ग़म हो गए बे-शुमार, आक़ा ! / Gham Ho Gae Be-Shumaar, Aaqa !

ग़म हो गए बे-शुमार, आक़ा !
बंदा तेरे निसार, आक़ा !

बिगड़ा जाता है खेल मेरा
आक़ा ! आक़ा ! संवार, आक़ा !

मंजधार पे आ के नाव टूटी
दे हाथ कि हूं मैं पार, आक़ा !

टूटी जाती है पीठ मेरी
लिल्लाह ! ये बोझ उतार, आक़ा !

हल्का है अगर हमारा पल्ला
भारी है तेरा वक़ार, आक़ा !

मजबूर हैं हम तो फ़िक्र क्या है
तुम को तो है इख़्तियार, आक़ा !

मैं दूर हूं, तुम तो हो मेरे पास
सुन लो मेरी पुकार, आक़ा !

मुझ सा कोई ग़म-ज़दा न होगा
तुम सा नहीं ग़म-गुसार, आक़ा !

गिर्दाब में पड़ गई है कश्ती
डूबा डूबा, उतार, आक़ा !

तुम वो कि करम को नाज़ तुम से
मैं वो कि बदी को अ़ार, आक़ा !

फिर मुँह न पड़े कभी ख़िज़ाँ का
दे दे ऐसी बहार, आक़ा !

जिस की मरज़ी ख़ुदा न टाले
मेरा है वो नाम-दार आक़ा

है मुल्क-ए-ख़ुदा पे जिस का क़ब्ज़ा
मेरा है वोह कामगार आक़ा

सोया किये ना-बकार बंदे
रोया किये ज़ार-ज़ार आक़ा

क्या भूल है इन के होते कहलाएं
दुन्या के ये ताजदार आक़ा

उन के अदना गदा पे मिट जाएं
ऐसे ऐसे हज़ार आक़ा

बे-अब्र-ए-करम के मेरे धब्बे
'ला तग़्सिलुहल-बिह़ार', आक़ा !

इतनी रह़मत रज़ा पे कर लो
'ला यक़रुबुहुल-बवार', आक़ा !


शायर:
इमाम अहमद रज़ा खान बरेलवी
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