जाह-ओ-जलाल दो न ही माल-ओ-मनाल दो / Jaah-o-Jalal Do Na Hi Maal-o-Manal Do
जाह-ओ-जलाल दो न ही माल-ओ-मनाल दो सोज़-ए-बिलाल बस मेरी झोली में डाल दो दुनिया के सारे ग़म मेरे दिल से निकाल दो ग़म अपना, या हबीब ! बरा-ए-बिलाल दो हिज्र-ओ-फ़िराक़ तो मिला, दो इज़्तिराब भी बेताब क़ल्ब अज़ प-ए-सोज़-ए-बिलाल दो बहती रहे जो हर घड़ी बस याद में, शहा ! वो चश्म-ए-अश्कबार प-ए-ज़ुल-जलाल दो सीना मदीना हो मेरा, दिल भी मदीना हो फ़िक्र-ए-मदीना दो मुझे मदनी ख़याल दो हर आन बस तसव्वुर-ए-तयबा में गुम रहूँ ऐसा बुलंद, शाह-ए-मदीना ! ख़याल दो दो दर्द सुन्नतों का प-ए-शाह-ए-कर्बला उम्मत के दिल से लज़्ज़त-ए-'इस्याँ निकाल दो ख़ुल्क़-ए-'अज़ीम से मुझे हिस्सा 'अता करो बे-जा हंसी की ख़स्लत-ए-बद को निकाल दो ज़िक्र-ओ-दुरूद हर घड़ी विर्द-ए-ज़बाँ रहे मेरी फ़ुज़ूल-गोई की 'आदत निकाल दो दोनों जहाँ की आफ़तें, मौला ! मुसीबतें सदक़े में मेरे ग़ौस के, सरकार ! टाल दो 'अत्तार को बुला के मदीने में दो बक़ी'अ दो फूलों के तुफ़ैल हों पूरे सुवाल दो शायर: मुहम्मद इल्यास अत्तार क़ादरी ना'त-ख़्वाँ: ओवैस रज़ा क़ादरी हाजी मुश्ताक़ अत्तारी jaah-o-jalaal do na hi maal-o-manaal do soz-e-bilaal bas ...