मैं निसार क्यूँ न रज़ा पे हूँ मुझे जिस ने रब से मिला दिया / Main Nisar Kyun Na Raza Pe Hun Mujhe Jis Ne Rab Se Mila Diya
मैं निसार क्यूँ न रज़ा पे हूँ, मुझे जिस ने रब से मिला दिया उसी रब का हम्द-सरा हूँ मैं, कि श'ऊर-ए-फ़िक्र-ए-रज़ा दिया मैं निसार क्यूँ न रज़ा पे हूँ, मुझे जिस ने रब से मिला दिया मैं रज़ा रज़ा ही कहा करूँ, मुझे 'इश्क़-ए-शाह-ए-दना दिया मुझे भीक लेने के वासिते दर-ए-मुस्तफ़ा का पता दिया मैं निसार क्यूँ न रज़ा पे हूँ, मुझे जिस ने रब से मिला दिया तेरे दर से शान सहाबा की मेरे ज़ेहन-ओ-दिल पर अयाँ हुई मुझे अहल-ए-बैत का मर्तबा तेरी फ़िक्र ने ही बता दिया मैं निसार क्यूँ न रज़ा पे हूँ, मुझे जिस ने रब से मिला दिया न जमाल-ए-हक़ का श'ऊर था, न था फ़हम-ए-बातिल-ओ-बातिलाँ मुझे हक़ से तू ने मिला दिया, मुझे राह-ए-हक़ पे चला दिया मैं निसार क्यूँ न रज़ा पे हूँ, मुझे जिस ने रब से मिला दिया तेरे नाम पर मैं फ़िदा हुआ, मेरे लब पे नाम तेरा रहा तेरे नाम ने, तेरे 'इश्क़ ने मुझे नेक-नाम बना दिया मैं निसार क्यूँ न रज़ा पे हूँ, मुझे जिस ने रब से मिला दिया न था कुछ श'ऊर-ए-सुख़न-वरी, न था कुछ सलीक़ा-ए-ना'त भी तेरी ना'त-गोई ने, ऐ रज़ा ! मुझे ना'त पढ़ना सिखा दिया मैं निसार क्यूँ न रज़ा पे हूँ, मुझे ज...