग़ जिस पर लगे मा'सियत के अब वो दामन बचाऊँगा मैं अपने आँसू बहाऊँगा मैं अपने रब को मनाऊँगा मैं नफ़्स की ख़्वाहिशों को खुरच कर दिल के दर से मिटाऊँगा मैं दास्ताँ अपने ग़म और अलम की अपने रब को सुनाऊँगा मैं अपने आँसू बहाऊँगा मैं अपने रब को मनाऊँगा मैं दीप उम्मीद का और यक़ीं का अपने दिल में जलाऊँगा मैं ज़िक्र-ए-रब्बी जो रूह की ग़िज़ा है अपनी रूह को खिलाऊँगा मैं अपने आँसू बहाऊँगा मैं अपने रब को मनाऊँगा मैं याद-ए-आक़ा के फूलों से अब दिल का गुलशन सजाऊँगा मैं हुक्म-ए-रब और हुक्म-ए-नबी को हिर्ज़-ए-जाँ अब बनाऊँगा मैं अपने आँसू बहाऊँगा मैं अपने रब को मनाऊँगा मैं माल-ओ-ज़र हो या हो जाँ वो मेरी रब की ख़ातिर लुटाऊँगा मैं ख़ून-ए-दिल का हर एक एक क़तरा रब की राह में बहाऊँगा मैं अपने आँसू बहाऊँगा मैं अपने रब को मनाऊँगा मैं ले के सीने में इक नेक दिल को सू-ए-'उक़्बा यूँ जाऊँगा मैं रब के फ़ज़्ल-ओ-करम से, हिजाज़ी ! चैन दिल का यूँ पाऊँगा मैं अपने आँसू बहाऊँगा मैं अपने रब को मनाऊँगा मैं श...

जुदाई का कोई बीता हुआ लम्हा रुलाता है | तो काबा याद आता है बड़ा ही याद आता है / Judai Ka Koi Beeta Hua Lamha Rulata Hai | To Kaba Yaad Aata Hai Bada Hi Yaad Aata Hai

गर तू न सुनेगा तो मेरी कौन सुनेगा गर तू न करेगा तो करम कौन करेगा जुदाई का कोई बीता हुआ लम्हा रुलाता है कोई आँसू मेरी भीगी हुई पलकें सजाता है तो का'बा याद आता है, बड़ा ही याद आता है तो का'बा याद आता है, बड़ा ही याद आता है बड़े ही ख़ास थे लम्हे जो का'बे में गुज़ार आए बड़ी उम्मीद है दिल में वो लम्हे बार बार आए यहाँ कोई दिवाना जो मुझे ज़मज़म पिलाता है तो का'बा याद आता है, बड़ा ही याद आता है ग़िलाफ़-ए-ख़ाना-ए-का'बा पकड़ कर अपने हाथों में कभी दिन के उजालों में, कभी पुर-नूर रातों में वहाँ की दास्ताँ कोई हमें आ कर सुनाता है तो का'बा याद आता है, बड़ा ही याद आता है मचलते हैं कई अरमान उस पल मेरे इस दिल में तड़प के उम्मती कोई मेरे आक़ा की महफ़िल में दु'आ के वास्ते रो कर जो हाथों को उठाता है तो का'बा याद आता है, बड़ा ही याद आता है वहाँ रहमत बरसती है, यहाँ आँखें बरसती हैं बरसती ये मेरी आँखें ज़ियारत को तरसती हैं जुनैद-ए-क़ासमी कोई जो सीने से लगाता है तो का'बा याद आता है, बड़ा ही याद आता है शायर: जुनैद क़ासमी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद हस्सानुल्लाह हुसैनी ...

हर ज़र्रा मेरे देश का अनमोल रतन है / Har Zarra Mere Desh Ka Anmol Ratan Hai

हर ज़र्रा मेरे देश का अनमोल रतन है ये अपना वतन प्यार-ओ-मोहब्बत का वतन है ऐ ख़ाक-ए-वतन ! हम तुझे रुस्वा न करेंगे हम तेरे लिए जान की पर्वा न करेंगे मर जाएँगे लेकिन तेरा सौदा न करेंगे है जान हथेली पे लिए सर पे कफ़न है हर ज़र्रा मेरे देश का अनमोल रतन है ये अपना वतन प्यार-ओ-मोहब्बत का वतन है जीते हैं सभी एक अलग शान से मिल कर रहते हैं यहाँ हिन्दू मुसलमान से मिल कर ख़ुश होते हैं इंसाँ यहाँ इंसान से मिल कर तहज़ीब के फूलों से मुज़य्यन ये चमन है हर ज़र्रा मेरे देश का अनमोल रतन है ये अपना वतन प्यार-ओ-मोहब्बत का वतन है ता-हद्द-ए-नज़र फैली हुई सब्ज़ रिदाएँ पर्बत से ये गिरते हुए झरनों की सदाएँ भाती है हमें हिन्द की पुर-कैफ़ फ़ज़ाएँ कलियों के लबों पर भी तबस्सुम की किरन है हर ज़र्रा मेरे देश का अनमोल रतन है ये अपना वतन प्यार-ओ-मोहब्बत का वतन है नशीद-ख़्वाँ: अश्फ़ाक़ बहराइची har zarra mere desh ka anmol ratan hai ye apna watan pyaar-o-mohabbat ka watan hai ai KHaak-e-watan ! ham tujhe ruswa na karenge ham tere liye jaan ki parwa na karenge mar jaaenge lekin tera sauda na karenge...

फिर तवज्जोह बढ़ा मेरे मुर्शिद पिया / Phir Tawajjoh Badha Mere Murshid Piya

फिर तवज्जोह बढ़ा, मेरे मुर्शिद पिया ! नज़रें दिल पे जमा, मेरे मुर्शिद पिया ! इक 'अजब था मज़ा, जब ये मँगता तेरा तेरे क़दमों में था, मेरे मुर्शिद पिया ! नफ़्स हावी हुआ, हाल मेरा बुरा तुझ से कब है छुपा, मेरे मुर्शिद पिया ! अब ले जल्दी ख़बर, तेरी जानिब नज़र मैं ने ली है लगा, मेरे मुर्शिद पिया ! सख़्त दिल हो चला, अब क्या होगा मेरा दे दे दिल को जिला, मेरे मुर्शिद पिया ! तेरी बस इक नज़र दिल पे हो जाए गर पाएगा दिल शिफ़ा, मेरे मुर्शिद पिया ! बस तेरी याद हो, दिल मेरा शाद हो मुझ को मय वो पिला, मेरे मुर्शिद पिया ! ऐसा ग़म दे मुझे, होश ही न रहे मस्त अपना बना, मेरे मुर्शिद पिया ! मुझ गुनहगार को, इस रिया-कार को तू ही मुख़्लिस बना, मेरे मुर्शिद पिया ! मुझ से बदकार से, इस गुनहगार से रहना राज़ी सदा, मेरे मुर्शिद पिया ! ना'त-ख़्वाँ: असद रज़ा अत्तारी phir tawajjoh ba.Dha, mere murshid piya ! nazre.n dil pe jama, mere murshid piya ! ik 'ajab tha maza, jab ye mangta tera tere qadmo.n me.n tha, mere murshid piya ! nafs haawi huaa, haal mera bura tujh se kab hai chhu...

ख़ुदा का दिल में बस जाना ये इक फ़ज़्ल-ए-ख़ुदावंदी / Khuda Ka Dil Mein Bas Jana Ye Ik Fazl-e-Khudawandi

ख़ुदा का दिल में बस जाना ये इक फ़ज़्ल-ए-ख़ुदावंदी ख़ुदा का फ़ज़्ल पाना भी ख़ुदा की मेहरबानी है मुझे है 'इश्क़ अल्लाह से, मेरा महबूब अल्लाह है मुझे ये 'इश्क़ होना भी ख़ुदा की मेहरबानी है मेरे ईमान की लज़्ज़त ख़ुदा के नाम ही से है ख़ुदा का नाम लेना भी ख़ुदा की मेहरबानी है कलामुल्लाह को पढ़ता हूँ, ख़ुदा से बात करता हूँ ख़ुदा से जी लगाना भी ख़ुदा की मेहरबानी है ख़ुदा के ज़िक्र से दिल में लगे ज़ंग को मिटाता हूँ कि दिल से ज़ंग मिटाना भी ख़ुदा की मेहरबानी है ख़ुदा की याद में शाम-ओ-सहर मेरे गुज़रते हैं कि इन यादों में बसना भी ख़ुदा की मेहरबानी है मैं इक गुमनाम सा रुदरुद फ़क़त अश'आर लिखता हूँ मेरा अश'आर लिखना भी ख़ुदा की मेहरबानी है शायर: रुदरुद मुरादाबादी नशीद-ख़्वाँ: कलीम वारिस KHuda ka dil me.n bas jaana ye ik fazl-e-KHudawandi KHuda ka fazl paana bhi KHuda ki mehrbaani hai mujhe hai 'ishq allah se, mera mahboob allah hai mujhe ye 'ishq hona bhi KHuda ki mehrbaani hai mere imaan ki lazzat KHuda ke naam hi se hai KHuda ka naam lena bhi KHuda ki mehrbaani hai k...

सारे आलम में मोहब्बत की घटा छाई है / Sare Aalam Mein Mohabbat Ki Ghata Chhai Hai

सारे 'आलम में मोहब्बत की घटा छाई है आप आए तो ज़माने में बहार आई है रूह जब वादी-ए-पुरदर्द में घबराई है उम्मती-उम्मती आक़ा की सदा आई है बन के ख़ुश्बू जो मेरे दिल में उतर आई है वो तेरी याद है, अब रूह समझ पाई है आँख के तिल में है महफ़ूज़ जमाल-ए-ख़ज़रा जैसे जन्नत मेरी नज़रों में सिमट आई है ज़ात-ए-सरकार है नूरानी सहीफ़ों की दलील या'नी क़ुरआन से पहले ये किताब आई है हर जगह मेरे लिए सब ने बिछाईं आँखें हर जगह तेरी ही निस्बत मेरे काम आई है कोई मुश्किल हो, कोई ग़म हो, करो ज़िक्र-ए-हबीब ये दवा वो है जो हर दौर में काम आई है मरने वाले की खुली आँख खुली रहने दो वो नज़र जल्वा-ए-आक़ा की तमन्नाई है जब तबीयत ग़म-ए-तन्हाई से घबराई है हम तेरे साथ हैं, ये उन की सदा आई है सारी दुनिया की निगाहों से गिरा है बेदम तब कहीं जा के तेरे दिल में जगह पाई है शायर: बेदम शाह वारसी ना'त-ख़्वाँ: असद इक़बाल कलकत्तवी saare 'aalam me.n mohabbat ki ghaTa chhaai hai aap aae to zamaane me.n bahaar aai hai rooh jab waadi-e-purdard me.n ghabraai hai ummati-ummati aaqa ki sada aai hai ban ke...

ज़मीं से फ़लक तक यही इक सदा है | मेरे मुस्तफ़ा हैं / Zameen Se Falak Tak Yahi Ik Sada Hai | Mere Mustafa Hain

ज़मीं से फ़लक तक यही इक सदा है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं सर उन के शफ़ा'अत का सेहरा सजा है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं जो नबियों रसूलों के भी मुक़्तदा हैं जो मौला 'अली के भी मुश्किल-कुशा हैं उन्हीं से ज़माना ये रौशन हुआ है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं जो उँगली से कर देते हैं चाँद टुकड़े जो चाहें तो डूबा हुआ शम्स पलटे ये ए'जाज़ उन को ख़ुदा ने दिया है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं ज़मीं, 'अर्श, दरिया है सदक़ा नबी का समर, बाग़-ओ-सहरा है सदक़ा नबी का उन्हीं के ही सदक़े में सब कुछ बना है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं जिधर देखिए रौशनी रौशनी है शह-ए-अंबिया की विलादत हुई है ज़रा देखिए का'बा भी झूमता है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं जो 'आशिक़ है उन का वो डरता नहीं है और ईमान का सौदा करता नहीं है वो चढ़ कर के सूली पे भी बोलता है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं सहाबा शह-ए-दीं के रौशन सितारे और आल-ए-नबी डूबतों के सहारे वो हक़ पर है इन दोनों पर जो फ़िदा है मेरे मुस्तफ़ा हैं, मेरे मुस्तफ़ा हैं बिलाल ! आप को किस-क़दर है सताया सुल...

दामन में लिए ख़ैर है आई शब-ए-मेराज / Daman Mein Liye Khair Hai Aai Shab-e-Meraj

दामन में लिए ख़ैर है आई शब-ए-मे'राज महरूम नहीं लौटेगा कोई शब-ए-मे'राज बंदों को ख़ुदा से है मिलाई शब-ए-मे'राज 'आसी के मुक़द्दर को जगाई शब-ए-मे'राज उम्मत के लिए प्यारा नमाज़ों का वो तोहफ़ा सरकार को है रब से दिलाई शब-ए-मे'राज हक़दार-ए-जहन्नम थे गुनाहों के सबब हम सरकार ने है लाज बचाई शब-ए-मे'राज हम ख़ाक के ज़र्रे हैं, ख़ुदा उन का ही जाने आक़ा की कहाँ तक है रसाई शब-ए-मे'राज आते हैं शह-ए-कौन-ओ-मकाँ सर को झुका लो हूरों ने सदा है ये लगाई शब-ए-मे'राज जब शाह चले फ़र्श से, पलकों को अपनी राहों में मलाइक ने बिछाई शब-ए-मे'राज जन्नत के फ़रिश्तों की जमा'अत है ज़मीं पर है नूर में ये दुनिया नहाई शब-ए-मे'राज पा लेता है हर चीज़ वो, ऐ शौक़-ए-फ़रीदी ! देता है ख़ुदा को जो दुहाई शब-ए-मे'राज शायर: हाफ़िज़ शौक़ फ़रीदी ना'त-ख़्वाँ: हाफ़िज़ अनस रज़ा अत्तारी daaman me.n liye KHair hai aai shab-e-me'raaj mahroom nahi.n lauTega koi shab-e-me'raaj bando.n ko KHuda se hai milaai shab-e-me'raaj 'aasi ke muqaddar ko jagaai shab-e-me...

जाते हैं बड़ी शान से मेराज के दूल्हा / Jaate Hain Badi Shaan Se Meraj Ke Dulha

मे'राज वाले दूल्हा ! मे'राज वाले दूल्हा ! मे'राज वाले दूल्हा ! मे'राज वाले दूल्हा ! असरा में गुज़रे जिस दम बेड़े पे क़ुदसियों के होने लगी सलामी, परचम झुका दिये हैं जाते हैं बड़ी शान से मे'राज के दूल्हा अल्लाह ने महबूब को है पास बुलाया जाते हैं बड़ी शान से मे'राज के दूल्हा पैग़ाम लिए आए हैं जिब्रील ज़मीं पर ऐ सरवर-ए-कौनैन ! चलें 'अर्श-ए-बरीं पर तालिब है ख़ुदा आज की शब आप का, सरवर ! दीदार-ए-ख़ुदा कर लें, शहा ! क़ुर्ब में जा कर अल्लाह ने महबूब को है पास बुलाया जाते हैं बड़ी शान से मे'राज के दूल्हा जिब्रील-ए-अमीं कहने लगे चूम के तलवे बुर्राक़ है तय्यार खड़ी आइए चलिए बेताब हैं 'अर्शी इन्हें दिखलाइए जल्वे सब हूर-ओ-मलक दीद के मुश्ताक़ हैं कब से अल्लाह ने महबूब को है पास बुलाया जाते हैं बड़ी शान से मे'राज के दूल्हा मुश्ताक़ थी अक़्सा में रसूलों की जमा'अत सरकार ने की सारे रसूलों की इमामत अक़्सा से चले क़ुर्ब-ए-ख़ुदा के लिए हज़रत सब शान-ए-नबी देखते करते रहे हैरत अल्लाह ने महबूब को है पास बुलाया जाते हैं बड़ी शान से मे'राज के दूल्हा मर्तबा मेरे ...

जश्न का मंज़र था माहौल सुहाना था | अर्श न क्यूँ सजता सरकार ने आना था / Jashn Ka Manzar Tha Mahaul Suhana Tha | Arsh Na Kyun Sajta Sarkar Ne Aana Tha

जश्न का मंज़र था, माहौल सुहाना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था फ़र्श पे नग़्मे थे आक़ा की रिसालत के 'अर्श पे चर्चे थे सरकार की 'अज़मत के हूरों के लब पर ख़ुशियों का तराना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था जश्न का मंज़र था, माहौल सुहाना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था रुत बदल जाए और रात सँवर जाए हुक्म ख़ुदा का हुआ कि वक़्त ठहर जाए रुक गया फ़ौरन जो गर्दिश में ज़माना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था जश्न का मंज़र था, माहौल सुहाना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था मस्जिद-ए-अक़्सा में क्या मंज़र थे प्यारे पीछे क़तारों में हाज़िर थे नबी सारे आगे मुसल्ले पर सुल्तान-ए-ज़माना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था जश्न का मंज़र था, माहौल सुहाना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था मंज़िल-ए-सिदरा पर जिब्रील ने 'अर्ज़ किया शाह-ए-दो-'आलम ! मैं आगे नहीं चल सकता ये ही हद मेरी, यही मेरा ठिकाना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था जश्न का मंज़र था, माहौल सुहाना था 'अर्श न क्यूँ सजता, सरकार ने आना था एक वसीला है ...