हूँ ख़ाक मगर आलम-ए-अनवार से निस्बत है / Hun Khak Magar Aalam-e-Anwaar Se Nisbat Hai
हूँ ख़ाक मगर 'आलम-ए-अनवार से निस्बत है मैं कुछ भी नहीं लेकिन सरकार से निस्बत है दुनिया की शहंशाही रखता हूँ मैं ठोकर पर कौनैन के उस मालिक-ओ-मुख़्तार से निस्बत है मैं ख़ाक का पुतला हूँ, वो 'अर्श के राही हैं इस पार का बासी हूँ, उस पार से निस्बत है हैं रोज़-ए-अज़ल से मेरी गुट्टी में वफ़ाएँ नाज़ा हूँ कि 'अब्बास 'अलम-दार से निस्बत है सर झुक नहीं सकते सर-ए-महशर भी हमारे सर इस लिए ऊँचे हैं, सरदार से निस्बत है हम मानने वाले हैं हुसैन इब्न-ए-'अली के वक़्त आए अगर दीं पे तो फिर दार से निस्बत है सरकार के दामन से, अल्ताफ़ ! हूँ वाबस्ता ग़म पास भी क्यूँ आएँ कि ग़म-ख़्वार से निस्बत है शायर: सय्यिद अल्ताफ़ शाह काज़मी ना'त-ख़्वाँ: उमेर मुनीर क़ादरी तल्हा क़ादरी hu.n KHaak magar 'aalam-e-anwaar se nisbat hai mai.n kuchh bhi nahi.n lekin sarkaar se nisbat hai duniya ki shahenshaahi rakhta hu.n mai.n Thokar par kaunain ke us maalik-o-muKHtaar se nisbat hai mai.n KHaak ka putla hu.n, wo 'arsh ke raahi hai.n is paar ka baasi hu.n, us paar se nisbat h...